फासीवाद / साम्प्रदायिकता,

75 वर्ष : भागवत-मोदी दोनों की गले की हड्डी

/75-years-bhagavat-modi-donon-ke-gale-ki-haddi

बीते दिनों संघ प्रमुख मोहन भागवत ने 75 वर्ष पूरे होने पर रिटायर होने व नये लोगों को आगे आने का मौका देने की बात कर मोदी को याद दिला दिया कि वे बहुत जल्द 17 सितम्बर 25 को

कांवड़ यात्रा और धर्म के ठेकेदार

/kanvar-yatraa-aur-dharm-ke-thekedaar

कांवड़ यात्रा शुरू होते ही हिन्दू धर्म के संघी लम्पट ठेकेदारों को भी रोजगार मिल जाता है। रोजगार समाज में मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने का, गुंडागर्दी करने का, मारपीट करने

सबसे बड़ा कालनेमि कौन

/sabase-bada-kaalinemi-kaun

पिछले दिनों से उत्तराखण्ड सरकार ने ‘आपरेशन कालनेमि’ चलाया हुआ है। इस पुलिसिया आपरेशन के तहत पुलिस वाले साधु वेष या भगवा वस्त्र पहने हुए लोगों की जांच पड़ताल कर रहे हैं। घो

मणिपुर के बाद महाराष्ट्र में आग लगाते शासक

/manipur-ke-baad-maharashtra-mein-aag-lagaate-shashak

पिछले दिनों महाराष्ट्र सरकार के शिक्षा विभाग ने स्कूलों में कक्षा एक से पाठ्यक्रम में तीसरी भाषा के रूप में हिंदी लागू करने का फैसला लिया। अभी तक राज्य में मराठी और अंग्रेजी ही पहली कक्षा से पढ़ाई ज

मुसलमानों का यथार्थ और राष्ट्रवाद का मिथक -देवेन्द्र

/musalmanon-kaa-yatharth-and-rashtravaad-ka-mithak-devendra

गांव को लेकर हमारे जीवन और जेहन में जितनी भी यादें हैं, उसमें घर वालों के अलावा सबसे ज्यादा आत्मीय याद समतुल्लाह चाचा की ही है। उनके बगैर मेरे घर की कोई दिनचर्या उन दिनों

‘‘लोकतंत्र के रक्षक’’ हिंदू फासीवादी

/loktantra-ke-rakshak-hindu-fascist

26 जून आते ही संघी सरकार और मोदी-शाह की जोड़ी को इन्दिरा गांधी की बार-बार याद आ जाती है। हर जोड़-तोड़ और लफ्फाजी में माहिर संघी अपने विरोध को अपने पक्ष में मोड़ लेने की कलाबा

चुनाव आयोग की ‘एन आर सी’ का विरोध जरूरी

/election-commission-ki-n-r-c-kaa-virodha-jaroori

25 जून से भारत के चुनाव आयोग ने बिहार में मतदाता सूची में गहन पुनरीक्षण की शुरूआत की घोषणा की है। बिहार में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। इसके साथ ही यह खबर भी

जब राष्ट्रवाद बस अंधराष्ट्रवाद बन कर रह जाये!

/jab-rashtravaad-bas-andhrashtravaad-ban-kar-rah-jaaye

राष्ट्रवाद एक ऐतिहासिक परिघटना है जिसका पहले प्रगतिशील पहलू प्रधान था, अब प्रतिक्रियावादी पहलू प्रधान है। समाज की गति में इसकी जड़ें थीं- पूंजीवाद की उत्पत्ति और विकास में। प्रगतिशील राष्ट्रवाद ने समाज को आगे ले जाने का काम किया। अब प्रतिक्रियावादी राष्ट्रवाद समाज को आगे जाने में बाधा बन रहा है। और पूंजीपति वर्ग अंधराष्ट्रवाद के रूप में इसका इस्तेमाल कर रहा है।

आलेख

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।