आदमखोर बाघ को पकड़ने अथवा गोली मारने की मांग

ग्रामीणों ने पुनः किया सड़क जाम

रामनगर (उत्तराखंड)/ आदमखोर बाघ को पकड़ने या फिर गोली मारे जाने की मांग के साथ ग्रामीणों ने 4 फरवरी को पुनः सावल्दे पर सड़क जाम कर अपने आक्रोश को व्यक्त किया। 
    
संयुक्त संघर्ष समिति के नेतृत्व में सैकड़ों की संख्या में जुटे ग्रामीणों ने बातचीत के लिये आये कार्बेट के अधिकारियों को खूब खरी-खोटी सुनाई; गुस्साई ग्रामीण महिलाओं ने कहा कि वे पुलिस की लाठी या जेल जाने से डरते नहीं हैं। उन्होंने कहा कि कार्बेट के अधिकारियों ने 14 दिसम्बर को ढेला झिरना गेट की बंदी के समय आश्वासन दिया था कि दो दिनों में आदमखोर बाघ को पकड़ लिया जायेगा, लेकिन अभी तक भी बाघ पकड़ा नहीं गया है और अब इसने सावल्दे की दुर्गा देवी को अपना निवाला बना लिया है। उन्होंने सवाल खड़ा किया कि आखिर कब तक लोग इस आदमखोर का निवाला बनते रहेंगे? अंततः अधिकारियों द्वारा दो-तीन दिनों में आदमखोर बाघ को पकड़ लेने के आश्वासन के बाद ग्रामीणों ने फिलहाल सड़क जाम खोल दिया।
    
इस दौरान हुई सभा में वक्ताओं ने कहा कि कार्बेट का कुल क्षेत्रफल लगभग 1300 वर्ग किलोमीटर है और एक बाघ को विचरण के लिये लगभग 20 किलोमीटर का क्षेत्र चाहिये होता है; इस हिसाब से कार्बेट में कुल बाघों की संख्या 65 से अधिक नहीं होनी चाहिये, लेकिन कार्बेट के अधिकारियों के अनुसार ही इस समय कार्बेट में बाघों की संख्या 260 है, जबकि असल में इनकी संख्या 300 से भी अधिक हो चुकी है; इसके अलावा गुलदारों की संख्या तो और भी अधिक है। सरकार देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिये कार्बेट में बाघों और गुलदारों की संख्या बढ़ा रही है और जिसका परिणाम यह निकल रहा है कि अब ये खतरनाक जंगली जानवर गांवों में आ रहे हैं और ग्रामीणों और उनके मवेशियों को अपना निवाला बना रहे हैं।
    
वक्ताओं ने कहा कि सरकार चाहती है कि ग्रामीण जंगली जानवरों के डर से यहां से पलायन कर जाएं या फिर उन्हें अतिक्रमण के नाम पर खदेड दिया जाये, ताकि उनकी जमीनों पर पूंजीपतियों और होटल-रिसोर्ट लॉबी का कब्जा हो जाये। वक्ताओं ने कहा कि मोदी सरकार ने 2022 तक सभी को पक्के घर का और हर साल 2 करोड़ लोगों को रोजगार का वायदा किया था, लेकिन सरकार का कोई भी वायदा पूरा नहीं हुआ और आज हालत यह है कि सरकार की जनविरोधी और पूंजीपतियों के हितों में संचालित पर्यटन नीति के कारण छोटी सी खेती और पशुधन से किसी तरह चल रही उनकी आजीविका भी उजड़ रही है।
    
वक्ताओं ने कहा कि आज जंगली जानवरों के आतंक का मुद्दा महज कार्बेट से सटे रामनगर के ग्रामीण क्षेत्रों का ही नहीं अपितु उत्तराखंड के पर्वतीय, भाबर एवं तराई सभी क्षेत्रों का बन चुका है; सभी जगहों पर आये दिन बाघ, गुलदार, भालू के हमलों में लोग अपनी जान गंवा रहे हैं जबकि जंगली सुअर और हाथी उनकी खेती को चौपट कर रहे हैं; ऐसे में राज्य स्तर पर चल रहे विभिन्न संघर्षों के बीच समन्वय कायम करते हुये सरकार के विरुद्ध राज्य व्यापी आंदोलन विकसित किये जाने की जरूरत है। 
    
सभा में वक्ताओं ने संघर्ष से गायब सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी पार्टियों के नेताओं को जमकर लताड़ा। अंत में संयुक्त संघर्ष समिति के संयोजक ललित उप्रेती द्वारा जंगली जानवरों के आतंक के मुद्दे पर 11 फरवरी को कानिया (रामनगर) में आयोजित उत्तराखंड स्तरीय सम्मेलन में व्यापक भागीदारी के आह्वान के साथ सभा एवं विरोध प्रदर्शन का समापन किया गया।
    
विरोध प्रदर्शन में संयुक्त संघर्ष समिति के विभिन्न घटक संगठनों- समाजवादी लोक मंच, महिला एकता मंच, किसान संघर्ष समिति, इंकलाबी मजदूर केंद्र, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र एवं आइसा इत्यादि के कार्यकर्ताओं ने बढ़-चढ़ कर भागीदारी की।         -रामनगर संवाददाता

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