अमरीका ने एक तरफ युद्ध विराम घोषित कर रखा है और ईरान के साथ समझौता वार्ता चला रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसने बार-बार हमला करने की धमकी देने के बाद 25-26 मई की मध्यवर्ती रात में ईरान पर हमला बोल दिया। इस हमले को अमरीका की सेंटकाम (पश्चिमी एशिया में अमरीकी फौजी कमान) ने ‘‘आत्मरक्षा’’ में उठाया गया कदम बताया है। यह हमला होरमुज जलडमरूमध्य के आस-पास किया गया है। अमरीकी सेंटकाम का कहना है कि ईरान की इस्लामी क्रांतिकारी गार्डकोर (आई.आर.जी.सी.) होरमुज जलडमरूमध्य के पानी के नीचे बारूदी सुरंग बिछा रही थी। इसलिए उन्होंने यानी अमरीकी फौज ने दो नौकाओं को नष्ट कर दिया। इसमें कितने लोग मारे गये। यह पता नहीं। इसके साथ ही बंदरअल्बास बंदरगाह के पास शहर में हमले की खबरें आ रही हैं। खार्ग और लार्क द्वीपों पर भी अमरीकी हमले हुए हैं। इतना ही नहीं, खुर्रमशहर और नातांज पर हमले की आशंका जतायी जा रही है। यह कहा जा रहा है कि अमरीकी सेना समृद्ध यूरेनियम पर कब्जा करना चाहती थी, लेकिन ईरानी वायुरक्षा प्रणाली के सक्रिय होने की वजह से वह इसमें सफल नहीं हुई। अमरीकी हमलों के जवाब में ईरान ने अमरीका के तीन एम क्यू 9 रीपर ड्रोन मार गिराने का दावा किया है।
दरअसल, अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प किसी भी तरह अपनी विजय दिखाकर इस युद्ध से बाहर निकलने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं। लेकिन ईरान उसे विजय का सेहरा नहीं पहनने दे रहा है। वह लगातार हर मोर्चे पर अमरीकी-इजरायली हमलावरों को न सिर्फ जवाब दे रहा है बल्कि उनके प्रचारतंत्र को पराजित कर रहा है। ट्रम्प ईरान पर अपनी विजय की बार-बार घोषणा करता है, ईरान को नष्ट करने का, उसकी फौजी, आई.आर.जी.सी, नेवी आदि को तबाह करने का दावा करता है। लेकिन उसके ये दावे उस समय हवा में काफूर हो जाते हैं जब ईरान उसे यह दिखाता है कि उसके कई सारे फौजी अड्डे तबाह कर दिये हैं। जब ईरान द्वारा अमरीका के सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान एफ-35 को मार गिराने की तस्वीर सामने आती है तो ट्रम्प की विजय की सारी बातें हवा-हवाई साबित हो जाती हैं। दुनिया की सबसे बड़ी फौजी ताकत अमरीका को वियतनाम युद्ध के बाद पहली बार इतने बड़े नुकसान का सामना करते हुए पराजय का सामना करना पड़ रहा है। यह एक ऐसी बात है जो ट्रम्प को बौखला रही है।
ईरान पर इजरायल के साथ आक्रामक युद्ध थोप कर अमरीकी साम्राज्यवादियों का मौजूदा सरगना ट्रम्प पूरी दुनिया में अधिकाधिक अलगाव में पड़ता जा रहा है। अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा ईरान पर युद्ध छेड़ने में उसके पश्चिमी यूरोपीय सहयोगी देश उसका साथ नहीं दे रहे हैं। पश्चिम एशिया में जहां अमरीकी साम्राज्यवादियों का लम्बे समय से प्रभुत्व था, यहां भी अमरीकी साम्राज्यवादियों को इस हमले में साथ नहीं मिल रहा है। रूसी और चीनी साम्राज्यवादी अमरीकी साम्राज्यवादी हमले का दृढ़ता से हर मंच पर विरोध कर रहे हैं। इसके साथ ही खुद अमरीका के अंदर इस युद्ध का विरोध बढ़ता जा रहा है। अमरीकी शासक हलकों में यह बात जोर पकड़ती जा रही है कि ट्रम्प प्रशासन इजरायल का युद्ध लड़ रहा है। ईरान अमरीका के लिए कोई खतरा नहीं है, फिर क्यों ईरान पर हमला करके अमरीकी जनता की कमाई को युद्ध मंे झोंक कर नष्ट किया जा रहा है। यह सवाल दिनों-दिन ज्यादा मुखरता से उठाया जा रहा है। खुद उसकी रिपब्लिकन पार्टी के भीतर इस युद्ध के विरोध की आवाजें उठ रही हैं। इस हालत में और इस युद्ध में अमरीकी फौजी साज सामानों की तबाही देखकर ट्रम्प शांति और समझौता वार्ता करने के लिए विवश हो रहा है। लेकिन लगातार ईरान को पाषाण युग में पहुंचाने तथा उसकी सभ्यता को नष्ट करने की धमकियां भी जारी किये हुए है।
दरअसल, ट्रम्प अभी भी मान रहा है कि दुनिया में उसके देश का एकछत्र प्रभुत्व है। उसके पास ताकतवर और आधुनिक सेना है। वह दुनिया के वित्तीय तंत्र को नियंत्रित करता है। ये बातें सही हैं। लेकिन दुनिया में दूसरी ताकतें भी उभर कर आगे आयी हैं। चीन दुनिया का सबसे बड़ा विनिर्माण क्षेत्र वाला है। कई आधुनिक तकनीकी क्षेत्र में चीन अमरीका से भी आगे है। चीन ने बेल्ट और रोड पहल के जरिये दुनिया भर में अपने अवरचनातंत्र का विकास किया है। इसलिए अमरीकी साम्राज्यवादियों की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में चीन को अमरीका का प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी और शत्रु घोषित किया गया है। ट्रम्प चीन व रूस के बढ़ते प्रभाव को पश्चिम एशिया में रोकने की पूरी कोशिश कर रहा है। चीन का पश्चिमी एशिया में बढ़ता प्रभाव ट्रम्प की आंख की किरकिरी बना हुआ है। वह चीन व रूस के बढ़ते प्रभाव को सामान्य तौर-तरीकों से, व्यापारिक व आर्थिक तरीकों से रोक पाने में असमर्थ है। तब उसने सैन्य तरीकों का सहारा लिया है। ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने, उसकी सम्पत्ति और बैंकों में जमा मुद्रा को रोकने तथा सत्ता परिवर्तन की तमाम कोशिशों के बावजूद वह ईरान की सत्ता को हटा नहीं सका। ईरान की सत्ता ने इस सब का मुकाबला करते हुए अपने सहयोगी दुनिया भर में तलाशे। चीन और रूस, अपनी वैश्विक आकांक्षाओं के चलते ईरान के साथ खड़े हो गये। ट्रम्प के वैश्विक प्रभुत्व में चीन और रूस मिलकर एक बड़ी चुनौती बनते हैं। पश्चिम एशिया में ईरान उनका एक मजबूत सहयोगी है। अमरीकी प्रभुत्ववाद के विरुद्ध, उसकी दादागिरी के विरुद्ध, उसके प्रतिबंधों के विरुद्ध इन तीनों देशों की एकता बनती है। अतः ट्रम्प को पश्चिम एशिया में, पूर्वी यूरोप में और पूर्वी व दक्षिण पूर्व एशिया में इन तीनों ताकतों की मिलीजुली शक्ति से चुनौती मिल रही है।
यह एक वजह है कि ट्रम्प इनमें से सबसे कमजोर कड़ी ईरान को हमले का निशाना बना रहा है। इसके अतिरिक्त, इजरायल पश्चिम एशिया में अमरीकी साम्राज्यवादियों का सबसे घनिष्ठ सहयोगी है। इजरायल की यहूदी नस्लवादी सत्ता की समर्थक अमरीका के अंदर एक ताकतवर यहूदी-नस्लवादी लाॅबी है। यह लाॅबी अमरीका की दोनों बड़़ी राजनीतिक पार्टियों- रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक- को करोड़ों-अरबों डाॅलर का चंदा देती हैं। कांग्रेस और सीनेट में इस लाॅबी पर चलने वाले सांसदों की अच्छी-खासी संख्या है। अमरीकी साम्राज्यवादी शासक वर्ग इस यहूदी नस्लवादी लाॅबी के प्रभाव और दबाव में रहता है। यह एक महत्वपूर्ण कारण है कि अमरीकी साम्राज्यवादी इजरायली शासकों के हर कुकर्म में मददगार रहे हैं और आज भी हैं। यह महज ट्रम्प का मामला नहीं है। हर अमरीकी राष्ट्रपति इसके प्रभाव में रहा है।
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है। इस सत्ता ने इस समूचे क्षेत्र में इजरायली आक्रामक गतिविधियों का विरोध किया है और इजरायली यहूदी नस्लवादी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष करने वालों का सहयोग और समर्थन किया है। इस सत्ता के लिए इजरायल इस क्षेत्र के लिए एक कैंसर के समान है, जिसे नेस्तनाबूद करना होगा।
लेकिन इजरायल के यहूदी नस्लवादी शासकों का सपना एक वृहत्तर इजरायल के निर्माण का है। इसमें फिलिस्तीन के लिए तो कोई जगह नहीं ही है, बल्कि यह लेबनान, जार्डन, सीरिया, मिश्र और साउदी अरब के एक अच्छ-खासे हिस्सों में अपना हक मानता है। यहूदी नस्लवादी इजरायली सत्ता फिलिस्तीनियों का पश्चिमी तट और गाजापट्टी में नरसंहार चलाती रही है और इनकी आजादी का समर्थन करने वाले ईरानी शासकों को अपना जानी दुश्मन मानती रही है। अभी तक अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक पश्चिम एशिया में ईरान को अलग-थलग करने में सफल थे। लेकिन दुनिया की परिस्थितियों में उस समय से बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो गयी, जब चीन ने अपनी व्यापक अवरचना की परियोजना शुरू की। इसके साथ ही रूस-चीन का सहयोग बढ़ा। यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस को अब तक के इतिहास में सबसे व्यापक प्रतिबंधों का सामन करना पड़ा। रूस के विरुद्ध सिर्फ यूक्रेन ही नहीं था, बल्कि समूचा यूरोप और अमरीका था। रूस ने अमरीकी-यूरोपीय प्रतिबंधों का जवाब तीसरी दुनिया के देशों के साथ व्यापारिक साझेदारी बढ़ा कर दिया। इससे रूस-चीन की साझेदारी न सिर्फ व्यापारिक रही, बल्कि समान दुश्मन के विरुद्ध व्यापक रणनीतिक-साझेदारी बन गयी जिसे पुतिन की भाषा में ‘अंतहीन’ कहा गया।
इस साझेदारी में कई तरह के क्षेत्रीय संगठन बने। इसमें ब्रिक्स और शंघाई सहकार संगठन प्रमुख हैं। अब इन देशों के बीच आपसी व्यापार इन देशों की अपनी मुद्राओं में होने लगा। इस तरह डि-डालरीकरण की एक प्रक्रिया शुरू हुई। यह अमरीकी वर्चस्व वाले पेट्रो डालर प्रणाली के सामने एक वैकल्पिक शुरूवात है। ईरान इसमें बढ़ चढ़़कर भाग ले रहा है।
अमरीकी साम्राज्वादियों और इजरायली यहूदी नस्लवादियों ने सोचा था कि ईरान को कुछ दिनों में ही कुचल दिया जायेगा। आर्थिक प्रतिबंधों से ईरान की आर्थिक स्थिति पहले से ही खराब थी। 28 फरवरी, 2026 को अमरीकी-इजरायली अचानक हमले में ईरान के राजनीतिक व फौजी नेतृत्व के बड़े हिस्से को समाप्त कर दिया गया। लेकिन ईरान ने जिस दृढ़ता से प्रतिकार किया उसकी न तो अमरीकी साम्राज्यवादियों ने कल्पना की थी और न ही इजरायली यहूदी नस्लवादियों ने। इस प्रतिकार ने अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझौता वार्ता करने के लिए विवश किया।
समझौता वार्ता, युद्ध विराम और धमकियों के बीच ईरानी शासकों ने स्पष्ट कर दिया कि वे धमकियों और दबाव या ब्लैकमेल के सामने नहीं झुकेंगे। ईरान की हुकूमत ने यह स्पष्ट कर दिया कि होरमुज जलडमरूमध्य के प्रबंधन का मामला बातचीत के दायरे से बाहर का है। यह जलक्षेत्र ईरान और ओमान का जलक्षेत्र है। अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार, इसके प्रबंधन की जिम्मेदारी इन्हीं दोनों देशों की होगी। ईरान किसी भी बाहरी शक्ति का होरमुज के प्रबंधन मंे दखलंदाजी को बर्दाश्त नहीं करेगा। दूसरा ईरान ने पहले ही घोषित कर रखा है कि आणविक हथियार वह नहीं बनायेगा। लेकिन नागरिक व स्वास्थ्य तथा अन्य गैर फौजी उपायों के लिए आणविक ताकत का इस्तेमाल और यूरेनियम संवर्धन करने का उसका अधिकार है। यह उसकी सम्प्रभुता से जुड़ा मसला है। वह किसी भी हालत में अपना यूरेनियम भण्डार न तो अमरीका को सौंपेगा और न ही उसे नष्ट करेगा।
डोनाल्ड ट्रम्प और बेंजामिन नेतन्याहू लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि ईरान को आणविक सामग्री रखने की किसी भी हालत में इजाजत नहीं दी जा सकती।
चूंकि तार्किक तौर पर अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक ईरान की कूटनीति के सामने टिक नहीं पा रहे हैं तो उन्होंने तर्क की जगह ताकत की भाषा का इस्तेमाल किया है। अतीत में भी वे धोखे से यही करते रहे हैं और अभी भी यही कर रहे हैं।
इजरायली यहूदी नस्लवादी शासक गाजापट्टी और पश्चिमी तट पर नरसंहार करने के साथ-साथ लेबनान में भी हिजबुल्ला लड़ाकुओं पर व्यापक हमले कर रहे हैं। ईरान ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि युद्ध विराम व्यापक होगा जिसमें लेबनान के हिजबुल्ला, गाजापट्टी में हमास और यमन के हूथी सभी आते हैं। यह इजरायली शासकों को स्वीकार नहीं है।
ताकत के जरिये ईरान को विवश किया जा सकता है। यह अमरीकी साम्राज्यवादियों और इजरायली शासकों का दुःस्वप्न है।