अमरीका-इजरायल का ईरान के विरुद्ध युद्ध

Published
Mon, 03/16/2026 - 07:09
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युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक परिणाम

‘नागरिक’ का पिछला अंक जब प्रेस में छपने के लिए जा रहा था, तभी अमरीकी साम्राज्यवादियों और यहूदी नस्लवादी इजरायली सेनाओं ने ईरान पर हमला कर दिया। अमरीकी साम्राज्यवादी पिछले कई महीनों से इस फारस की खाड़ी इलाके के इर्द-गिर्द बड़े पैमाने पर नौसैनिक बेड़ा और एयरक्राफ्ट कैरियर की तैनाती कर रहे थे। यह हमला बगैर उकसावे के किया गया था। यह हमला ऐसे समय किया गया था, जब आणविक हथियारों को लेकर अमरीकी और ईरानी प्रतिनिधियों के बीच ओमान की मध्यस्थता में अप्रत्यक्ष वार्ता चल रही थी। वार्ता के बीच में ही अमरीकी और इजरायली सेनाओं ने संयुक्त रूप से ईरान पर हमला कर दिया। इसी तरह, जून 2025 में भी वार्ता के बीच में ही इजरायली सेना ने ईरान पर हमला कर दिया था। उस समय 12 दिनों तक चले युद्ध में बाद में अमरीकी साम्राज्यवादियों ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर बी-2 बमवर्षक विमानों से हमला कर दिया था और इजरायली सेना ने ईरान के कई शीर्ष फौजी कमाण्डरों की हत्या कर दी थी। 
    
लेकिन 28 फरवरी को हुए इस अचानक और बिना उकसावे के किये गये हमले में अमरीकी-इजरायली फौजों ने ईरान के सर्वोच्च नेता और कमाण्डर अली खामेनेई के साथ-साथ कई शीर्ष फौजी कमाण्डरों की हत्या कर दी। इतना ही नहीं, इन सेनाओं ने एक प्राथमिक स्कूल की बच्चियों पर टामहाक मिसाइलों से हमला कर दिया। इस हमले में 160 से ज्यादा बच्चियों और उनके अध्यापकों व कर्मचारियों की हत्या कर दी गयी। इसके साथ ही, इन आतताई सेनाओं ने बहुत सारे नागरिकों की हत्यायें कर दीं और नागरिक अवरचनाओं को ध्वस्त कर दिया। तब से अमरीकी और इजरायली सेनाओं द्वारा ईरान में विध्वंस और हत्याओं का सिलसिला जारी है। 
    
अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी। बदनाम शाह रजा पहलवी का बेटा पहले से ही अमरीकी साम्राज्यवादियों के बल पर सत्ता में आने की कोशिश कर रहा था। 
    
इसके पहले भी, जून, 2025 के 12 दिनी युद्ध में अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली यहूदी नस्लवादी सत्तापलट कराने में असफल हो गये थे और इस युद्ध में उन्हें भी व्यापक नुकसान उठाना पड़ा था, तब जाकर उन्होंने एकतरफा युद्ध विराम कर दिया था। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने ईरान की सत्ता को उखाड़ फेंकने की साजिशों के तहत मोसाद, सी.आई.ए. और एमआई 6 के जरिये बड़े पैमाने पर हिंसा कराने का काम किया था। व्यापक जनता की वास्तविक समस्याओं के आक्रोश से उपजे आंदोलन पर इन एजेण्टों ने कब्जा कर लिया था। इस साजिश को भी ईरानी हुकूमत ने असफल कर दिया। तब अमरीकी साम्राज्यवादियों का धैर्य जवाब दे गया और इजरायली यहूदी नस्लवादियों की तो यही कोशिश रही है कि पश्चिम एशिया में ईरानी सत्ता की चुनौती को हमेशा के लिए खत्म कर दिया जाये। 
    
अमरीकी साम्राज्यवादियों और इजरायली यहूदी नस्लवादियों ने जो सोचा था, वह नहीं हुआ। सर्वोच्च नेता और शीर्ष कमाण्डरों की हत्याओं के बाद ईरानी हुकूमत भहरा कर गिरी नहीं। इसके विपरीत, वह पूरी ताकत के साथ इनका जवाब देने के लिए उतर पड़ी। ईरानी सेना और उसके इस्लामी रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने पूरी ताकत के साथ जवाब देना शुरू किया। ईरान की सत्ता पहले से खाड़़ी के देशों को आगाह कर चुकी थी कि यदि उनकी जमीन, वायु क्षेत्र या जल क्षेत्र का इस्तेमाल ईरान पर हमला करने के लिए किया गया तो ये देश भी उसके हमले का निशाना बनेंगे। ईरान की हुकूमत यह पहले से ही तैयारी कर चुकी थी कि खाड़ी के देशों में अमरीकी फौजी अड्डों को निशाने पर लेगी। बस अब ईरानी ड्रोन और मिसाइलें कतर, कुवैत, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, साउदी अरब और जार्डन में मौजूद अमरीकी फौजी अड्डों पर बरसने लगीं। इन मिसाइलों और ड्रोनों ने अमरीकी फौजी अड्डों की रडार प्रणालियों और वायु रक्षा प्रणालियों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया। इसी प्रकार, इजरायल के भीतर दूर तक मार करने वाली मिसाइलों और ड्रोनों के जरिये उसके फौजी अड्डों और मोसाद के मुख्यालयों को ध्वस्त कर दिया गया। जब खाड़ी के देशों में मौजूद अमरीकी फौजी अपनी जान बचाने के लिए अड्डों को छोड़कर होटलों और निजी घरों में रहने चले गये तो उनको भी निशाना बनाया गया। उधर लेबनान के हिजबुल्ला के लोगों ने इजरायल के उत्तरी हिस्सों में हमला शुरू कर दिया। जिस हिजबुल्ला संगठन को समाप्त प्राय मान लिया गया था और इजरायली सेना जब चाहे लेबनान पर हमला करती रहती थी। लेबनान की सरकार अमरीकी साम्राज्यवादियों और इजरायली यहूदी नस्लवादियों के दबाव में हिजबुल्ला को निरस्त्र करने का फरमान जारी कर चुकी थी, वे सब हिजबुल्ला के प्रत्याक्रमण को देखकर भौचक रहे गये। 28 फरवरी के बाद से अब तक ईरानी सेना अपनी मिसाइलों और ड्रोनों के जरिये इजरायल के बड़े-बड़े शहरों, फौजी अड्डों और अवरचना को काफी हद तक धूल धूसरित कर चुकी है। 
    
लेकिन ट्रम्प अपनी धमकियों से बाज नहीं आ रहे हैं। वह ईरान को नेस्तनाबूद करने की बातें कर रहे हैं। ट्रम्प के इस युद्ध का खुद अमरीकी जनता में विरोध हो रहा है। इस समय अमरीकी कांग्रेस और सीनेट में ट्रम्प के ईरान युद्ध का विरोध हो रहा है। अमरीकी शासक वर्ग का एक हिस्सा यह कह रहा है कि ट्रम्प अमरीका को इजरायल के फायदे के लिए इस युद्ध में झोंके हुए हैं। अमरीकी शासक वर्ग के भीतर यह कहा जा रहा है कि ट्रम्प को खुद ही यह नहीं पता है कि उसका लक्ष्य क्या है। पहले वह कहता था कि ईरान को कभी आणविक हथियार नहीं बनाने देगा। यह युद्ध उसकी आणविक क्षमता को नष्ट करने के बारे में है। उसने इसके साथ ही ईरान की मिसाइलों की मारक क्षमता को सीमित करने की बात की। वह समय-समय पर ईरानी हुकूमत परिवर्तन की बात करता रहा है। वह कभी कहता है कि ईरान में अब कुछ बचा नहीं है, सब खत्म कर दिया है और युद्ध जल्द ही समाप्त हो जायेगा। लेकिन उसका युद्ध मंत्री कहता है कि ईरान में और ज्यादा घातक व विनाशक हमले करने होंगे। इस तरह, ट्रम्प की हुकूमत द्वारा परस्पर विरोधी बयान आते जा रहे हैं।  
    
अमरीकी आतताई सेना ने ईरान के न सिर्फ स्कूलों को निशाना बनाया है बल्कि अस्पतालों और जच्चा-बच्चा केन्द्रों को भी निशाना बनाया है। उसने अभी हाल ही में ईरान की तेल भण्डारण जगहों पर हमले किये। इससे समूचे तेहरान के बड़े इलाकों में काली बारिश होने लगी। 
    
ट्रम्प की हिमाकत यह है कि उसने धमकी दी कि ईरान का सर्वोच्च नेता वही होगा जिसे ट्रम्प चाहेंगे। लेकिन ईरान के लोगों ने अपना सर्वोच्च नेता खामेनेई के बेटे को चुन लिया। इस चुनाव के बाद इजरायली सत्ता ने यह कहा कि जो भी सर्वोच्च नेता चुना जायेगा उसे वे मार देंगे। 
    
लेकिन अब ईरानी मिसाइलें भी जैसे को तैसा जवाब दे रही हैं। यदि अमरीकी-इजरायली ईरान के तेल भण्डारण की जगह पर हमला करते हैं तो ईरानी मिसाइलें हाइफा के तेल शोधक कारखाने को ध्वस्त कर देती हैं। यदि अमरीकी-इजरायली सेनायें तेहरान के बैंक को ध्वस्त कर देती हैं तो ईरान की मिसाइलें भी अमरीकी बैंकों और अमरीकी कम्पनियों को निशाना बना रही हैं। 
    
लेकिन अमरीकी साम्राज्यवादियों और खाड़ी के देशों को उस समय बहुत ज्यादा धक्का लगा जब ईरानी सत्ता ने होरमुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया। होरमुज जलडमरूमध्य वह संकरा जल रास्ता है जिससे होकर दुनिया का 20 प्रतिशत से ज्यादा तेल और गैस दुनिया भर में जाती है। साथ ही, खाड़ी के देशों में अन्य रसद सामग्री इसी रास्ते से आती है। ईरान की सत्ता ने कह दिया है कि होरमुज जलडमरूमध्य से कोई भी टैंकर बगैर ईरानी अनुमति के नहीं जा सकता। कुछ टैंकरों ने जाने की कोशिश की तो उनको नष्ट कर दिया गया। होरमुज जलडमरूमध्य के बंद होने से तेल की और गैस की कीमतों में उछाल आया है और दुनिया भर में तेल और गैस की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। इसका प्रभाव सभी उद्योगों पर पड़ रहा है। इससे अमरीकी साम्राज्यवादी बौखला गये हैं। खाड़ी के देशों का तेल और गैस निर्यात ठप हो गया है। ट्रम्प ने इस पर धमकी दी कि वे तेल टैंकरों की सुरक्षा के लिए अपनी नौसेना के जंगी जहाजों को भेजेंगे। यह भी चर्चा में है कि अमरीकी नौसेना के कमाण्डरों ने ट्रम्प की इस योजना का इस आधार पर विरोध किया है कि इसमें बहुत ज्यादा जोखिम है। ईरान की सत्ता ने खाड़ी के देशों से कहा है कि यदि वे अपने देश से अमरीकी फौजी अड्डों को हटा दें तो उनके तेल और गैस के लिए होरमुज जलडमरूमध्य खोला जा सकता है। यदि कोई ताकत जबरदस्ती होरमुज जल डमरूमध्य को खोलने की कोशिश करेगी तो उसे ईरानी नौसेना के हमलों का शिकार होना पड़ेगा। 
    
ट्रम्प ने एक और कोशिश की कि इराक के कुर्द लोगों को ईरान की कुर्द आबादी के बीच भेजकर ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह को संगठित करें। लेकिन इसमें भी ट्रम्प को ज्यादा सफलता नहीं मिली। इराक के कुछ कुर्द संगठनों ने यहां तक कह दिया कि हम अमरीकी तोप का चारा बनने के लिए तैयार नहीं हैं। इसी प्रकार पूर्वी ईरान के बलूचिस्तान के लोगों को भड़काने की कोशिश की गयी। अभी तक अमरीकी साम्राज्यवादियों को इन सबमें कोई खास सफलता नहीं मिली। 
    
इजरायली यहूदी नस्लवादी और अमरीकी साम्राज्यवादी लगातार यह कोशिश कर रहे हैं कि खाड़ी के देशों को ईरान के विरुद्ध युद्ध में झोंक दें। चूंकि इन देशों में अमरीकी फौजी अड्डे हैं और ईरान इन फौजी अड्डों पर लगातार मिसाइलों से हमला कर रहा है, तो इन देशों ने ईरान द्वारा किये गये हमलों की निंदा की और इसे अपनी सम्प्रभुता का खुला उल्लंघन बताया। इन हुकूमतों ने यह भी कहा कि वे अपनी सुरक्षा के लिए जवाब देने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं। लेकिन इन शासकों को भी जल्द समझ में आ गया कि अमरीका इनकी सुरक्षा नहीं कर रहा है बल्कि इनके यहां जो उनके फौजी अड्डे हैं, वे इजरायल और खुद अमरीकी हितों की सुरक्षा के लिए हैं। इसलिए अभी तक वे अमरीकी-इजरायलियों के झांसे में नहीं आये। इन खाड़ी देशों के शासकों को यह समझ में आ गया कि इजरायल और अमरीका उन्हें ईरान के विरुद्ध युद्ध में धकेलना चाहते हैं। ईरान की सत्ता ने भी इन देशों से कहा है कि हम आपकी सम्पत्तियों पर हमला नहीं कर रहे हैं, हम अमरीकी सम्पत्तियों और उनके अड्डों पर हमला कर रहे हैं। इजरायली यहूदी नस्लवादी सत्ता अपने मोसाद के एजेण्टों के जरिए इन खाड़़ी देशों में तोड़फोड़ करा रही है और इसकी जिम्मेदारी ईरान पर डालकर इन देशों को ईरान के विरुद्ध भड़काना चाहती है। साउदी तेल रिफाइनरी पर हुए विस्फोट की जिम्मेदारी ईरान ने नहीं ली। इसी प्रकार, अजरबैजान में हुए हमले की जिम्मेदारी ईरान ने नहीं ली।
    
इस प्रकार, खाड़ी के देशों के शासक जो अभी तक अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ घनिष्ठता से जुड़े रहे हैं, अब उसमें थोड़ी दरार पड़ रही है। लेकिन अभी भी अमरीकी साम्राज्यवादियों का इन देशों पर ज्यादा प्रभाव है। दूसरी बड़ी बात यह है कि इस युद्ध में खाड़ी के देशों की जनता अधिकांशतः ईरान के समर्थन और अमरीकी-इजरायलियों के विरोध में है। अगर ये शासक खुलकर अमरीकी-इजरायली शासकों के समर्थन में आ जायें तो खुद इनके विरुद्ध इनकी जनता के विद्रोह का खतरा मौजूद है। 
    
इस इलाके में लम्बे समय से अमरीकी साम्राज्यवादियों की दखलदांजी निर्णायक रही है। लेकिन हाल के दशकों में इस क्षेत्र में रूसी और चीनी साम्राज्यवादियों का दखल बढ़ा है। जहां चीनी साम्राज्यवादियों की मध्यस्थता में साउदी अरब और ईरान के बीच राजनयिक सम्बन्धों का सामान्यीकरण शुरू हो गया था। वहीं ईरान के साथ रूस और चीन के आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक सम्बन्ध इधर बढ़े हैं। रूस और चीन ईरान को हर तरह की जानकारी, सैनिक साजो-सामान मुहैय्या करा रहे हैं। ट्रम्प ने यहां तक कहा है कि रूस ईरान को हमारी फौजी गतिविधियों और उनके ठौर-ठिकानों की ठीक-ठाक जानकारी मुहैय्या करा रहा है। इसीलिए ईरानी मिसाइलें सटीक तौर पर उसी मंजिल में गिरती हैं जिसमें हमारे फौजी मौजूद हैं। 
    
कुल मिलाकर पश्चिम एशिया की स्थिति में परिवर्तन तेजी से आ रहा है। अमरीकी साम्राज्यवादियों का इस क्षेत्र में वर्चस्व अब ढलान की ओर है। ईरान के विरुद्ध अमरीकी-इजरायली युद्ध दो असमान ताकतों के बीच युद्ध है और ईरान हमले का शिकार है। इसलिए दुनिया की जनता की सहानुभूति अधिकांशतः ईरान के साथ है। खुद ईरान की जनता बड़े पैमाने पर रोजाना चौक-चौराहों पर इकट्ठे होकर अपनी हुकूमत के समर्थन में नारे लगाती है। यह उस समय होता है जब मिसाइलों, ड्रोनों के हमले वहीं पास में हो रहे होते हैं। यह जाबांजी और हिम्मत न्यायपूर्ण उद्देश्य के कारण ही आती है। वहीं दूसरी ओर इजरायल में अफरा-तफरी का माहौल होता है। जैसे ही साइरन बजते हैं, वैसे ही तेजी से भगदड़ मचती है और लोग भूमिगत शेल्टरों में भागते नजर आते हैं। 
    
ये दो तरह के दृश्य ईरान और इजरायल में नजर आते हैं। 
    
यह बात सही है कि इन असमान ताकतों के बीच युद्ध में ईरान में व्यापक पैमाने पर तबाही और बर्बादी हुई है। लेकिन इस युद्ध से इस क्षेत्र में अमरीकी वर्चस्व के पहले से कमजोर होने की दूरगामी तौर पर ज्यादा संभावना है। इस युद्ध को यदि अमरीकी-इजरायली परमाणु युद्ध की ओर धकेलेंगे तो भी चाहे इस युद्ध का परिणाम जो भी हो, लेकिन विश्वव्यापी पैमाने पर अमरीकी साम्राज्यवाद और कमजोर होगा और रूसी-चीनी साम्राज्यवाद की बढ़त को रोकने के उसके मंसूबे परवान नहीं चढ़ेंगे। 
    
जहां तक पश्चिम एशिया की बात है, इस युद्ध के बाद फिलिस्तीन की आजादी की मांग और बढ़ेगी। इजरायल कमजोर होगा और उसका वृहत्तर इजरायल का सपना फिलहाल सपना ही रह जायेगा।  

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