इजरायल-अमेरिका और धर्मयुद्ध

Published
Wed, 04/01/2026 - 15:50
/izrail-amerika-aur-dharmyuddh

इस समय पश्चिमी साम्राज्यवादी दुनिया में और आम तौर पर ही पूंजीवादी उदारवादी दायरों में ईरान पर इजरायल-अमेरिकी हमले की भांति-भांति से व्याख्या करने की कोशिश की जा रही है। दुनिया भर की ज्यादातर सरकारों ने भले ही इस हमले की निन्दा न की हो और इस पर चुप्पी साध ली हो पर सभी इस बात को जानते हैं कि ईरान पर यह हमला हर तरीके से अंतर्राष्ट्रीय नियमों-कानूनों का उल्लंघन है। समय बीतने के साथ जैसे-जैसे ईरान के प्रतिरोध से स्पष्ट होता गया है कि स्वयं अमेरिका के लिए यह हमला आत्मघाती साबित हुआ है, इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की जा रही है कि आखिर अमेरिका ने यह हमला क्यों किया?
    
इसके भांति-भांति के जवाब दिये जा रहे हैं। सबसे सरल जवाब तो यही है कि यह अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सनक का परिणाम है। कि आत्ममुग्ध ट्रंप ने अपनी सनक में ईरान पर हमला कर दिया, यह सोच कर कि ईरान में कुछ वैसा ही करने में कामयाब हो जायेगा जैसा उसने वेनेजुएला में किया। कि वह कुछ वैसा हासिल कर जायेगा जैसा पिछली आधी सदी में कोई दूसरा अमरीकी राष्ट्रपति नहीं कर पाया। 
    
दूसरा जवाब यह है कि ट्रंप को ऐसा करने के लिए इजरायली प्रधानमंत्री बेन्जामिन नेतन्याहू ने उकसाया। उसने सनकी ट्रंप की आत्ममुग्धता का फायदा उठाया और ट्रंप उसके जाल में फंस गया। इजरायल पश्चिम एशिया में एकछत्र वर्चस्व चाहता है और ईरान इस रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है। बेन्जामिन नेतन्याहू एक लम्बे समय से ईरान को तबाह करने की मंशा पाले हुए था। उसने कई अमरीकी राष्ट्रपतियों को ईरान पर हमले के लिए उकसाने की कोशिश की पर कामयाब नहीं हो पाया। अब वह सनकी ट्रंप को उकसाने में कामयाब हो गया है। यह असल में इजरायल का युद्ध है जिसे अमेरिका लड़ रहा है। इसी का दूसरा संस्करण यह है कि नेतन्याहू ने ट्रंप को फुसलाया नहीं है बल्कि एप्स्टीन फाइल का इस्तेमाल कर ब्लैकमेल किया है। 
    
तीसरा जवाब यह है कि ट्रंप को ईरान पर हमले के लिए नेतन्याहू ने नहीं बल्कि अमेरिका स्थित इजरायली लॉबी ने उकसाया है। इस इजरायली लॉबी का अमेरिका की दोनों प्रमुख पार्टियों - डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन- के नेताओं पर भारी प्रभाव है। वे अमरीकी सरकार की नीतियों को इजरायल के पक्ष में झुकाने में कामयाब होते हैं, भले ही वह स्वयं अमरीकी हित के खिलाफ क्यों न हों। पश्चिम एशिया में अमेरिका की नीति एक लम्बे समय से ऐसी ही रही है जो इजरायल के हित में तो है पर अमरीकी हितों के खिलाफ है। अब ईरान पर अमेरिकी हमले के साथ यह चरम पर पहुंच गया है। 
    
चौथा जवाब दूसरे-तीसरे जवाब का धार्मिक संस्करण है। इसके अनुसार इजरायल और अमेरिका दोनों जगह इस समय ऐसे लोग सत्ता में हैं जो धर्मान्ध हैं और जो पश्चिम एशिया में इजरायली-अमरीकी तांडव को धर्म युद्ध के रूप में देखते हैं। नेतन्याहू और ट्रंप दोनों यह जता चुके हैं कि वे ईश्वर द्वारा किसी खास मिशन के लिए भेजे गये हैं। नेतन्याहू का मिशन है पुरानी बाइबिल के हिसाब से इजरायल का विस्तार और दुश्मनों का विनाश। ट्रंप का मिशन उतना स्पष्ट नहीं है पर उनके समर्थकों में एक भारी संख्या एवेन्जेलिकल ईसाईयों की है जो मानते हैं कि पुरानी बाइबिल के हिसाब से इजरायल की स्थापना के बाद ईसा का पुनरागमन होगा। तब ज्यादातर यहूदियों का विनाश हो जायेगा और ईसाईयों के लिए सुख-समृद्धि के हजार साल का नया काल शुरू होगा। अंतिम परिणाम में भिन्नता के बावजूद यहूदी धर्मान्ध और ईसाई धर्मान्ध तात्कालिक लक्ष्य पर एकमत हैं- पुरानी बाइबिल के हिसाब से इजरायल की स्थापना। इसीलिए अमेरिका में ईसाई धर्मान्ध इजरायल का समर्थन करते हैं हालांकि वे यहूदियों से गहरी नफरत करते हैं। वे यहूदियों के अंतिम विनाश की मंशा से आज यहूदियों और वृहत्तर इजरायल का समर्थन करते हैं। ट्रंप समर्थकों और ट्रंप प्रशासन में ऐसे लोगों की भरमार है। रक्षा या युद्धमंत्री पीट हासेथ तो घोषित तौर पर ऐसा है। इनके अनुसार वे ईरान पर हमले के रूप में एक धर्मयुद्ध लड़ रहे हैं। आज वे मुसलमानों से लड़़ रहे हैं। कल वे यहूदियों से लड़ेंगे। 
    
इन चारों के अलावा दो जवाब और भी हैं हालांकि उन्हें उतना भाव नहीं मिल रहा है। पहला जवाब इजरायल को बचाने के लिए दिया जा रहा है। कुछ इजरायल समर्थक कह रहे हैं कि ट्रंप को इस हमले के लिए इजरायल ने नहीं बल्कि खाड़ी के देशों ने भड़काया। इसमें यू ए ई, साऊदी अरब तथा कतर के शासकों का नाम लिया जा रहा है। अमेरिका के एक बड़े अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने तो बाकायदा एक खबर ही चला दी कि साऊदी अरब के राजकुमार मुहम्मद बिन सुलेमान ने कई बार ट्रंप को फोन कर ईरान पर हमला करने को कहा। 
    
दूसरा जवाब यह है कि यह युद्ध दरअसल दुनिया भर की, खासकर अमेरिका की हथियार बनाने वाली कंपनियों ने उकसाया। उन्हें ही युद्ध से सबसे ज्यादा फायदा है। हमले के बाद से इन कंपनियों के शेयर बढ़ते चले गये हैं। युद्ध से इन कंपनियों को नया व्यवसाय मिलेगा। इनके हथियार खूब बिकेंगे। 
    
इन सारे ही जवाबों की एक खासियत है। इन जवाबों में पूंजीवादी व्यवस्था और पूंजीपति वर्ग सिरे से गायब है। इससे भी आगे साम्राज्यवाद का तो भूले से भी जिक्र नहीं किया जाता। वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले तथा ग्रीन लैण्ड पर कब्जा करने की ट्रंप की धमकी के बाद दबी जुबान से जिस साम्राज्यवाद की चर्चा शुरू हुई थी वह ईरान पर इस हमले के मामले में सिरे से गायब है। बस इक्का-दुक्का लोगों ने जिक्र किया है कि ईरान के तेल पर कब्जा कर अमेरिका चीन को इससे वंचित करना चाहता है। 
    
पूंजीवादी सोच की यह समस्या है कि वह अपने विश्लेषण में स्वयं पूंजीपति व्यवस्था के मूलभूत चरित्र को कभी संज्ञान में नहीं लेती। वह कभी स्वीकार नहीं करती कि यह अन्याय-अत्याचार और शोषण वाली वर्गीय व्यवस्था है जो पूंजीपति वर्ग के हित में उसके हिसाब से चलती है। कि छिपी या खुली हिंसा इसका अनिवार्य तत्व है। इसीलिए लूटपाट और कब्जे के युद्ध इसमें अनिवार्य हैं और उतना ही अनिवार्य है उसका प्रतिरोध। साम्राज्यवाद के युग में, जब पूंजीवादी व्यवस्था मुक्त प्रतियोगिता से एकाधिकारी चरण में प्रवेश कर जाती है, तब यह सब भी नये चरण में प्रवेश कर जाता है। साम्राज्यवाद का मतलब ही है युद्ध!
    
पूंजीवादी सोच इस सबको स्वीकार नहीं कर सकती। इसीलिए पूंजीवादी विश्लेषक घटनाओं-परिघटनाओं की व्याख्या करने के लिए भांति-भांति के कारणों की तलाश करते हैं। और चूंकि पूंजीवादी व्यवस्था एक व्यक्तिवादी व्यवस्था है तो वे अक्सर ही अपनी व्याख्या में व्यक्तिवाद की शरण लेते हैं। व्यक्ति, खासकर सत्ताधारी व्यक्ति सभी अच्छे-बुरे के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। ज्यादा से ज्यादा कुछ व्यक्तियों के समूह को, किसी ‘लॉबी’ को या किसी पार्टी को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है।
    
और चूंकि व्यक्ति ही सारी व्याख्या के मूल में होता है तो सारा ध्यान व्यक्ति पर केन्द्रित हो जाता है। व्यक्ति का व्यक्तित्व, उसकी सोच, उसकी धर्म-जाति इत्यादि सबसे महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इसमें पूंजीपति वर्ग और पूंजीवादी व्यवस्था स्वतः ही आंखों से ओझल हो जाते हैं। 
    
यदि पूंजीवादी विश्लेषकों पर व्यक्तिवादी सोच इस कदर हावी न होती तो वे इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं करते कि अभी कुछ महीने पहले अमरीकी सरकार की ओर से ट्रंप प्रशासन ने अपनी नयी सुरक्षा नीति जारी की थी। इस नीति की स्पष्ट दिशा यह थी कि चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए अमेरिका को भांति-भांति के इंतजाम करने हैं। पश्चिमी गोलार्द्ध को अपना प्रभाव क्षेत्र घोषित करना इनमें से एक था। जहां तक पश्चिम एशिया की बात है, इस नीति में यह स्पष्ट घोषित किया गया था कि वहां ईरान अमरीकी हितों के लिए सबसे बड़ा खतरा है और उससे निपटना है। और चूंकि ईरान से निपटने के लिए पिछली आधी सदी में सारे नुस्खे आजमाये जा चुके थे, इसलिए युद्ध से उसे मटियामेट कर देना ही अब एकमात्र रास्ता बचता था। 
    
असल में ईरान पर इस हमले के बीज तो तभी बो दिये गये थे जब 2023 में चीन ने ईरान और साऊदी अरब के बीच मध्यस्थता कराई थी। इसे तब इस क्षेत्र में अमेरिका की बड़़ी कूटनीतिक असफलता बताई गयी थी। अमेरिकी पश्चिम एशिया से इतनी आसानी से बाहर नहीं हो सकते थे। यह क्षेत्र तेल-गैस और भू-राजनीति की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। कोई आश्चर्य नहीं कि वह पिछली सदी से ही इस कदर उठा-पटक का केन्द्र बना हुआ है। 
    
दुनिया भर में चीन के बढ़ते प्रभाव से निपटने की छटपटाहट ने ही आज अमरीकी साम्राज्यवादियों को इस कदर उद्यत बना दिया है। वे अपने पुराने सहयोगियों की भी चिंता नहीं कर रहे हैं और न किसी नियम-कानून की। ट्रंप तो वह प्यादा या बिजूका है जिसकी आड़ में अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी उद्धत कार्रवाईयों को छिपा रहे हैं। चीजों के अनियंत्रित हो जाने पर वे सारा कुछ ट्रंप के मत्थे मढ़कर दूसरी दिशा में जा सकते हैं। 
    
ईरान के विशिष्ट मामले को ही लें। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने ईरान से अमरीकी पिट्ठू शाह रजा पहलवी की बेदखली को कभी स्वीकार नहीं किया जैसे वे पश्चिम एशिया में किसी भी अमरीकी विरोधी शासन को स्वीकार नहीं करते। 1979 से ही वे ईरानी शिया शासन को उखाड़ने के लिए हर संभव प्रयास करते रहे हैं। उन्होंने इराक को उकसाकर ईरान पर हमला करवाया। उन्होंने ईरान पर कठोर प्रतिबंध लगवाये। उन्होंने ईरान के नेताओं की हत्याएं करवाईं। वहां आंतरिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की। अंत में पिछले साल उस पर हमला कर दिया। और अब यह हमला। ईरान की वर्तमान शिया सरकार को उखाड़कर वहां अपनी पिट्ठू सरकार को बैठाने का प्रयास हर अमेरिकी राष्ट्रपति करता रहा है, चाहे वह डेमोक्रेटिक पार्टी का हो, चाहे रिपब्लिकन पार्टी का। ईरान के खिलाफ हर झूठा दुष्प्रचार हर अमरीकी प्रशासन करता रहा है। यानी ईरान के खिलाफ अमरीकी रुख अमरीकी पूंजीपति वर्ग का रुख है, अमरीकी सरकार का रुख है। यह किसी एक राष्ट्रपति का रुख नहीं है। यहां तक कि सैनिक हमले के द्वारा ईरानी सरकार को उखाड़ फेंकने पर विचार भी हर राष्ट्रपति के दौर में होता रहा है। केवल इसकी कठिनाईयों के मद्देनजर ही इससे बचा जाता रहा है। 
    
अमेरिकी साम्राज्यवादियों के लिए ईरान का मसला इजरायल का मसला नहीं है। वह इसलिए कि इजरायल स्वयं भी उनके लिए साधन है, साध्य नहीं। वे पश्चिम एशिया को अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं। इजरायल की वर्तमान जियनवादी सरकार इस काम में उनकी मददगार है। यदि आज ही इजरायल में कोई गैर-जियनवादी सरकार कायम हो जाये तो अमरीकी साम्राज्यवादी उसी तरह उसके खिलाफ हो जायेंगे जैसे वे आज ईरान के खिलाफ हैं। उन्हें ईरान से नहीं बल्कि ईरान की वर्तमान सरकर से दिक्कत है। वे वहां शाह रजा पहलवी जैसा अपना पिट्ठू चाहते हैं जो ईरान के हितों के हिसाब से नहीं बल्कि अमरीकी हितों के हिसाब से चले। शाह का बेटा पालतू पिल्ले की तरह अमरीका में बैठा ईरान का नया शासक बनने के सपने देख रहा है। 
    
इसलिए अमरीकी साम्राज्यवादी ईरान पर हमला कर इजरायल के हितों को नहीं अपने हितों को साध रहे हैं। लगे हाथों इजरायल को भी मनचाहा मिल रहा है। पर वह अमरीकी साम्राज्यवादियों का लक्ष्य नहीं है। इजरायल स्वयं उनके लिए पश्चिमी एशिया में एक सुव्यवस्थित सैनिक चौकी भर है। इस चौकी का अस्तित्व पूरी तरह से अमरीकी साम्राज्यवादियों के रहमो-करम पर है। यह समर्थन हटते ही इजरायल की स्थिति इस क्षेत्र के अन्य छोटे-बड़े देशों से बेहतर नहीं रह जायेगी। तब उसे रूसी या चीनी शरण में जाना होगा। 
    
इस व्यापक वैश्विक समीकरण तथा पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक समीकरण के मद्देनजर ही ईरान पर अमरीकी-इजरायली हमले को समझा जा सकता है। इसी के तहत फिर अन्य कारकों की भूमिका को भी समझा जा सकता है जिनका शुरूआत में जिक्र किया गया था। ट्रंप वही व्यक्ति है जिसने 2017-20 के अपने पहले काल में ईरान पर हमला नहीं किया हालांकि नेतन्याहू तब भी उसे उकसा रहा था। अब उसने हमला कर दिया। पांच साल बाद ट्रंप गुणात्मक तौर पर बदल नहीं गया। और न बीस साल में वह इतना बदल गया (पहले वह डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थक था)। अमरीकी समाज और दुनिया की गति ट्रंप को राष्ट्रपति की गद्दी तक और फिर ईरान पर हमले तक ले गई। घटनाओं को ट्रंप (या नेतन्याहू) के व्यक्तित्व में नहीं बल्कि उसके व्यवहार को समाज की गति में समझना चाहिए। तभी समझ में आयेगा कि राष्ट्रपति बनते ही शांति का नोबल पुरस्कार पाने वाले ओबामा ने इतने सारे देशों पर हमला क्यों किया और इन सारे हमलों को बंद करवाने का वायदा कर चुनाव जीतने वाले ट्रंप ने गद्दी पर बैठते ही एक के बाद दूसरे देश पर बमबारी क्यों शुरू कर दी। 
    
सत्ताधारी व्यक्तियों का व्यक्तित्व, उनकी सोच, उनके विश्वास और आस्थाएं राजनीति में महत्व रखती हैं पर एक सीमित स्तर पर ही। ज्यादा महत्वपूर्ण वे स्थितियां होती हैं जिनमें वे एक व्यक्ति होते हैं। और ये व्यक्ति स्वयं ही इन स्थितियों की पैदावार होते हैं। संघ की विचारधारा भारत में सौ साल से वही रही है पर भाजपा में वाजपेयी-आडवाणी-मोदी-योगी-हेमन्ता विस्वा शरमा तक का सफर उन स्थितियों का परिणाम है जो भारत में पिछले चार दशकों में निर्मित हुई हैं। 
    
एक लंपट दिखावेबाज व्यवसायी अपनी राजनीतिक आस्था बदलकर रिपब्लिकन पार्टी में आता है और उसके पुराने मंजे हुए नेताओं को किनारे लगाकर अमेरिका का राष्ट्रपति बन जाता है तो यह उसकी व्यक्तिगत काबिलियत का उतना नतीजा नहीं है जितना उन स्थितियों का जिसमें अमेरिका नयी सदी में पहुंच गया था। इस लंपट की खासियत यह है कि इसकी अपनी दृढ़ आस्थाएं नहीं हैं। इसीलिए एक ओर तो वह पूरी निर्लज्जता से जन भावनाओं का दोहन करता है और दूसरी ओर शासक वर्ग उससे अपने मन की करवाता है। इसीलिए यह संभव होता है कि वह दुनिया भर में अमेरिका द्वारा छेड़े गये युद्धों को बंद करने का वायदा कर चुनाव जीतता है और कुर्सी पर बैठते ही नये युद्ध छेड़ देता है। 
    
स्थितियों का हवाला देकर न तो शासकों को दोषमुक्त किया जा सकता है और न ही माफ किया जा सकता है। स्थितियां हमें यह बताती हैं कि शासक जो कर रहे हैं वे क्यों कर रहे हैं। लेकिन उनका वैसा करना अनिवार्य नहीं है। वे विकल्प विहीन नहीं हैं। वे दूसरा भी कर सकते हैं। जब अमेरिका की अधिकांश जनता युद्ध के खिलाफ हो तो शासक भी अपने द्वारा छेड़े गये युद्ध को जायज नहीं ठहरा सकते। तब तो और भी नहीं जब ट्रंप युद्धों का विरोध कर ही राष्ट्रपति की कुर्सी तक पहुंचा हो। उसे किसी भी हालत में माफ नहीं किया जा सकता। यही बात उन सारे शासकों के बारे में है जो ईरान पर अमरीकी हमले को खुला या छिपा समर्थन कर रहे हैं। 
    
लेकिन ट्रंप या अन्य शासकों की भर्त्सना करने मात्र से बात नहीं बनेगी। यह समझना होगा कि ये ऐसा क्यों कर रहे हैं? कौन सी शक्तियां हैं जो उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित या मजबूर कर रही हैं?
    
यह ध्यान रखना होगा कि ट्रंप केवल ईरान में ही तांडव नहीं कर रहा है। वह दुनिया भर में और स्वयं अमेरिका में भी तांडव कर रहा है। दुनिया के सारे देशों के खिलाफ व्यापार युद्ध, कनाडा और ग्रीनलैण्ड को लेकर उसकी धमकियां, वेनेजुएला पर उसका हमला और क्यूबा को धमकी उसके अंतर्राष्ट्रीय तांडव की अन्य निशानियां हैं। देश के भीतर अप्रवासियों के खिलाफ अभियान, विपक्षी या अपनी ही पार्टी के विरोधी नेताओं के खिलाफ सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग, न्यायालयों का अपमान, सरकारी मशीनरी में तोड़-फोड़, चुनाव कानूनों में फेरबदल, उदारवादी मूल्यों के खिलाफ अभियान, इत्यादि उसके आंतरिक तांडव के नमूने हैं। 
    
एक अकेला व्यक्ति यदि सारी दुनिया को उथल-पुथल में धकेल रहा है तो यह उसकी असीम क्षमता का द्योतक नहीं है। यह दुनिया भर में अमरीकी शासक वर्ग की हैसियत और उसकी वर्तमान स्थिति का द्योतक है। पिछले दो-तीन दशकों से अमरीकी शासक वर्ग इधर बढ़ता रहा है। स्वयं अमरीकी इस पर गौर फरमा रहे हैं कि ट्रंप जो कर रहा है वह अचानक नहीं हुआ है। अमेरिका निक्सन के जमाने से ही क्रमशः इधर बढ़ता रहा है। निक्सन प्रकरण के बाद इस पर थोड़ा विराम लगा लेकिन फिर रोनाल्ड रीगन के जमाने से चीजें उसी दिशा में आगे बढ़ गईं। जिसे कहा जाता है, मात्रात्मक परिवर्तन अब गुणात्मक परिवर्तन में बदल गया है। और इस गुणात्मक परिवर्तन के अनुरूप उन्हें ट्रंप जैसा व्यक्ति भी मिल गया है। 
    
अमेरिकी शासक वर्ग क्रमशः इस नतीजे पर पहुंच गया है कि चीजों में गुणात्मक परिवर्तन जरूरी है। तभी वे वैश्विक वर्चस्व कायम रख सकते हैं। सोवियत संघ के विघटन के बाद 1990 के दशक में अमरीकी साम्राज्यवादियों को दुनिया भर में उस एकछत्र वर्चस्व की स्थिति हासिल हुई थी जो 1948-85 के काल में भी नहीं थी। अब वे इस वर्चस्व को पूरी इक्कीसवीं सदी में बनाये रखने को बेचैन हो उठे। ‘इक्कीसवीं सदी की परियोजना’ इसकी सबसे सघन अभिव्यक्ति थी जिस पर जार्ज बुश जूनियर ने चलने का प्रयास किया। अफगानिस्तान-इराक पर हमला इसी परियोजना का हिस्सा था। इस परियोजना के तहत ईरान, सीरिया, लीबिया, सूडान, उत्तरी कोरिया इत्यादि पर हमला होना था। उत्तरी कोरिया को छोड़कर सब पर हमला हो चुका है। ईरान इसकी ताजा कड़़ी है। 
    
लेकिन नयी सदी के आगे बढ़ते-बढ़ते अमरीकी साम्राज्यवादियों को स्पष्ट हो गया कि इक्कीसवीं सदी किसी और दिशा में बढ़ रही है। एक साम्राज्यवादी ताकत के तौर पर रूस के फिर उठ खड़े होने तथा चीन के एक बड़ी साम्राज्यवादी ताकत के रूप में सामने आने के साथ अमरीकी साम्राज्यवादियों की छटपटाहट बढ़ गयी। उन्हें अपने वर्चस्व को स्पष्ट खतरा दिखने लगा। ऐसे में वे अब सारे शर्म-लिहाज छोड़ कर नंगई पर उतर आये और उन्हें अपने उद्देश्यों के अनुरूप उतना ही बेशर्म-नंगा नेता भी मिल गया। जैसा कि कहा जाता है, जरूरत के अनुरूप नेता पा लिया गया। या यह कहना बेहतर होगा कि ढेर सारे नेताओं में से जरूरत के अनुरूप नेता चुन लिया गया। यह जितना ‘प्राकृतिक वरण’ था उतना ही सचेत वरण। उद्धत व्यवहार पर उतारू अमरीकी साम्राज्यवादी पूंजीपति वर्ग को अपने काम का एक लंपट उद्धत नेता मिल गया। उसकी लंपटता और उद्धतपन ही उसका स्वाभाविक गुण है और वही उसे वर्तमान अमरीकी शासक वर्ग के अनुकूल बनाती है। यह अजीब नहीं है कि ट्रंप के विरोधी डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद भी खुलकर दृढ़तापूर्वक ईरान पर अमेरिकी हमले का विरोध नहीं कर रहे हैं। वे बस कानूनी नुक्ताचीनी कर रहे हैं। 
    
अमेरिकी साम्राज्यवादी शासक वर्ग यदि दुनिया भर में अपने वर्चस्व को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है तो वह अपने देश में भारी उथल-पुथल के बिना यह नहीं कर सकता। पिछले अस्सी सालों से अमेरिका की अंदरूनी व्यवस्था दुनिया भर में उसके वर्चस्व के न केवल अनुरूप थी बल्कि उसी पर टिकी थी। अब बाहरी वर्चस्व के खात्मे के साथ यह अंदरूनी व्यवस्था भी चरमरा रही है। इसकी बहुत सारी अभिव्यक्तियां हैं। ट्रंप का ‘अमेरिका को फिर महान बनाओ’ का नारा इसी की वैचारिक अभिव्यक्ति है। 
    
इसीलिए बाहरी पुनर्गठन को भीतरी पुनर्गठन के बिना अंजाम नहीं दिया जा सकता। इसीलिए ट्रंप बाहर-भीतर सब जगह तांडव कर रहा है। या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादी शासक वर्ग बाहर-भीतर सब जगह पुनर्गठन के लिए तांडव कर रहा है। 
    
दुनिया भर की मजदूर-मेहनतकश जनता की तरह अमरीकी मजदूर-मेहनतकश जनता भी अपनी सहज चेतना से जानती है कि अमरीकी शासक वर्ग का यह बाहरी-भीतरी तांडव उसके हित में नहीं है। इसीलिए वह इसके विरोध में है। यदि ट्रंप जनता के एक हिस्से को ‘अमेरिका को फिर महान बनाओ’ नारे के तहत अपने पीछे गोलबंद करता है तो उससे ज्यादा बड़ा हिस्सा ‘नो किंग्स’ (कोई राजा नहीं) के नारे के तहत सड़क पर उतरता है। स्वयं ट्रंप समर्थक भी अब देख रहे हैं कि ट्रंप ने अमरीकी शासक वर्ग के हित में उन्हें धोखा दिया है। वे छले महसूस कर रहे हैं। 
    
साम्राज्यवादियों की फितरत के अनुरूप अमरीकी साम्राज्यवादी रुकने वाले नहीं। वे अपनी उद्धत कार्रवाईयों से खुद को दुनिया और स्वयं अमरीकी जनता के सामने अधिकाधिक नंगा करते जायेंगे। यही उनका काल साबित होगा। तब ‘धर्मयुद्ध’ का कोई लबादा उन्हें बचा नहीं पायेगा। 

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।