पश्चिम एशिया में इजरायली युद्ध का विस्तार और वैश्विक भू राजनीति

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इजरायल की यहूदी नस्लवादी हुकूमत न सिर्फ गाजा में नरसंहार और महाविनाश कर रही है, न सिर्फ दक्षिणी लेबनान में गोले बरसा रही है, न सिर्फ यमन में हवाई हमले करके वहां के नागरिकों को मार रही है, न सिर्फ सीरिया की गोलन पहाड़ियों से आगे जाकर दमिश्क के नजदीक तक कब्जा कर रही है, न सिर्फ उसने ईरान के ऊपर आक्रमण करके उसे 12 दिनी युद्ध में धकेला, न सिर्फ इसने आतंकवादी कार्रवाईयों को अंजाम देते हुए हिजबुल्ला के दो महासचिवों सहित कई कमाण्डरों, हमास के नेताओं, यमन की सरकार के प्रधानमंत्री सहित कई मंत्रियों और ईरान के कई वैज्ञानिकों सहित कई फौजी कमाण्डरों की हत्यायें की है, बल्कि और आगे बढ़कर इसने अमरीकी साम्राज्यवादियों के इस क्षेत्र में सहयोगी कतर के ऊपर हमला करके उसकी सम्प्रभुता का खुलेआम उल्लंघन किया है। यह हमला करके उसने अंतर्राष्ट्रीय कानून का सी धे उल्लंघन किया है।     
    
इजरायल ने यह हमला उस समय किया है जब अमरीकी राष्ट्रपति के कहने पर कतर की सरकार ने हमास के प्रतिनिधियों को वार्ता करने के लिए दोहा में बुलाया था। इस हमले में हमास के वार्ताकार तो बच गये लेकिन हमास के पांच सदस्य और कतर का एक सुरक्षा अधिकारी मारे गये। कतर अमरीकी साम्राज्यवादियों का गैर-नाटो मजबूत सहयोगी है। कतर में अल उदैद में अमरीका की इस क्षेत्र में सबसे बड़ी संख्या में वायु सेना तैनात है। स्वाभाविक है कि यह हमला अमरीकी साम्राज्यवादियों की सहमति के बगैर नहीं हो सकता था। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने सफाई दी है कि इस हमले की जानकारी उन्हें उस समय मिली जब लड़ाकू हवाई जहाज हमले की उड़ान भर चुके थे। जैसे ही उन्हें इसकी जानकारी मिली उन्होंने इसकी सूचना कतर सरकार को दे दी। यह ट्रम्प का सफेद झूठ है। यह हमला सीधे-सीधे अमरीका की जानकारी और स्वीकृति से हुआ था। 
    
इस हमले के पश्चात, सभी अमरीकी समर्थक पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीका की सरकारों में भय का माहौल बन गया। यदि कतर पर इजरायल हमला कर सकता है तो और कौन सा देश इस हमले से सुरक्षित है, यह सवाल सभी शासकों के बीच खड़ा हो गया। अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा इन शासकों को दी गयी सुरक्षा गारण्टी से भरोसा डगमगाने लगा। हालांकि अमरीकी राष्ट्रपति ने कतर के शासकों को यह आश्वासन दिया कि ऐसा दुबारा नहीं होगा। लेकिन इजरायली यहूदी नस्लवादी हुकूमत ने कतर सहित सभी देशों को धमकी दी कि वे ‘‘आतंकवादियों’’ को या तो अपने देश से बाहर करें या उन्हें गिरफ्तार करें। यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो यह काम इजरायल करेगा। एक यहूदी नस्लवादी नेता ने यहां तक कहा कि हमास के ‘‘आतंकवादी’’ दुनिया के किसी भी कोने में हों, हम उन्हें ढूंढ निकालेंगे। इस बार वे बच गये हैं, अगली बार नहीं बचेंगे। 
    
कतर पर हमले की प्रतिक्रिया तुरंत हुई। कतर ने अरब देशों और इस्लामी देशों के संगठन की बैठक बुलाई। बैठक में इजरायली हमले की निंदा की गयी। इजरायल की इस हमलावर कार्रवाई से निपटने के लिए ठोस कार्रवाई करने सम्बन्धी कोई प्रस्ताव नहीं पारित हुआ। पारित प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र संघ से इजरायल की हमलावर कार्रवाई रोकने की बात की गयी। हालांकि इण्डोनेशिया के प्रतिनिधि ने कहा कि मिसाइलों का जवाब बातों से नहीं मिसाइलों से दिया जाना चाहिए। इस लचर प्रस्ताव के बावजूद अब इन हुकूमतों के समक्ष इजरायल से बेहतर सम्बन्ध बनाने की प्रक्रिया में एक बड़ी रुकावट आ गयी है। इससे भी बढ़कर अब अरब हुकूमतें अमरीकी साम्राज्यवादियों की सुरक्षा गारण्टी को ज्यादा संदेह और अविश्वास की नजर से देखने लगी हैं। 
    
अभी तक साउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर सहित कई अरब मुल्क अपनी तेल सम्पदा के लाभ को अमरीका में जमा करके वहां निवेश करके अमरीकी साम्राज्यवादियों को फायदा पहुंचा रहे थे। वे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के बतौर डालर में व्यापार कर रहे थे। अमरीकी साम्राज्यवादी डालर को हथियार के बतौर इस्तेमाल करके अपने बड़े पैमाने पर कर्ज को दूसरे देशों के कंधों पर डालने में समर्थ हो रहे थे। अब इन देशों ने डालर के बजाय अन्य मुद्राओं में अपने व्यापार को तेज कर दिया है। इसकी शुरूवात ये पहले ही कर चुके थे। 
    
इजरायल द्वारा कतर पर हमले की निंदा दुनिया भर में व्यापक पैमाने पर हुई। इजरायल दुनिया के पैमाने पर अलग-थलग पड़ गया। इसके साथ ही जिन देशों ने अब्राहम समझौता इजरायल के साथ किया था, वह अब कमजोर पड़ने लगा है। इजरायल के साथ साउदी अरब और अन्य अरब देशों की रिश्तों के सामान्यीकरण की प्रक्रिया बाधित हुई।
    
इजरायल की आक्रामक कार्रवाईयों को देखते हुए तुर्की ने इजरायल को ‘‘दुश्मन’’ देश घोषित कर दिया। अभी तक तुर्की इजरायल के साथ अपना व्यापार लगातार जारी रखे हुए था। वह अजरबैजान के तेल को तुर्की के रास्ते इजरायल भेजने में भागीदार था। इसी प्रकार मिश्र इजरायल के साथ बड़ा गैस सौदा हाल ही में सम्पन्न कर चुका था। साउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और जार्डन जमीन के रास्ते इजरायल को आपूर्ति सुनिश्चित कर रहे थे। ये सभी किसी न किसी रूप में इजरायली हुकूमत की मदद कर रहे थे।
    
दरअसल, अरब देशों के इन शासकों को फिलिस्तीन की आजादी की लड़ाई से कोई हमदर्दी नहीं है। ये सभी अमरीकी साम्राज्यवादियों की छत्रछाया में इजरायल के साथ सम्बन्धों को बेहतर बनाने में लगे हुए थे। लेकिन इन देशों की व्यापक मजदूर-मेहनतकश आबादी इजरायली यहूदी नस्लवादी हुकूमत द्वारा गाजापट्टी में फिलिस्तीनियों के किये जा रहे व्यापक नरसंहार और महाविनाश के विरुद्ध और फिलिस्तीनियों के साथ एकजुटता प्रदर्शित कर रही है। इन देशों के शासकों को अपने-अपने देशों में इनकी सत्ताओं के विरुद्ध विद्रोह का भय सता रहा है। यह भय ही है जो इन्हें इजरायली यहूदी नस्लवादी हुकूमत के विरुद्ध और फिलिस्तीन की आजादी के पक्ष में खड़ा होने के लिए मजबूर कर रहा है। कतर पर इजरायली हमले ने फिलिस्तीन के पक्ष में इन्हें और मुखर होकर बोलने की ओर धकेलने में योगदान किया है। 
    
अब संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में दुनिया के व्यापक देश फिलिस्तीन की आजादी के पक्ष में और दो राज्य समाधान के पक्ष में मत दे चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में इजरायली हुकूमत इतना अलग-थलग पड़ चुकी है कि जब नेतन्याहू आम सभा को सम्बोधित करने के लिए खड़े हुए तो कई सारे देशों के, लगभग 50 देशों के 100 प्रतिनिधियों ने उनके भाषण का बहिष्कार किया। लेकिन नेतन्याहू इस आम सभा में भी वही युद्ध की बात दोहराता रहा। नेतन्याहू के इस भाषण को गाजापट्टी में लाउडस्पीकर से प्रसारित किया गया। यानी यह भाषण संयुक्त राष्ट्र सभा की आम सभा में गाजापट्टी के फिलिस्तीनियों को डराने के लिए दिया जा रहा था। क्योंकि आम सभा में सुनने वाले थोड़े ही देशों के प्रतिनिधि थे। 
    
दरअसल, इजरायल गाजापट्टी में व्यापक नरसंहार और भयावह तबाही-बर्बादी के बावजूद हमास और अन्य प्रतिरोध संगठनों को समाप्त नहीं कर सका है और न ही वह अपने बंधकों को ताकत के बल पर रिहा करा सका है। जो भी बंधक रिहा हो सके वे सभी प्रतिरोध संगठनों के साथ समझौते करके ही रिहा हुए। इससे नेतन्याहू के नेतृत्व की देश के अंदर किरकिरी हुई है। नेतन्याहू का देश के भीतर विराध बढ़ता जा रहा है। उसकी सत्ता के विरुद्ध बंधकों की रिहाई और युद्ध को समाप्त करने की आवाज तेज होती जा रही है। इन आवाजों का ध्यान भटकाने के लिए उसने गाजापट्टी पर जमीनी हमले तेज कर दिये हैं। गाजा शहर को खाली कराने और वहां की बची इमारतों को जमींदोज करने का अभियान तेज कर दिया है। गाजापट्टी में भुखमरी है। वहां पानी का अभाव है। अस्पतालों को पहले ही तबाह कर दिया गया है। अंतर्राष्ट्रीय राहत पर इजरायली हुकूमत ने रोक लगा दी है। स्कूल, मस्जिद, चर्च, विश्वविद्यालय और तमाम मदद करने वाली संस्थाओं को तहस-नहस करने के बावजूद न तो वह हमास व अन्य प्रतिरोध संगठनों को समाप्त कर सका है और न ही बंधकों की रिहाई करा पाया है। प्रतिरोध संगठनों के हमले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। 
    
नेतन्याहू यह सब इसलिए करने में समर्थ रहा है क्योंकि अमरीकी साम्राज्यवादियों की पूरी मदद उसे मिल रही है। अरबों डालर के हथियार और गोला-बारूद के साथ-साथ राजनीतिक समर्थक उसकी मुख्य ताकत रहा है। अमरीकी साम्राज्यवादी गाजा पट्टी में फिलिस्तीनियों के नरसंहार में भागीदार रहे हैं और आज भी हैं। ट्रम्प ने फिलिस्तीनियों को गाजापट्टी से उजाड़कर किसी अन्य देश या देशों में बसाने की पेशकश की थी और गाजापट्टी को ‘‘रिबेरा’’ में तब्दील करने का ख्वाब देखा था। लेकिन वह भी फलीभूत नहीं हुआ। 
    
नेतन्याहू की यहूदी नस्लवादी सत्ता द्वारा गाजापट्टी में फिलिस्तीनियों के किये जा रहे नरसंहार के विरुद्ध लेबनान के हिजबुल्ला के लड़ाके लगातार इजरायल पर हमला कर रहे थे। अमरीकी साम्राज्यवादियों और इजरायली यहूदी नस्लवादी शासकों ने लेबनान की हुकूमत पर अपनी समर्थक ताकतों के जरिए दबाव बनाकर हिजबुल्ला को निरस्त्र करने की कोशिश की। यदि हिजबुल्ला निरस्त्र हो जाता है तो लेबनान पर सीधे इजरायल-अमरीकी आधिपत्य कायम हो जायेगा। इसलिए हिजबुल्ला ने स्पष्ट तौर पर उसे निरस्त्र करने की कार्रवाई को देशद्रोह कहा और कहा कि उसे कोई भी ताकत निरस्त्र नहीं कर सकती। इसलिए इजरायल पर हिजबुल्ला की तरफ से लगातार प्रतिरोध मिलने का खतरा मौजूद है। 
    
यमन के अंसारूल्लाह (हूथी) संगठन और सरकर ने गाजापट्टी में फिलिस्तीनियों के नरसंहार के विरो ध में और फिलिस्तीनियों के साथ एकजुटता प्रदर्शित करते हुए इजरायल आने जाने वाले जहाजों पर लाल सागर में हमले शुरू किये। इन हमलों से इजरायल को बचाने के लिए अमरीकी और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने लाल सागर में अपने बेड़े तैनात किये और यमन पर हवाई हमला किया। लेकिन वे यमन द्वारा लाल सागर में इजरायल पर की गयी नाकाबंदी को रोकने में नाकाम रहे। हूथियों ने इजरायल पर अपनी मिसाइलें दागना शुरू किया और इजरायल को काफी क्षति पहुंचायी। इजरायल ने आतंकवादी कार्रवाई के जरिये यमन के प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमण्डल के कई सदस्यों की हत्या कर दी। अभी भी यमन पर इजरायली हवाई हमले बड़े पैमाने पर जारी हैं। लेकिन इससे हूथी लोगों के हौंसले पस्त नहीं हुए। उनके इजरायल पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। 
    
इजरायल की यहूदी नस्लवादी हुकूमत को सफलता उस समय मिली जब सीरिया में अल असद की सरकार का तख्तापलटा। लेकिन, इसमें अमरीकी साम्राज्यवादियों और तुर्की का विशेष हाथ था। इन सभी की साजिशों के तहत पहले अलकायदा के आतंकवादी जुलानी को सत्ता में बिठाया गया। जुलानी इस समय अमरीकी साम्राज्यवादियों के हाथ में कठपुतली बना हुआ है। इजरायल ने तत्काल गोलन पहाड़ियों में आगे जाकर माउण्ट हेब्रोन तक कब्जा कर लिया और सीरिया की अधिकांश फौजी ताकत को नष्ट कर दिया। 
    
इजरायल के सारे अपराधों में अमरीकी साम्राज्यवादी भागीदार रहे हैं। लेकिन नेतन्याहू सीधे अमरीकी साम्राज्यवादियों को पश्चिम एशिया के युद्ध में उतारना चाहता था। इसके लिए उसने ईरान पर अचानक हमला उस समय किया जब ईरानी प्रतिनिधिमण्डल ओमान की मध्यस्थता में अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ अप्रत्यक्ष वार्ता कर रहा था। इस अचानक हमले में ईरान के कई परमाणु वैज्ञानिक, कई शीर्ष कमाण्डर और बहुत सारे नागरिक मारे गये। लेकिन ईरान द्वारा जवाबी कार्रवाई में इजरायल का भी काफी नुकसान हुआ। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने बी-2 बाम्बर के जरिए ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला किया। लेकिन जैसे ही ईरान ने कतर स्थित अमरीकी सैन्य अड्डे पर हमला किया। अमरीकी साम्राज्यवादी पीछे हट गये। 
    
अभी भी इजरायल अमरीकी साम्राज्यवादियों को सीधे ईरान के विरुद्ध युद्ध में उतारना चाहता है। लेकिन अब परिस्थिति काफी बदल चुकी है। अमरीकी साम्राज्यवादी जिन अरब देशों को अपना घनिष्ठ सहयोगी मानते थे, वे अब खिसक रहे हैं। अरब देशों के शासक कतर हमले के बाद, इजरायल के विरुद्ध खुलकर बोलने लगे हैं। यहां तक कि जार्डन भी, जो इजरायल के लिए अपना हवाई क्षेत्र खुला रखता था और ईरान के लिए अपना हवाई क्षेत्र बाधित किये हुए था, अब इजरायली सत्ता के विरुद्ध बोलने लगा है। 
    
यदि इजरायल ईरान पर दूसरा आक्रमण करता है, तो इस बार उसे चारों तरफ से ज्यादा विरोध का सामना करना पड़ सकता है। ईरान काफी नुकसान के बावजूद पहले से ज्यादा सतर्क और सशक्त है। रूसी साम्राज्यवादियों और चीनी साम्राज्यवादियों के साथ इसके सम्बन्ध ज्यादा मजबूत हुए हैं। शंघाई सहकार संगठन के सदस्य के बतौर इसकी एकजुटता अन्य देशों के साथ बढ़ी है। यदि ईरान पर हमला होता है तो इजरायल को चारों तरफ से हमलों का सामना करना पड़ सकता है। यहां यह भी  ध्यान में रखने की बात है कि साउदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक सुरक्षा समझौता हुआ है। साउदी अरब के ऊपर यदि कोई ताकत आणविक हथियारों का इस्तेमाल करेगी तो इस सुरक्षा समझौते के अंतर्गत साउदी अरब की रक्षा के लिए पाकिस्तान उसके साथ आयेगा। ऐसे में साउदी अरब अपनी रक्षा के अमेरिका से अलग विकल्प तलाशने लगा है। कुछ लोगों का यह कहना है कि यह समझौता ईरान के विरुद्ध केन्द्रित है। लेकिन ईरान ने इस समझौते का स्वागत किया है। 
    
इजरायल की यहूदी नस्लवादी सत्ता एक वृहत्तर इजरायल का सपना देखती है। इस सपने में लेबनान, सीरिया, साउदी अरब और अन्य अरब देशों के हिस्से आते हैं। इस सपने को वह युद्ध के विस्तार के जरिए पूरा करना चाहता है। लेकिन अब वैश्विक परिस्थिति व क्षेत्रीय परिस्थिति उसके अनुकूल नहीं है। उसे या तो अपने इस सपने को मुल्तवी करना पड़ेगा, या तो इजरायल का मौजूदा स्वरूप में वजूद ही खतरे में पड़ जायेगा। 
    
पश्चिमी एशिया में मौजूदा उथल-पुथल तथा मजदूर मेहनतकश अवाम के जागरण के पीछे फिलिस्तीन की अवाम और प्रतिरोध संगठनों का मौत को चुनौती देने वाला शौर्यपूर्ण संघर्ष है जिसने फिलिस्तीन के प्रश्न को पश्चिम एशिया के केन्द्र में ला दिया है।   

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