हरियाणा का जिला गुड़गांव जो कि मिलेनियम सिटी के नाम से भी जाना जाता है। यह जिला कई वजहों से चर्चा में रहा है। पहला तो यह कि यह हरियाणा की अर्थव्यवस्था के लिए मुख्य जिला बनता है और देश की अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी इसका योगदान महत्वपूर्ण है।
इसके अलावा मजदूरों के संघर्षों और उनके दमन से जुड़े मामले में 2005 में होंडा के मजदूरों का डी सी कार्यलय में चारों ओर से घेर कर भंयकर दमन किया गया। 2012 में मारुति के मैनेजर की हत्या का आरोप मजदूरों पर लगा कर दमन किया गया और जेल में डाला गया। ऐसे ही साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने के मामले में गुड़गांव चर्चा में रहा। यहां 2023 में नूंह दंगों के बाद गुड़गांव शहर में मुसलमानों पर हमले बोले गए, उनके कारोबार को नुकसान पहुंचाया गया। और मुसलमानों के अंदर दहशत फैलाई गई। इसी क्रम में 2025 की जुलाई में बंगला भाषा के नाम पर पश्चिम बंगाल के मजदूरों की धरपकड़ कर पुलिस प्रशासन ने उनके अंदर दहशत पैदा कर उन्हें यहां से भगाया।
यहां पर नयी-पुरानी, छोटी-बड़ी हजारों कम्पनियां है। यहां कई लाख मजदूर काम करते हैं। मजदूरों के अधिकतर रिहायशी इलाकों की स्थिति बहुत बुरी है। खासकर बरसात के मौसम में तो और भी बुरी स्थिति हो जाती है। ये शहर एक तरफ अमीरों की ऐशगाह बना हुआ है दूसरी ओर आम मेहनतकशों के लिए कष्टकारी जीवन है। यहां पर सैकड़ों अंडरपास बनाए गये हैं जिससे आना-जाना सुगम हो सके और जाम से बचा जा सके। लेकिन ये इंतजाम भी नाकाफी सिद्ध हो रहे हैं। यहां पर सामान्य दिनों में भी मुख्य चौक-चौराहों पर घंटों जाम लगा रहता है। बरसात के मौसम में घंटों के जाम में गुणात्मक वृद्धि हो जाती है।
गुड़गांव में अन्य शहरों या प्रदेशों की तरह नदियों का पानी नहीं आता और न ही यहां ऐसा खतरा है। लेकिन इस शहर में बारिश का पानी ही इतना हो जाता है, लगता है कि बाढ़ आ गयी हो। यह स्थिति इसलिए हो जाती है क्योंकि पानी की निकासी की व्यवस्था उचित ढंग से नहीं की गई है। और शहर के नाले-सीवर कूड़े मिट्टी से अटे पड़े हैं। ये तब है जब संघी सरकार ने जनता की मेहनत के करोड़ों रुपए स्वच्छता अभियान पर खर्च किए। इसके बावजूद भी शहर में कूड़े के ढेर लगे पड़े हैं। जनता से भी सफाई के नाम पर पैसों की उगाही की जाती है। कई जगहों पर सड़कें टूटी हुई और गहरे गड्डे हमेशा रहते हैं। जिससे आमजन का आना-जाना मुश्किल रहता है। ये गड्डे दुर्घटनाओं को आमंत्रित करते रहते हैं।
2 सितंबर की बारिश ने हाई टेक सिटी, मिलेनियम सिटी, साईबर सिटी इत्यादि नामों के शहर की व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी। उस दिन शहर जल भराव की बजह से थम सा गया था। सबसे ज्यादा मुसीबत पैदल चलने वालों के सामने आई। पूंजीपति वर्ग को मुनाफे का हवसी यूं ही नहीं कहा जाता। इतनी अत्यधिक बारिश के कारण भी मजदूरों की जल्दी छुट्टी नहीं की गई। ऐसे मौसम में भी पूरी ड्यूटी कराई गई। पूंजीपति को सिर्फ अपने उत्पादन व मुनाफे से मतलब होता है न कि मजदूरों की दुःख तकलीफ से। ये ही उसका अमानवीय चरित्र है, जिसको वह अपनी शान समझता है। इस प्रकार सरकारी कुप्रबंधन का खामियाजा हमेशा आम मेहनतकश जनता को ही झेलना होता है। -एक पाठक