फिर एक बार महात्मा बुद्ध और फासीवादी हिटलर

Published
Sun, 03/01/2026 - 07:05
/fhir-ek-baar-mahatma-buddha-aur-fascist-hitlar

खबर है कि बिहार सरकार ने धार्मिक स्थलों और शिक्षण संस्थानों के पास मांस-मछली के बेचने पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। बिहार के भाजपाई उप-मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा का कहना है कि मांसाहारी भोजन की खुलेआम बिक्री से युवा और बच्चे हिंसक प्रवृत्ति के हो जाते हैं। यह बात पूरी की पूरी बकवास है।  
    
दुनिया को अहिंसा का संदेश देने वाले महात्मा बुद्ध मांसाहारी थे। उन्होंने नियम बनाया था कि बौद्ध भिक्षुक के भिक्षापात्र में जो भी भोजन डाला जायेगा उसे वे आपस में मिलाकर उसका सेवन करेंगे। प्रसिद्ध है कि महात्मा बुद्ध की मृत्यु सुअर के बासी मांस खाने की वजह से अस्सी वर्ष की अवस्था में अतिसार (दस्त) से हुयी थी। 
    
महात्मा बुद्ध के उलट हिटलर शाकाहारी था। हिटलर ने लाखों यहूदियों को गैस चैम्बर में जिन्दा ही झोंक दिया था। उसके द्वारा छेड़े गये दूसरे विश्व युद्ध में करीब पांच करोड़ लोग मारे गये थे। जिसमें करीब 90 लाख जर्मनी के थे। शाकाहारी हिटलर को पूरी दुनिया में घृणा और नफरत से देखा जाता है। 
    
जाहिर है कि खाने से मनुष्यों के हिंसक या अहिंसक बनने से कोई लेना-देना नहीं है। पूरे देश में अपने आपको शाकाहारी बताने वाले संघ-भाजपा के कार्यकर्ता व नेता समाज में किस-किस ढंग से हिंसा व नफरत फैलाते हैं। इसका आये दिन नजारा देखने को मिलता है। विजय कुमार सिन्हा वही कर रहे हैं। वे किसके और कैसे चेले हैं ये तो उनकी बातों से ही समझ में आ जाता है। 

आलेख

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।