बिन्दुखत्ता बचाने व राजस्व ग्राम बनाने को संघर्ष

लालकुंआ/ नगीना कालोनी उजाड़ने के बाद बिन्दुखत्ता का नाम अतिक्रमण की सूची में आने से बीते दिनों बिन्दुखत्ता की जनता काफी आक्रोशित हो गई। नैनीताल जिले की इस सूची में लालकुंआ के बंगाली कालोनी, खड़ी मोहल्ला, वी आई पी कालोनी, बजरी कम्पनी, हाथी खाना के साथ बिन्दुखत्ता का नाम भी शामिल था। बिन्दुखत्ता में लगभग 90,000 की आबादी होने के चलते यहां के लोग तेजी से संगठित होने लगे। 
    

फिलहाल सत्ताधारी पार्टी को छोड़ सभी पार्टियां व सामाजिक संगठन बिन्दुखत्ता को अतिक्रमण की सूची से हटाने और बिन्दुखत्ता को राजस्व गांव बनाने को लेकर आंदोलनरत हैं। भूतपूर्व सैनिकों की पहल पर कांग्रेस, भाकपा (माले), प्रमएके, पछास, इमके शिल्पकार संगठन, सर्व श्रमिक निर्माण कामगार संगठन तथा अन्य सामाजिक संगठनों ने बैठक कर बिन्दुखत्ता लालकुंआ संघर्ष समिति नाम से मोर्चा बनाया। संयुक्त संघर्ष मोर्चे के तहत एक कोर कमेटी चुनी गयी। बिन्दुखत्ता के सभी इलाकों में मीटिंगें की गईं। संयुक्त संघर्ष मोर्चे में यह तय हुआ कि 7 जून को एक बड़ा प्रदर्शन लालकुंआ में किया जायेगा। इस प्रदर्शन को सफल बनाने के लिए एक पर्चा निकाला गया। शासन-प्रशासन व भाजपा के विधायक-कार्यकर्ता लोगों के बीच में जाकर लोगों को भरमाने का काम करने लगे। एसडीएम द्वारा इंटरव्यू में कहा गया कि जो सूची वायरल हो रही है वह फर्जी है। बिन्दुखत्ता को राजस्व ग्राम 2006 के वनाधिकार अधिनियम के तहत बनाने की प्रक्रिया चल रही है। लोगों के बीच विधायक ने मीटिंगें कीं और 27 तारीख को विधायक ने दानू स्कूल में एक मीटिंग बुलायी जिसमें सैकड़ों लोग पहुंचे। वहां जाकर लोगों को पता चला कि दोनों एसडीएम व विधायक गायब हैं व मात्र तहसीलदार व कोतवाल मौजूद थे। विधायक ने ऑनलाइन वीडियो कॉल कर अपनी तबियत खराब बताते हुए बिन्दुखत्ता को 2006 वनाधिकार अधिनियम के तहत राजस्व गांव बनाने की बात कही और लोगों को कहा कि लोग उनका साथ दें। दरअसल भाजपा व विधायक के लोग 7 जून के प्रदर्शन को विफल करना चाहते थे। अब वे प्रचार करने लगे कि कांग्रेस वोट की खातिर मुद्दा भड़का रही है। जैसे-जैसे 7 तारीख करीब आती गयी भाजपा का दुष्प्रचार बढ़ता गया। पूर्व सैनिक संगठन व ढेरों लोगों को तोड़ने में भाजपा के लोग सफल रहे। वे अंतिम वक्त तक लोगों को 7 जून की रैली में जाने से रोकने की कोशिश करते रहे। वे यह भी प्रचार करते रहे कि बिन्दुखत्ता के साथ नगीना कालोनी, हाथी खाना, वी आई पी गेट की चर्चा कर संघर्ष समिति लड़ाई कमजोर कर रही है। ऐसे में दबाव में संघर्ष समिति को भी अपना प्रचार महज बिन्दुखत्ता पर केन्द्रित करना पड़ा। 
    

7 जून को प्रदर्शन वाले दिन भाजपा के लोगों ने कई टोलियां रोकीं जिससे लोग जुलूस स्थल तक नहीं पहुंच पाये। इसके बावजूद अलग-अलग इलाकों से 3 से 4 हजार तक लोगों की संख्या रही। सुबह 10 बजे से लोग जड़ सैक्टर स्कूल में इकट्ठा होना शुरू हुए। प्रशासन ने भी काफी रोड़े अटकाने का काम किया। जुलूस के लिए अनुमति नहीं दी जिसके बाद पूर्व विधायक दुर्गापाल (कांग्रेस) के हस्तक्षेप से जुलूस हेतु अनुमति मिली। सभा के बाद जुलूस निकाल कर तहसील में जाकर एसडीएम को ज्ञापन सौंपा गया। 
    

ज्ञापन में ये मांगें की गयीं- 
1. बिन्दुखत्ता को अतिक्रमण सूची से हटाया जाये। 
2. बिन्दुखत्ता को राजस्व गांव बनाया जाए। 
3. नगीना बस्ती के लोगों का पुनर्वास व मुआवजा दिया जाये। 
    

इसके अलावा एक अलग ज्ञापन बजरी कंपनी का भी दिया गया। 
    

इस प्रदर्शन के बाद 8 जून को सार संकलन के लिए बैठक हुई। इसमें 9 लोगों की संयोजक कमेटी का चुनाव किया गया। इसके बाद 14 तारीख को बिन्दुखत्ता संघर्ष समिति के लोग डीएम से जनता दरबार में मिलने के लिए गये जिसमें डीएम द्वारा भी जारी सूची को फर्जी बताया गया व वनाधिकार अधिनियम के तहत राजस्व गांव बनाने में सहयोग की अपील की गयी। 
    

इस तरह बिन्दुखत्ता के लोग अपनी बस्ती उजड़ने से बचाने को संघर्षरत हैं। प्रशासन व भाजपा के लोग अभी तक इस बात में सफल हुए हैं कि बिन्दुखत्ता के लोग बजरी कंपनी, हाथी खाना, बंगाली कालोनी, नगीना कालोनी, वीआईपी कालोनी की बात न कर केवल अपनी बात करें। उनके इस प्रचार के असर में संघर्ष समिति के नाम से लालकुंआ शब्द हटा दिया गया है। 
    

संघर्ष समिति को यह समझना होगा कि आज लालकुंआ के छोटे-बड़े सभी मोहल्ले-बस्तियां एकजुट होकर ही अपने को बचा सकते हैं। एक नगीना कालोनी तोड़ने के बाद ही प्रशासन अतिक्रमण की नई सूची लाने की हिम्मत कर पाया। ऐसे ही अगर बिन्दुखत्तावासियों को खुद के मकान टूटने से बचाने हैं तो उन्हें बढ़़ चढ़ कर हाथी खाना, वी आई पी गेट, बंगाली कालोनी वालों का साथ देना होगा। क्योंकि अगर लालकुंआ की ये बस्तियां तोड़ने में प्रशासन सफल हो गया तो वह बिन्दुखत्ता ढहाने का भी हौंसला कर लेगा। आज जरूरत है कि सभी भेद पहाड़ी-देशी, हिन्दू-मुस्लिम भुला लालकुंआ-बिन्दुखत्ता की बस्तियां टूटने से बचाने की साझी लड़ाई लड़ी जाये।         -लालकुंआ संवाददाता

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।