नरेन्द्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री बने 12 साल हो गये हैं। 10 जून को श्रीमान जी ने चुने हुए प्रधानमंत्री के रूप मंे लगातार सबसे ज्यादा दिन देश की ‘सेवा’ भी कर ली। पण्डित जवाहरलाल नेहरू का चुने हुए प्रधानमंत्री के पद पर लगातार बने रहने का रिकार्ड, मोदी जी ने तोड़ डाला। इस बात को अखबारों के द्वारा खूब प्रसारित किया गया। क्योंकि किसी तरह से मोदी को सबसे ऊपर दिखलाना है इसलिए ऐसी-ऐसी गणनाएं पेश की जाती हैं कि मोदी ने चुने हुए प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू जी का 4,398 दिन का रिकार्ड तोड़ डाला। मोदी की झूठी शान के चक्कर में भुला दिया जाता है कि नेहरू असल में करीब 17 वर्ष यानी 6,130 दिन प्रधानमंत्री रहे। और इंदिरा गांधी करीब 15 साल (5,829 दिन) देश की प्रधानमंत्री रही हैं। इस तरह तथ्यों को ठीक से देखा जाए तो सबसे अधिक दिन नेहरू व फिर इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री रहीं।
मोदी का महिमामण्डन जुगुप्सा पैदा करता है। वह ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं पैदा करता है कि देश का बड़ा मीडिया ऐसा करता है बल्कि स्वयं मोदी जी का व्यवहार भी जुगुप्सा पैदा करने को मजबूर करता है।
मोदी के सबसे ज्यादा दिन लगातार चुने हुए प्रधानमंत्री के रूप में बने रहने अथवा उनके अब तक के 12 साल देश के लिए कैसे रहे। खासकर भारत के मजदूर-मेहनतकश किसानों, बेरोजगार युवाओं आदि की दृष्टि से देखें तो ये 12 साल उनके जीवन को और अधिक बदहाली में धकेलने वाले साल रहे हैं।
मोदी साहब के प्रशंसक (और वे स्वयं अपने सबसे बड़े प्रशंसक हैं) कांग्रेस के शासन के काले दिनों से मोदी शासन के सुनहरे दिनों की तुलना करते हैं। कांग्रेस के शासन वाले काले दिन बनाम मोदी शासन के सुनहरे दिनों की बहस के जरिये स्वयं मोदी, भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज की सच्चाई पर पर्दा डालते हैं। भारत के मजदूरों-मेहनतकशों के दिन तब भी तंगहाली, बदहाली में गुजरते थे और आज तो हालात बद से बदतर हो गये हैं। मजदूरी वास्तविक तौर पर गिरते-गिरते आज वहां पहुंच गयी है कि पिछले दिनों मजदूरों का स्वतः स्फूर्त जन आक्रोश सड़कों पर फूट पड़ा। मोदी सरकार ने मजदूरों का शोषण-उत्पीड़़न, जहां तक मर्जी आये वहां तक निचोड़ने का अधिकार देशी-विदेशी पूंजीपतियों को दे दिया। मोदी सरकार द्वारा बनायी गयी श्रम संहितायें इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
यही बात एक दूसरे रूप में किसानों खासकर छोटे-मझौले सीमांत मेहतनकश किसानों पर लागू होती है। काले कृषि कानून मोदी सरकार देशी-विदेशी पूंजीपतियों के हित में ही लायी थी। और जब किसानों ने इस बात को अच्छे ढंग से समझकर सड़कों पर उतरने का फैसला लिया तो मोदी सरकार ने किसानों का दमन व उनके आंदोलन को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़़ी थी। पाकिस्तानी एजेण्ट, देशद्रोही, खालिस्तानी और न जाने क्या-क्या कहा। सैकड़ों की संख्या में किसान काले कृषि कानूनों के विरोध में पैदा हुए आंदोलन के दौरान मारे गये। एक साल तक चले लम्बे, जुझारू किसान आंदोलन ने जब मोदी के होश ठिकाने लगाये तब जाकर कृषि कानून उसी प्रक्रिया से वापस हुए जिस प्रक्रिया से पास कराये गये थे।
मोदी राज में भारत के मुसलमानों, ईसाईयों को लगातार निशाना बनाया गया। खासकर भारत के गरीब मेहनतकश मुसलमानों का जीना हराम कर दिया गया। मुसलमानों के खिलाफ घृणित एजेण्डे व हमले की अगुवाई स्वयं मोदी ने की है। हर चुनाव को जीतने के लिए घृणित साम्प्रदायिक दुष्प्रचार किया गया। जब देश का प्रधानमंत्री देश के संविधान और उसके प्रति ली गयी शपथ को रोज-रोज दरकिनार करता हो तब शेष भाजपा-संघ के नेता पीछे क्यों रहते। शहर-शहर, गांव-गांव में लम्पट ही नहीं बल्कि वह हर कोई जो चुनाव लड़ना या जीतना चाहता हो वह मोदी के मुसलमान विरोधी कुत्सा प्रचार के नक्शेकदम पर चलने लगा। राजनैतिक कैरियर बनाने का यह साधन सबसे ज्यादा मोदी जी ने ही प्रयोग किया। योगी, धामी, हिमंता विस्वा सरमा आदि, आदि तो यही साबित करने में लगे रहते हैं कि मोदी के असली चेले व वारिस वही हैं। इन 12 सालों में सैकड़ों की संख्या में मुसलमानों को मार दिया गया, हजारों को जेल में ठूंस दिया गया और हजारों-हजार लोगों के घरों व अन्य सम्पत्तियों को कथित बुलडोजर न्याय के तहत ध्वस्त कर दिया गया। यही कुछ ईसाईयों के साथ किया गया परन्तु मुसलमानों की तरह उन्हें बड़ा निशाना नहीं बनाया गया।
जैसा हाल मोदी राज में मुसलमानों का है कुछ-कुछ वैसा ही हाल अन्य शोषित-उत्पीड़ित तबकों का है। दलित, आदिवासी, औरतों के हाल खासकर इनके मेहनतकशों के हाल इन 12 सालों में सुधरने के बजाय और बिगड़े ही हैं। मेहनतकश दलितों के लिए शिक्षा-स्वास्थ्य-रोजगार पाना मुश्किल होता गया है। मोदी ने उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों को बहुत तेजी से लागू किया। इसका स्वाभाविक नतीजा निकला कि आरक्षण बेमानी होता गया है। निजी क्षेत्र में आरक्षण है नहीं और सरकारी-सार्वजनिक क्षेत्र सिकुड़ते गये हैं। इसके ऊपर से हिन्दू फासीवादी राजनीति ने दलितों के उत्पीड़न को तेज ही किया है। यही बातें देश के आदिवासियों पर भी लागू हो जाती हैं। ‘माओवादियों’, ‘नक्सलवादियों’ के सफाये के नाम पर मध्य-पूर्व भारत में हजारों की संख्या में आदिवासियों को जेल में ठूंस दिया गया। विस्थापित आदिवासियों की संख्या भी हजारों में है।
मोदी राज में महिलाओं के ऊपर अत्याचार बढ़़ते ही गये हैं। एक से बढ़कर एक अपराधी मोदी राज में केन्द्र से लेकर राज्यों तक में मंत्री बन बैठे। स्वयं मोदी के चरित्र के दामन पर कई छीटें हैं। एपस्टीन फाइल में मोदी और उनके मंत्रियों के नाम हैं। फर्जी साधु-महात्माओं जिन पर बलात्कार, हत्या, यौन उत्पीड़न के आरोप हैं उनके कनेक्शन भाजपा व संघ से हैं। आशाराम, रामरहीम जैसे अपराधी संत का चोला पहने हुए हैं और इन्हें भाजपा सत्ता का संरक्षण हासिल रहा है।
बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक असमानता मोदी राज में बढ़ती गयी है। एक ओर हर वर्ष देश में नये अरबपति मजदूरों-मेहनतकशों के बढ़ते शोषण-उत्पीड़न व प्राकृतिक सम्पदा को लूटने से तैयार हो रहे हैं तो दूसरी ओर ऐसे लोगों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ रही है जो बस किसी तरह जिन्दा हैं। देश को लूटकर जाने वाले विजय माल्या, नीरव मोदी, ललित मोदी, मेहुल चैकसी जैसे भाजपा-संघ के एक समय के दुलारे विदेशों में ऐश कर रहे हैं। भ्रष्टाचार, काला धन को खत्म करने का दावा करने वाले मोदी के राज में भ्रष्टाचार और अधिक संस्थागत खास तौर पर ऊपरी संस्तरों पर फैला हुआ है। ध्वस्त होते पुल, उखड़ती सड़कें, ‘भारत मण्डपम’ का हाल यह बयां करता है कि मोदी के भ्रष्टाचार के खिलाफ दावे कितने खोखले रहे हैं। उलटा मोदी जी ‘पीएम केयर्स फण्ड’, ‘इलेक्ट्रोरल ट्रस्ट’, ‘इलेक्ट्रोरल बाण्ड्स’ आदि के जरिये पूंजीपतियों से वसूली करने और फिर उन्हें लाभ पहुंचाने की विधा को ‘कुशल राजनैतिक प्रबंधन’ की संज्ञा से नवाजते हैं। पूंजीपतियों के काले कारनामों से मोदी जी ने आंखें मूंदी हुयी हैं।
ठीक इसी तरह मोदी राज में संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल विपक्षी पार्टियों, नेताओं को साधने, अपने पाले में लाने, डराने-धमकाने में किसी भी हद तक जाकर हो रहा है। ईडी, सीबीआई, चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं मोदी-शाह के जूतों के नीचे रौंदी जा रही हैं। यही हाल न्यायालय यहां तक कि उच्चतम न्यायालय का है। रंजन गोगोई जैसे न्यायाधीश मोदी-शाह के मुताबिक फैसला देते हैं और उसके अनुरूप अभयदान या उसकी कीमत पाते या वसूलते हैं। सच्चे न्यायाधीश का हाल मोदी-शाह काल में जज लोया सरीखा हो जाता है।
मोदी काल में लोकतंत्र (जो कि एक पूंजीवादी लोकतंत्र है) दिनों दिन वहां पहुंच गया है जहां फासीवाद (हिटलर-मुसोलिनी राज) की आहट हर ओर से सुनायी दे रही है। हिन्दू फासीवाद आज के भारत की एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने है। इस हिन्दू फासीवाद को अम्बानी, अडाणी टाटा, मित्तल जैसे सबसे बड़े भारतीय पूंजीपतियों का आशीर्वाद प्राप्त है।
कुल मिलाकर मोदी के 12 साल (या बाकी के भी) भारत के इतिहास में काले अध्याय के रूप में ही जाने जायेंगे। यह काल भारत के भविष्य को दांव पर लगाने और देशी-विदेशी पंूजीपतियों के पौ बारह के रूप में ही जाना जायेगा। मोदी की चुनावी सफलताओं की खुलती पोल बता रही है कि मोदी जी ने किस तरह की तिकड़मों से सत्ता पायी और कैसे हथकण्डों से सत्ता को अपने हाथों में बनाकर रखा।
भारत के ही नहीं बल्कि दुनिया के इतिहास में कई तानाशाह, कई धूर्त-क्रूर शासक, कई तिकड़मबाज आये और गये। इतिहास में मोदीजी को कभी भी अच्छे शासकों में नहीं चालाक, धूर्त, प्रपंची शासकों की श्रेणी में ही रखा जायेगा। वाल्मीकीय रामायण में राजाओं की तीन कोटि बतायी गयी हैं। उत्तम, मध्यम और अधम। मोदी दुर्भाग्य से तीसरी कोटि के शासक हैं।