मानेसर (गुड़गांव) में अप्रैल माह की शुरूआत से ही पुलिस प्रशासन पहले दिन से ही मजदूर आंदोलन की व्यापकता के हिसाब से सक्रिय था। जिस दिन होंडा के मजदूर गेट पर बैठे तो पुलिस प्रशासन ने मजदूरों को डराने-धमकाने का प्रयास किया और बाद में फैक्टरी गेट के सामने न बैठकर मानेसर तहसील में जाने के लिए मजबूर कर दिया। जब 4 अप्रैल को मुंजाल शोवा और सत्यम के मजदूर हड़ताल पर बैठे तो यहां का खुफिया पुलिस विभाग और लोकल इंटेलिजेंस सक्रिय हो गए।
5 अप्रैल को मानेसर तहसील में पुलिस प्रशासन फैक्टरी के नेतृत्वकारी मजदूरों को डरा-धमका रहा था। हम इंकलाबी मजदूर केंद्र के कार्यकर्ता आंदोलन में शामिल थे और आंदोलन को नेतृत्व देने का प्रयास कर रहे थे। हमें बाहरी और आंदोलन को भड़काने का आरोप लगाकर यहां न आने के लिए धमकाया गया।
7 अप्रैल को मानेसर तहसील से शाम 7 बजे हरीश और मुंजाल शोवा के नेतृत्वकारी मजदूर आकाश जो वार्ताओं में शामिल थे, को तीन लोगों ने जो हृष्ट-पुष्ट नौजवान थे, पकड़ लिया। उन्होंने बताया कि वह हरियाणा पुलिस की क्राइम इन्वेस्टीगेशन एजेंसी (CIA) से हैं। वे सादी वर्दी में थे और उनके कमर में रिवाल्वर था। उन्होंने यह कहकर जीप में बैठा लिया कि बड़े अधिकारी ने बातचीत के लिए बुलाया है। उसके बाद हमारे फोन से राजू को फोन कर बुलाया और राजू और उनके साथ आये विकास को भी जीप में बंद कर दिया। फिर हमें सिविल लाइन, नवरंगपुर मानेसर ले जाया गया। उसके बाद CIA की एक अन्य टीम बेलसोनिका यूनियन के महासचिव और इंकलाबी मजदूर केंद्र के कार्यकर्ता अजीत और इंकलाबी मजदूर केंद्र के ही श्यामवीर को गुड़गांव के उनके घरों से उठाकर ले आई। हमारे फोनों को एक तरह से जब्त कर लिया। हमें यह नहीं बताया गया कि हमें यहां क्यों लाए हैं और न ही हमें किसी को सूचना देने दी गई।
उसके बाद हमसे डराने-धमकाने के अंदाज में पूछताछ की गई कि यहां आंदोलन में क्या करने आए हो? और मजदूरों को क्यों भड़का रहे हो। उसके बाद सवालों की झड़ी लगा दी। कहां रहते हैं? क्या करते हैं? किस संगठन में हो? संगठन क्या करता है? कितने सदस्य हैं? कौन चलाता है? आदि आदि।
फिर हम छह लोगों का पूरा लिखित रूप में ब्यौरा लिया गया। नाम, पिता का नाम, स्थाई पता, वर्तमान पता, यहां कितने साल से रहते हो, क्या काम करते हो, शादी हुई है, बच्चे कितने हैं, भाई-बहन कितने हैं, इससे पहले कहां थे, क्या करते थे, यहां कब आए, आदि आदि। उसके बाद हमें बताया गया कि आपको पूछताछ के लिए लाया गया था और अब आपको थाने ले जाकर छोड़ देंगे। फिर एक सिपाही जीप में हमें मानेसर थाने लाया और हमसे नाम, पिता का नाम, मानेसर तहसील में क्यों आए आदि लिखित में लिया और कहा कि दोबारा यहां मत आना। रात लगभग 2ः00 बजे हमें छोड़ा गया।
9 अप्रैल को मजदूर जब अपनी फैक्टरियों पर पहुंचे तो वहां कई जगहों पर पहले से ही पुलिस खड़ी थी। मजदूरों ने सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम वेतन बढ़ोत्तरी का नोटिस लगाए जाने की मांग की। पर प्रबंधन ने मना कर दिया और मजदूरों को फैक्टरी में जाकर काम करने के लिए कहा। जब मजदूर अपनी मांगों को लेकर डटे रहे तो फैक्टरी प्रबंधन और पुलिस प्रशासन ने मजदूरों को फैक्टरी गेट से खदेड़ना शुरू किया। और मजदूरों के ऊपर लाठियां भी चलाईं जिसमें कई मजदूर गंभीर रूप से घायल हुए, जिनमें कई महिलाएं भी थीं।
रिचा ग्लोबल सेक्टर 7 में तो मजदूरों के ऊपर बहुत बर्बरता से लाठीचार्ज किया गया। मजदूरों ने बताया कि फैक्टरी के बाहर सड़क पार काफी दूर तक पुलिस ने मजदूरों को घरों में घुस कर पीटा। और फिर रिचा ग्लोबल, सेक्टर 7 के प्लांट हेड की शिकायत पर ही FIR दर्ज कर जिसमें मजदूरों पर संगीन धाराएं लगाई गईं, इस केस में 9 मजदूरों को बाद में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।
एक अन्य FIR मानेसर, सेक्टर 4 स्थित मोडलामा एक्सपोर्ट के प्रबंधन द्वारा दर्ज कराई गई इसमें 45 मजदूरों, जिसमें 20 महिलाएं शामिल थीं, को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।
9 अप्रैल को ही जब मानेसर में पुलिस द्वारा मजदूर आंदोलन का दमन किया जा रहा था उसी समय एक बार फिर CIA वाले पहले वाले अंदाज में ही हरीश को अजीत के कमरे से उठाकर ले गए। फिर वह अजीत को पकड़ने के लिए लघु सचिवालय, गुड़गांव गए। जहां अजीत ट्रेड यूनियन काउंसिल के कार्यक्रम के तहत उपायुक्त महोदय को मजदूर आंदोलन और मजदूरों की मांगों के संदर्भ में ज्ञापन देने गए थे। लघु सचिवालय में उसी दौरान कई मजदूर मानेसर से पहुंचे हुए थे जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं उनमें से कई मजदूरों के चोटें लगी हुई थीं और मजदूर बहुत घबराये हुए थे। जब अजीत ट्रेड यूनियन काउंसिल, गुड़गांव के प्रतिनिधियों के साथ मजदूरों से बात कर रहे थे उसी समय ब्प्। वाले उन्हें पकड़ कर ले गए। हरीश और अजीत को पड़कर CIA आफिस, सिविल लाइन नवरंगपुर मानेसर ले गए जहां 7 तारीख की रात को ले गए थे। दोपहर के समय साथी श्यामवीर को भी गुड़गांव उनके कमरे से CIA वाले पकड़कर सिविल लाइन ले आए। हमारे फोन पुलिस के द्वारा जब्त कर लिए गए। हमें ऊपर एक कमरे में बिठाया गया। हमसे पूछताछ शुरू की। हमारा नाम, पिता, माता, पत्नी का नाम, गांव का पता, वर्तमान निवास, कितने साल से रहते हो, क्या काम करते हो, खर्चा कैसे चलता है, पैसा कहां से मिलता है आदि विस्तार से लिखा।
शाम होते-होते कई मजदूरों को वहां लाया गया। पुलिस वाले मजदूरों को कमरे में ले जाकर पीटते जिसकी आवाज ऊपर कमरे तक आती थी। उसके बाद उन मजदूरों को ऊपर कमरे में, जिसमें हम थे, लाकर नीचे जमीन पर बैठा देते। उसके बाद उनका पूरा रिकार्ड दर्ज किया जाता। नाम, पिता, माता, पत्नी का नाम, गांव का पता, वर्तमान पता कितने साल से रहता है, कहां काम करता है, कितने समय से काम करता है आदि दर्ज करते हुए। इस बीच यदि कोई मजदूर कहता कि उसे चोट लगने से बहुत दर्द हो रहा है तो पुलिस वाले मजाक में कहते, कि क्या तुम्हारी और खातिरदारी करें। कोई मजदूर यदि घर वालों से बात करने के लिए कहता तो उसे धमका देते। पूरा माहौल डराने-धमकाने वाला और दहशत भरा था।
एक पुलिस वाला एक मजदूर के फोन से व्हाट्सएप ग्रुप चेक कर रहा था। मजदूरों द्वारा बनाए गए एक ग्रुप में जो मैसेज थे उन्हें सुन और देख रहा था। और जिन मैसेजों में मजदूर प्रबंधन या पुलिस वालों के बारे में कुछ कह रहे थे उन मैसेजों की फोटो खींच रहा था। और जिन मैसेजों में मजदूर पुलिस वालों के लाठी चलाने, पीटने की बात कहते, उन्हें इग्नोर कर देता।
हम तीनों को एक-एक कर नीचे डीसीपी के कमरे में ले जाया गया जहां डीसीपी के अलावा एक-दो और अधिकारी बैठे थे। डीसीपी ने हमसे डराने-धमकाने के अंदाज में बातचीत की। डीसीपी ने डांटते हुए कहा कि दसियों साल लग जाते हैं इमेज बनाने में और तुमने एक पल में इस इमेज को डैमेज कर दिया। मजदूरों के लिए कहा कि अगर इतने पैसे में काम नहीं कर सकते तो घरों में रहते। यहां क्यों आते हैं। फिर हमारे लिए कहा कि इन्हें भी जेल में डालो। बाद में हमें धमकाने के अंदाज में चेतावनी देते हुए कहा कि 15 दिन तक यहां मत दिख जाना और वापस कमरे में भेज दिया।
उसके बाद एक पुलिस इंस्पेक्टर को कहा कि इन्हें सेक्टर-7 मानेसर थाने ले जाओ। इंस्पेक्टर ने हमें कहा कि फोन कर तीनों अपने जानने वाले एक व्यक्ति को जमानत के लिए बुला लो। यह बताने के लिए हमें फोन दिया गया। जब हमने साथियों को फोन किया तो उन्हें पहली बार पता चला कि हमें यहां लाया गया है। हमने उनसे मानेसर थाने में आने के लिए कहा। हमें मानेसर थाने सेक्टर 7 ले जाया गया फिर हमारी पूरी डिटेल लिखी गई। हम तीनों से एक पेज पर लिखवाया गया कि हमें पूछताछ के लिए लाया गया था और पूछताछ के बाद अब हमें सही सलामत हमारे परिचित के साथ भेजा जा रहा है। हमसे हस्ताक्षर कराने के बाद हमारे साथियों से भी उन पेजों पर हस्ताक्षर कराए गए। इस पूरे काम में रात के 11ः30 बज गए।
थाने से बाहर आने पर हमें साथियों ने बताया कि जब वह थाने आए थे तो यहां बहुत संख्या में लोग मौजूद थे वह अपने माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी की खोज में यहां आए थे जिन्हें पुलिस पकड़ कर ले गई थी और उनका पता नहीं चल रहा था कि वह कहां हैं। पर पुलिस ने उनकी एक न सुनी और लाठी मारते हुए उन्हें भगा दिया।
9 अप्रैल को जिन 9 मजदूरों के ऊपर हत्या और आगजनी का केस लगाया था उन मजदूरों को 14 दिन की न्यायिक रियासत में भौंडसी जेल भेज दिया गया। इसके अलावा अन्य 45 मजदूर जिसमें 20 महिलाएं भी थीं उन्हें भी भौंडसी जेल भेजा गया।
12 अप्रैल को रात करीब 10-11 बजे ब्प्। की अलग-अलग टीमों ने एक बार फिर पहले की तरह आकाश, हरीश, राजू, अजीत, श्यामवीर और पिन्टू को कमरों से उठाया और पहले अपने लोकल थाने में ले गई और उसके बाद देर रात CIA आफिस सिविल लाइन नवरंगपुर लाया गया।
इस बार हमें सीधे लाॅकअप में ले गए और अंडरवियर छोड़कर सभी कपड़े उतरवा कर लाॅकअप में बंद कर दिया।
हमें पेशाब करने के लिए भी बाहर नहीं जाने दिया। पेशाब करने के लिए लाॅकअप के कोने पर एक बड़ी बोतल थी। सिपाही ने कहा कि इस बोतल में ही पेशाब कर लो।
सुबह लगभग 4-5 बजे हमें उठा दिया और SI के कमरे में ले गए। SI ने हमसे पूछताछ की और आरोप लगाया कि तुमने मजदूरों को भड़काया, तोड़फोड़ और आगजनी करवाई, पेट्रोल बम बनाने के लिए कह रहे हो। बाइक में आग लगवा दी आदि आदि।
हमने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया। हमने बताया कि यह सारी प्रबंधनों और ठेकेदारों की साजिश है। यह काम उनके गुंड़ों ने किये हैं ताकि मजदूरों को फंसा कर आंदोलन खत्म किया जा सके। उसके बाद हमें फिर लाॅकअप में डाल दिया। कुछ समय बाद हमें चाय दी गई और फिर 9-10 बजे के करीब खाना दिया। खाना भी हमें लाॅकअप के गेट के नीचे से सरका कर दिया।
वहां कहीं घड़ी नहीं थी पर लगभग 10-11 बजे पुलिस वालों ने अपनी कागजी कार्रवाई शुरू कर दी।
लाॅकअप के अंदर से ही हम सभी से आधार कार्ड मांगा गया। जिन साथी का आधार कार्ड नहीं था उन से फोन कर मंगवाया। उसके बाद दो लोगों को लाॅकअप से बाहर निकाला और कपड़े पहना कर ऊपर कमरे में ले गए जहां कागजी कार्रवाई की जा रही थी। अभी तक हमारे परिवार या परिचित किसी को भी हमारी गिरफ्तारी की सूचना नहीं दी गयी थी।
गिरफ्तारी और केस के संबंध में कागज बनाने के लिए एक बार फिर हमसे पूछताछ की गयी। नाम, माता-पिता का नाम, पत्नी का नाम, फोन नंबर, गांव का पता, वर्तमान पता, कितने समय से रहते हो, कितने भाई हैं, नाम, क्या काम करते हो, कितने समय से करते हो आदि आदि। इस दौरान हमसे पूछा गया कि हम अपनी गिरफ्तारी की सूचना किसे देना चाहते हैं। तीन साथियों ने अपने परिवार वालों का नाम और फोन नंबर दिया और तीन साथियों ने वकील मोनू का नाम और फोन नंबर दिया। उसके बाद एक बार फिर हमें कपड़े उतरवा कर लाॅकअप में बंद कर दिया। लगभग 1ः00 बजे के करीब फिर हमें दो-दो कर SI के कमरे में ले जाया गया जहां तीन अधिकारी बैठे थे उनमें से एक लोकल विजलेंस और दो केंद्रीय विजिलेंस के थे। उन्होंने भी हमसे पूछताछ शुरू की। उन्होंने पूछा कि इस संगठन में कब से हो, क्या काम करते हो, यहां किसलिए आए थे, संगठन के लिए फंड कहां से आता है, चंदा कैसे इकट्ठा करते हो और तुम्हारा खर्चा कैसे चलता है आदि आदि। उसके बाद फिर हमें दोबारा लाॅकअप में बंद कर दिया।
दोपहर 3 बजे के करीब दो साथियों पिंटू और हरीश को दोबारा बाहर बुलाया गया। कपड़े पहन कर जब हम SI के कमरे में गए तो पिंटू की पत्नी, दिल्ली से PUDR के साथी सुनील और गार्गी मिलने आए थे। SI ने कहा कि आप लोग मिलकर तसल्ली कर लीजिए। साथियों ने हमसे बातचीत की। पूछा कि आप सभी ठीक हो, खाना खिलाया, पुलिस ने आप लोगों के साथ मारपीट तो नहीं की आदि। उन्होंने बताया कि हमें अभी तक पता नहीं था कि आप लोगों को कहां गिरफ्तार किया गया है। बहुत मुश्किल से आपकी जानकारी दी गई। बाद में PUDR की साथी मौसमी भी मिलने आई। पिंटू ने पत्नी से मिलकर बातचीत की और तसल्ली दी कि हम सब ठीक हैं।
कुछ देर मिलने के बाद हमें फिर लाॅकअप में डाल दिया। इस समय तक शायद लगभग 4 बजे का समय हो चुका था। कागजी कार्रवाई चल ही रही थी। पुलिस के बड़े अधिकारी, सिपाहियों को डांट रहे थे कि जल्दी से कागजी कार्यवाही पूरी करो इन्हें आज ही पेश करना है। कुछ समय बाद हमें जल्दी-जल्दी तीन-तीन कर जीप में बैठा कर सिविल हाॅस्पिटल सेक्टर 10 गुड़गांव मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया।
जीप में ले जाते समय ही हमसे दो खाली पन्नों पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया। जब एक साथी ने कहा कि इसमें कुछ लिखा नहीं है। खाली कागज में हस्ताक्षर क्यों करवा रहे हैं। IO ने कहा कि हस्ताक्षर नहीं कर रहे तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा मैं तुम्हारे ऊपर एक-एक धारा और लगा दूंगा। हमने फिर उन कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए।
सिविल हाॅस्पिटल में हमारी जांच की गई जिसमें हमसे सामान्य ही पूछा कि कोई मारपीट तो नहीं की गई। उसके बाद डाॅक्टर ने अस्पताल के पर्चे पर साइन किया और हमसे भी एक कागज पर हस्ताक्षर करवाए।
मेडिकल जांच के बाद फिर हमें जीप में बैठा कर बड़ी तेजी से कोर्ट की तरफ ले गए। क्योंकि कोर्ट बंद होने का समय होने वाला था। जब हम कोर्ट पहुंचे तो वहां पर हमारे परिवार वाले और परिचित साथी मौजूद थे। कोर्ट के बाहर IO ने हमसे अन्य कानूनी कागजों में हस्ताक्षर करवाए। फिर हमें जज साहब के सामने पेश किया गया। जज ने हमारे कागज देखकर साथी श्यामवीर का नाम लिया और पूछा कि यह मोनू कौन है। जज को बताया कि मोनू हमारे वकील हैं, जो उस समय कोर्ट में मौजूद थे। वकील साहब जो जज के सामने ही खड़े थे उन्होंने कहा कि मोनू तो मैं हूं पर इसमें मेरा नाम कैसे है। जज ने कहा कि आपको उनकी गिरफ्तारी की सूचना दी है। जिस पर वकील साहब ने कहा है कि मेरे पास न तो कोई काॅल आया है और न मिस काॅल आई है। उन्होंने जज साहब को अपना फोन दिखाया। इस पर जज साहब ने IO से पूछा कि जब गिरफ्तारी की सूचना देने के लिए इनका नाम और फोन नंबर है तो उन्हें सूचना क्यों नहीं दी गई। इस पर प्व् से कुछ बोला नहीं गया।
अन्य सीनियर पुलिस अधिकारी ने कहा कि हम अब सूचना दे देंगे। इस पर बहस भी हुई और जज साहब ने कहा कि इस पर लिखित जवाब दो।
फिर से जज साहब ने इस संबंध में कमिश्नर को एक कमेटी का गठन कर एक महीने के अंदर रिपोर्ट देने के लिए कहा। उसके बाद हमें 14 दिन की न्यायिक हिरासत के लिए भौंडसी जेल भेज दिया गया।
इस समय तक लगभग शाम 5ः30 बज गए थे और जेल बंद होने का समय हो चुका था। हमें तुरन्त जीप में बैठाया गया और बहुत तेजी से जीप को रास्ते में भगाया गया। शाम के समय यातायात जाम भी था। जीप का ड्राइवर यातायात के सभी नियमों को ताक पर रखकर जीप दौड़ा रहा था। यदि कोई साइड नहीं दे पा रहा था तो तेज-तेज हाॅर्न बजाते और उसको धमकाते। लगभग 6ः00 बजे तक हम भौंडसी जेल गुड़गांव पहुंचे। IO ने कहा कि इनकी गिरफ्तारी की एक वीडियो और फोटो भी बना लो। हमें पुलिस वालों के साथ खड़ा कर फोटो खींची गयी और वीडियो बनाया। इसके बाद हमें जेल भेज दिया गया। -मानेसर मजदूर आंदोलन में गिरफ्तार हुए साथी