IITs में ट्रोजन हार्स ने सेंध लगाई है -वासुदेवन मुकुंथ

Published
Wed, 07/01/2026 - 15:50
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पिछले कुछ दशकों से, ‘इंडियन नालेज सिस्टम’ (IKS) नाम का एक प्रोजेक्ट पारंपरिक भारतीय ज्ञान को आधुनिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल करने की कोशिश कर रहा है। भारत के अपने बौद्धिक इतिहास को फिर से हासिल करने और एक अनौपचारिक सांस्कृतिक चाहत को शिक्षा का हिस्सा बनाने की कोशिश जायज है- लेकिन आज का IKS वह नहीं है।
    
असली IKS शायद पाणिनि की भाषा- विज्ञान, तर्कशास्त्र के न्याय स्कूल, गणित के केरल स्कूल, वूट्ज स्टील के विकास वगैरह पर ध्यान केंद्रित करता। लेकिन जिस IKS को संस्थागत रूप दिया जा रहा है- जिसमें IIT-मंडी के डायरेक्टर लक्ष्मीधर बेहरा की पहल भी शामिल है- उसका सरोकार ‘‘पौराणिक विज्ञान’’, इतिहास के तौर पर पौराणिक कथाओं, टेक्नोलॉजी के तौर पर रीति-रिवाजों और तथ्यों की पुष्टि (वेरिफायबिलिटी) के प्रति खुले तिरस्कार से है।
    
IKS के ज्यादा आक्रामक रूप को नेशनल एजुकेशन पाॅलिसी (NEP), 2020 के तहत औपचारिक रूप दिया गया। इसकी शुरुआत धातु विज्ञान और प्राचीन गणित में हुई अहम खोजों को दर्ज करने से हुई, लेकिन धीरे-धीरे ऐतिहासिक अध्ययन और धार्मिक पुनरुत्थानवाद के बीच का फर्क धुंधला होता गया। अब IIT-खड़गपुर, IIT-गांधीनगर, IIT-बाम्बे और IIT-कानपुर में IKS हब मौजूद हैं। इनमें से खासकर कानपुर और मंडी के हब ‘‘चेतना’’, पुनर्जन्म और ‘‘वैदिक’’ जीव विज्ञान पर ‘‘रिसर्च’’ के मामले में ‘‘लीडर’’ बनकर उभरे हैं। इन शब्दों को कोटेशन मार्क्स में इसलिए रखा गया है क्योंकि IKS की तरह ही, इनके नाम से जो मतलब निकलता है, असल में इनका काम उससे अलग है।
    

IKS सेंटर्स के समर्थक कहते हैं कि वे भारतीय सोच को ‘‘औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त’’ (decolonise) करने की कोशिश कर रहे हैं। यह बात बेतुकी है। 19वीं सदी के बंगाल पुनर्जागरण के दौरान, जगदीश चंद्र बोस और प्रफुल्ल चंद्र राय जैसी हस्तियों ने भारतीय पहचान को गहन वैज्ञानिक अध्ययन के साथ जोड़ा और साबित किया कि औपनिवेशिक सोच से मुक्ति का मतलब छद्म-विज्ञान (pseudoscience) के लिए रास्ता खोलना नहीं है। IKS सेंटर्स का मकसद IITs के ढांचे में पौराणिक कथाओं पर आधारित जांच-पड़ताल को शामिल करना है, ताकि वे इन संस्थानों की प्रतिष्ठा का इस्तेमाल करके अपनी राजनीतिक-धार्मिक मान्यताओं को वैज्ञानिक वैधता का दिखावा दे सकें।
    
हाल ही में, IIT-मंडी और IIT-कानपुर ने पुनर्जन्म के ‘‘विज्ञान’’ पर एक ‘‘खास सेशन’’ आयोजित किया। इस प्रोग्राम में बच्चों में ‘‘पिछले जन्म की यादों’’ का पता लगाने के लिए EEG डेटा और ज्योतिषीय जन्म कुंडली का इस्तेमाल करने का प्रस्ताव रखा गया। इस इवेंट में वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के ‘डिपार्टमेंट आफ परसेप्चुअल स्टडीज’ (DOPS) के वक्ताओं ने हिस्सा लिया; यह विभाग खुद भी एक विवादित संस्था है।
    
यह घटना उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक संकट जैसी थी। छद्म-विज्ञान (pseudoscience) अब पूरी तरह से संस्थागत रूप ले चुका है, और इसमें शामिल IITs ने धार्मिक मान्यताओं के लिए अपनी शैक्षणिक साख का सौदा करने की इच्छा जाहिर की है। इस कार्यक्रम में मौजूद ‘शोधकर्ताओं’ ने उत्तर भारत के एक छह साल के बच्चे से जुड़े एक सार्वभौमिक आध्यात्मिक दावे के लिए ‘‘व्यवस्थित कार्यप्रणाली’’ बनाने पर चर्चा की। आम तौर पर ऐसी बातों को महज एक किस्सा या व्यक्तिगत अनुभव माना जाता है।
    
सिर्फ एक बच्चे के न्यूरल रिस्पान्स (दिमाग की प्रतिक्रिया) के आधार पर पुनर्जन्म की अवधारणा को ‘सही’ ठहराना भारतीय दर्शन की बेहतरीन परंपराओं के साथ अन्याय होगा। ये परंपराएं इसलिए बेहतरीन नहीं हैं कि वे अपने समय की अनोखी उपज थीं, बल्कि इसलिए हैं क्योंकि उन्हें मानने वाले विचारकों ने अपने पास मौजूद तथ्यों पर ईमानदारी और सावधानी से सोच-विचार किया था। आज हमारे पास जो तथ्य मौजूद हैं, उन्हें देखते हुए भी सिर्फ एक व्यक्ति पर की गई ‘स्टडी’ या ‘डुअलिस्ट थ्योरी’ (पुनर्जन्म) को साबित करने के लिए ‘फिजिकलिस्ट’ तरीके (EEG) का इस्तेमाल करने को सही मानना बेवकूफी है।
    
‘रिसर्चर’ ने बच्चे को उनके ‘‘पिछले जन्म से जुड़ी चीजें’’ (जैसे ‘पिछले जन्म’ के जीवनसाथी की तस्वीरें) दिखाने और दिमाग की प्रतिक्रिया रिकार्ड करने का प्रस्ताव रखा। चूंकि ग्रुप के अपने नियम में टेस्ट से पहले बच्चे के साथ ‘‘जान-पहचान बढ़ाना’’ और ‘‘पिछले जन्म के परिवार’’ से तस्वीरें इकट्ठा करना शामिल था, इसलिए ‘रिसर्चर’ असल में वही चीजें तैयार कर रहे हैं जिनके बारे में वे दावा करते हैं कि वे उन्हें ‘खोज’ रहे हैं। इसे कन्फर्मेशन बायस (अपनी बात सही साबित करने की प्रवृत्ति) कहा जाता है। इसमें ज्योतिष को शामिल करना बेतुका है।
    
IKS सेंटर्स ने ‘‘वेस्टर्न’’ विश्वसनीयता पाने के लिए DOPS के साथ साझेदारी की, लेकिन DOPS का काम अपनी कार्यप्रणाली में ढिलाई के लिए बदनाम रहा है। आलोचकों ने इस बात की ओर इशारा किया है कि मौत और कथित पुनर्जन्म के बीच के समय में, ‘पुराने परिवार’ और ‘मौजूदा परिवार’ के पास मिलने, बातचीत करने और पुनर्जन्म की सांस्कृतिक कहानी के हिसाब से अपनी-अपनी बातें एक जैसी करने का काफी मौका होता है। ‘रिसर्चर्स’ ने इस बात की भी जांच नहीं की कि ‘‘पिछले जन्म की यादें’’ लगभग उन्हीं संस्कृतियों में बताई जाती हैं जहां पहले से ही पुनर्जन्म में विश्वास किया जाता है।

सख्त रवैया
    
सालों तक छात्रों की हिंसा और पाठ्यपुस्तकों में बदलाव के जरिए एकेडेमिया (शिक्षा जगत) को बाहर से बदलने की कोशिशों के बाद, ऐसा लगता है कि हिंदुत्व एजेंडा ने अपनी रणनीति बदलकर ऊपर से नीचे की ओर दबाव डालते हुए ‘अंदर से बाहर’ की ओर बढ़ने का तरीका अपना लिया है। डाक्टरेट के छात्रों के लिए ‘‘खास सेशन’’ में शामिल होना जरूरी कर दिया गया था। इन सेंटर्स ने IIT के फंड और रिसर्च फेलो का इस्तेमाल ‘भूतों की खोज’ के लिए फील्डवर्क के तौर पर किया है। यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) की 2023 की गाइडलाइंस के मुताबिक, हायर एजुकेशन के सभी छात्रों के लिए क्रेडिट पाने के लिए IKS कोर्स करना जरूरी है। IIT के एडमिनिस्ट्रेटर्स जानते हैं कि वे संस्थानों की साख से समझौता कर रहे हैं, लेकिन वे यह जोखिम उठाने को तैयार हैं क्योंकि उनका मकसद वैज्ञानिक नेतृत्व हासिल करना नहीं है। उनका मकसद घरेलू स्तर पर विचारधारा को मजबूत करना है।
    
IITs में छद्म-विज्ञान (pseudoscience) का बढ़ता चलन भारत के बेहतरीन टैलेंट को विदेशों की उन यूनिवर्सिटीज में जाने के लिए बढ़ावा देगा, जो अभी भी उपनिवेश-मुक्ति (decolonising) और विज्ञान के बीच फर्क समझती हैं। इन ‘‘खास सत्रों’’ की वजह से अच्छे अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक IIT की डिग्रियों को कमतर समझने लगेंगे; इससे भारतीय शिक्षा को तर्कसंगतता के वैश्विक मानकों से अलग करके ‘‘आत्मनिर्भर’’ नैरेटिव को भी बढ़ावा मिलेगा। आखिरकार, यह घेरा ऐसा बन जाएगा कि भारतीय स्कालर्स को सिर्फ एक खास सभ्यता-संबंधी प्रोजेक्ट के प्रति उनकी निष्ठा के आधार पर ही आंका जाएगा।
    सौजन्य: द हिंदू, 24 जून, 2026

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