फासीवादी निजाम की ओर एक कदम और

साम्प्रदायिक नागरिकता (संशोधन) कानून

आखिरकार जिसका इंतजार था वही संघी सरकार ने किया है मगर अलग तरीके से। चार साल पहले जब नागरिकता कानून (संशोधन) 2019 बना था और फिर इसी दौर में संसद में खम ठोककर गृहमंत्री ने कहा था कि देश में एन आर सी होकर रहेगी, तब इसका व्यापक विरोध हुआ था। विरोध भी सबसे पहले उसी असम से हुआ था जहां एन आर सी का परिणाम सामने आ चुका था। इस एन आर सी का ही नतीजा था कि असम में तकरीबन 19 लाख से ज्यादा लोग नागरिकता के दायरे से बाहर कर दिए गए जिसमें अधिकतर हिन्दू समुदाय से थे। असम में जिस वजह से एन आर सी (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) लागू की गई थी उसी वजह से मोदी-शाह की सरकार के सी ए ए का व्यापक और उग्र विरोध की शुरुआत भी यहीं से हुई थी। असम के मूल निवासी सी ए ए के जरिए किसी को भी नागरिकता देकर असम में बसाये जाने की आशंका के चलते सी ए ए का विरोध कर रहे थे। जबकि देश के बाकी हिस्सों में इसका विरोध नागरिकता कानून के सांप्रदायिक रुख और एन आर सी होने पर नागरिकता जाने के खतरे के चलते हो रहा था।
    
इस व्यापक विरोध के बाद गृहमंत्री और प्रधानमंत्री को बार-बार कहना पड़ा कि देश में एन आर सी नहीं होगी। बाद में सरकार ने संघर्ष के दबाव में इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया था। इस वक्त व्यापक विरोध की एक खास वजह थी वह यह कि संघी सरकार ने साफ कहा था कि आधार कार्ड, वोटर कार्ड, राशन कार्ड जैसे बुनियादी दस्तावेज मान्य नहीं होंगे। असम में एन आर सी के लिए भी नागरिकता की पहचान के लिए भी, ये दस्तावेज मान्य नहीं थे। मोदी सरकार इसी आधार पर देश भर में एन आर सी कराने की बात बार-बार कह रही थी। साथ ही यह भी कह रही थी कि यह नागरिकता छीनने का नहीं बल्कि देने का कानून है।
    
नागरिकता संशोधन कानून (2019) के जरिए मोदी सरकार ने मनमाने तरीके से तीन देशों पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश के गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के प्रावधान कर दिए थे। लंबे समय से असम और फिर देश के बाकी हिस्सों में गरीब अप्रवासियों को अवैध मुस्लिम अप्रवासी के रूप में, वह भी दीमक और घुसपैठिये के बतौर प्रचारित करने में संघी अफवाह मशीनरी ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। 
    
इस घोर सांप्रदायिक नागरिकता कानून में जानबूझकर मुस्लिम धर्म को छोड़ा गया था। मुस्लिमों को घुसपैठिए और दीमक तथा देश में खतरे के बतौर बताने, उन्हीं को हर समस्या की जड़ बताने वाले संघियों ने, इस तरह बहुसंख्यक हिंदुओं को अपने पीछे लामबंद करने के लिए नागरिकता कानून में मनमाना संशोधन किया था।
    
इसे ठंडे बस्ते में डालने को विवश होने के बाद अंततः सोची समझी योजना के तहत फिर से संघी ठीक चुनाव से पहले इसे ले आए। इसकी एक खास वजह असम ही थी जहां बहुसंख्यक हिन्दू जो पिछली बार नागरिकता के दायरे से बाहर रह गए थे, उन्हें इसके दायरे में ले आना; साथ ही पश्चिम बंगाल में मेतुवा समुदाय को अपने पक्ष में लामबंद करना था। जबकि इसकी आम वजह तो पूरे देश के भीतर अपने फासीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाना है, बहुसंख्यक हिंदुओं को अपने पक्ष में लामबंद करना है।
    
दरअसल भाजपा सरकार धार्मिक भेदभाव करते हुए नागरिकता देने का काम पहले ही शुरू कर चुकी थी। 1955 के नागरिकता कानून के तहत ही उसने 7 राज्यों के 31 जिलों के जिलाधिकारियों को उक्त 3 देशों के गैर मुस्लिमों को नागरिकता देने की छूट प्रदान कर दी थी। गृह मंत्रालय की 2021-22 की रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर 2021 तक इस तरह 1414 गैर मुस्लिमों को नागरिकता प्रमाण पत्र दिए गए थे। 
    
यद्यपि सरकार इस कानून को नागरिकता देने वाला बता इससे किसी की नागरिकता न छीनने की बात कर रही है पर भविष्य में एन आर सी लागू कर वह देश में रह रहे तमाम वंचित समुदायों से नागरिकता छीन सकती है। मुस्लिम समुदाय के लोगों को वह विशेष तौर पर लक्षित कर सकती है। यद्यपि असम की तरह इस प्रक्रिया के निशाने पर आदिवासी व अन्य वंचित समुदाय भी आयेंगे।
    
यदि एक जनपक्षधर सरकार होती या एक समाजवादी सरकार होती तो वह धर्मनिरपेक्ष तरीके से देश के भीतर रहने वाले सभी अप्रवासियों को बिना किसी भेदभाव के नागरिकता दे देती। सभी के लिए सम्मानजनक रोजगार की व्यवस्था करती। 
    
मगर पूंजीवादी समाज में, वह भी इसके संकटकालीन दौर में अप्रवासी मजदूरों या कामगारों को रोकने के लिए आम तौर पर ही सारे प्रयास शासक करते हैं। देश के भीतर बेरोजगारी के लिए इन्हें दुश्मन के बतौर प्रस्तुत करके इन पर निशाना साधते हैं जबकि दूसरी ओर पूंजीपतियों की पूंजी को पूरे देश के भीतर बिना किसी रोक टोक के आने की छूटें होती हैं। 
    
यही करतूतें फासीवादी मोदी सरकार की भी हैं। विदेशों में घूम घूमकर पूंजी को देश में लाने की मिन्नतें करने वाले मोदी और उनकी सरकार, अप्रवासियों विशेषकर मुस्लिमों को दीमक और घुसपैठिया कहते हैं। एक ओर इनको नागरिकता के दायरे से पूर्णतः बाहर कर यातना केंद्रों में भेजने की योजना बनाती है तो दूसरी तरफ हिटलर की तरह मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ कानूनों को भी लक्षित करती है। समग्रता में ये सभी मजदूरों-मेहनतकशों को अपने निशाने पर लेती हैं। 
    
कुल मिलाकर मोदी सरकार अभी नागरिकता के मामले में पीछे हटी है मगर इसका कोर यानी केन्द्रीय चीज बची हुई है वह है सांप्रदायिक आधार पर नागरिकता देना। अभी यह फासीवादी एजेंडा समाप्त नहीं हुआ है बल्कि आने वाले वक्त में यह एजेंडा देश के भीतर नागरिकता की पहचान करने के रूप में सामने आएगा।

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