पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध

Published
Mon, 03/16/2026 - 07:06
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फरवरी माह के अंत में पाकिस्तान- अफगानिस्तान सीमा एक बार फिर से सुलग उठी। 27 फरवरी को पाकिस्तान सरकार ने अफगानिस्तान के खिलाफ खुले युद्ध की घोषणा कर दी। यह पहली बार है जब पाकिस्तान अफगानी तालिबानियों पर घोषित तौर पर हमले कर रहा है। इससे पहले पाकिस्तान द्वारा अफगानी सीमा के भीतर हवाई हमलों में तहरीक ए तालिबान को निशाना बनाने का दावा किया जाता रहा है। तालिबान ने भी पाकिस्तान के कब्जे वाली सीमा चौकियों पर हमला किया है और कई चौकियों को अपने कब्जे में लेने का दावा किया है। 
    
2021 में तालिबान द्वारा दूसरी बार सत्ता हासिल करने के बाद से पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच 75 झड़पों के हो चुकने का अनुमान है। अक्टूबर 2025 में इन झड़पों ने 8 दिन की लड़ाई का रूप लिया। इस लड़ाई का अंत कतर, तुर्की और साऊदी अरब की मध्यस्थता में हुए एक समझौते के जरिये हुआ। लेकिन, समझौते को लागू करने की प्रक्रिया के दौरान बातचीत अटक गयी। आज जब ईरान के ऊपर अमेरिकी-इजरायली हमले ने सारी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींच रखा है, उसी समय पड़ोस में पाकिस्तान तालिबान का नामोनिशां मिटा देने की कसमें खाते हुए अफगानिस्तान में हवाई और जमीनी हमले कर रहा है। इन हमलों की वजह से दशकों से सताई हुई अफगानी जनता फिर से एक जगह से दूसरी जगह विस्थापित हो रही है।
    
तनाव के बार-बार फूटने के लिए पाकिस्तान तालिबान को जिम्मेदार ठहरा रहा है। पाकिस्तान का कहना है कि पाकिस्तान के भीतर आतंकी हमले करने वाले संगठनों को तालिबान अपने यहां पनाह देता है। पाकिस्तान आरोप लगाता है कि इसके लिए भारत तालिबान को शह दे रहा है। इसके उलट तालिबान का कहना है कि पाकिस्तान अपने भीतर समस्याओं को हल न कर पाने पर अपनी कमी छिपाने के लिए तालिबान पर दोष मढ़ रहा है। साथ ही, तालिबान, पाकिस्तान व अफगानिस्तान के बीच अंग्रेजों द्वारा अपने औपनिवेशिक हितों में खींची गयी डूरंड सीमा रेखा को मानने से इंकार करता है। यह सीमा विवाद भी पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच विवाद का एक बुनियादी मसला है। 
    
आज पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए जिस तालिबान की आलोचना कर रहा है, उसे खड़ा करने में पाकिस्तान की बड़ी भूमिका रही है। अमेरिकी साम्राज्यवादियों से सांठ-गांठ में पाकिस्तान ने तालिबान को मजबूत किया। पाकिस्तान की चाहत यही रही होगी कि सत्ता हासिल करने के बाद तालिबान अगर कठपुतली नहीं भी बनता है तो संश्रयकारी तो जरूर होगा। लेकिन आज की उथल-पुथल भरी दुनिया में देशों के बीच के समीकरण इतने सरल और सीधे नहीं हो सकते। 
    
पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंध में इन दोनों देशों के आपसी मसलों की भूमिका के साथ-साथ भारत-चीन-अमेरिका के हित और अंतर्विरोध भी अपनी भूमिका निभा रहे हैं। चीन की बेल्ट रोड परियोजना के लिए पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों महत्वपूर्ण हैं। पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव का असर इस परियोजना पर पड़ रहा है और इसके कार्यान्वयन में देरी हो रही है। चीन भी अफगानिस्तान के अनियंत्रित आतंकी समूहों को खतरे के रूप में देखता है, लेकिन साथ ही वह पाकिस्तान- अफगानिस्तान में साथ काम कर सकने लायक रिश्ते भी चाहता है। अमेरिका बेआबरू होकर अफगानिस्तान से निकल जरूर गया है लेकिन वह इसे इतनी आसानी से चीन के प्रभाव में जाने भी नहीं देना चाहता है। पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव के बीच वह खुलकर पाकिस्तान की तरफदारी कर रहा है और तालिबान को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से मिल रही आर्थिक मदद में कटौती की मांग कर रहा है। विदेश नीति के हर मसले की तरह पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव के मसले पर भी भारत सरकार कोई ठोस नीति नहीं तय कर पा रही है। वैसे तो पिछले कुछ समय से तालिबान के साथ भारत के रिश्ते सुधरे हैं। इस बात की भी संभावना है कि पाकिस्तान को घेरने के लिए भारत तालिबान के साथ कुछ तालमेल बिठा रहा हो। लेकिन, पाकिस्तान के बरक्स एक पिछड़़ी और कमजोर ताकत पर खुलकर दांव लगाने के भी अपने खतरे हैं। इस सब के बीच पाकिस्तान अफगानिस्तान की सीमा पर खूनी झड़पें जारी हैं। अफगानिस्तान के तो अंदरूनी हिस्सों तक पाकिस्तानी गोले-बारूद मार कर रहे हैं। इन दोनों देशों के मजदूर मेहनतकशों के खून से इनके शासकों के हाथ रंगे हुए हैं।   

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