सावित्री बाई फुले के जन्म दिवस पर परिचर्चा

Published
Fri, 01/16/2026 - 07:17
/savitri-bai-phule-ke-janm-diwas-par-paricharcha

दिनांक 3 जनवरी को प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र द्वारा भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले के जन्मदिवस पर विचार गोष्ठी-परिचर्चाओं का आयोजन किया गया। रामनगर, हरिद्वार, लालकुआं, काशीपुर में ये परिचर्चाएं आयोजित की गयीं। 
    
परिचर्चा में कहा गया कि सावित्री बाई ने जब लड़कियों को पढ़ाने की शुरूवात की तब समाज के लोगों ने उनका विरोध किया। लोग सावित्री बाई फुले के ऊपर गोबर-कीचड़ फेंकते थे, गाली देते थे। लेकिन वे इससे हताश होकर नहीं बैठीं। इसी तरह सावित्री बाई फुले और ज्योतिबा फुले को उनके घर वालों ने घर से निकाल दिया। जिसके बाद फातिमा शेख और उनके भाई ने उन्हें अपने घर में रखा। वहीं पर सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख ने मिलकर महिलाओं के लिए पहला स्कूल खोला।  
    
सावित्री बाई फुले ने महिलाओं को पढ़ाने की पहल के अलावा बाल विवाह के खिलाफ, विधवा महिलाओं के बाल उतारने के खिलाफ, विधवा पुनर्विवाह के लिए संघर्ष किया। छुआछूत जैसी तमाम ब्राह्मणवादी सोच के खिलाफ भी वह लगातार संघर्ष करती रहीं।
    
समाज में प्लेग जैसी बीमारी फैलने के बाद सावित्री बाई फुले और उनके दत्तक पुत्र ने मरीजों का इलाज और सेवा की। इसी के कारण सावित्री बाई फुले को प्लेग की बीमारी लग गई जिसके कारण 28 नवंबर 1897 को उनकी मृत्यु हो गई। 
    
रामनगर में प्रगतिशील महिला एकता केंद्र द्वारा ग्राम पटरानी में विचार गोष्ठी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। गोष्ठी में सावित्री बाई फुले के जीवन संघर्ष एवं आज महिलाओं की स्थिति पर व्यापक चर्चा की गई। इस दौरान छात्राओं द्वारा ‘‘सावित्री बाई और ज्योतिबा फुले का पैगाम’’ नामक नृत्य नाटिका भी प्रस्तुत की गई। इसके अलावा गोष्ठी में महिलाओं के जीवन के दुःख-दर्द और संघर्ष को प्रस्तुत करने वाले प्रगतिशील गीतों, कविताओं व कुमाऊंनी लोक गीतों के साथ गैर बराबरी के विरुद्ध संघर्ष को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया गया। 
    
इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि पढ़ने-लिखने का अधिकार मिल जाने के बावजूद आज भी महिलायें गैर बराबरी व भेदभाव का शिकार हैं। समाज में महिलाओं के प्रति यौन हिंसा लगातार बढ़ रही हैं। उत्तराखण्ड की अंकिता भंडारी एवं उन्नाव बलात्कार पीड़िता के अपराधी तो खुद सीधे सत्ता से जुड़े लोग हैं। आज सरकार द्वारा बुल्डोजर से गरीब बस्तियां उजाड़ी जा रही हैं। इसकी मार भी सर्वाधिक गरीब कामगार महिलाओं पर पड़ रही है। ऐसे में इस गैर बराबरी और शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष के लिए महिलाओं को संगठित होना ही होगा।            -विशेष संवाददाता

आलेख

/capital-dwara-shram-par-kiya-gaya-sabase-bhishan-hamala

मजदूर-कर्मचारी की परिभाषा में विभ्रम पैदा करने एवं प्रशिक्षुओं व कम आय वाले सुपरवाइजरों को मजदूर न माने जाने; साथ ही, फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) के तहत नये अधिकार विहीन मजदूरों की भर्ती का सीधा असर ट्रेड यूनियनों के आधार पर पड़ेगा, जो कि अब बेहद सीमित हो जायेगा। इस तरह यह संहिता सचेतन ट्रेड यूनियनों के आधार पर हमला करती है। 

/barbad-gulistan-karane-ko-bas-ek-hi-ullu-kaafi-hai

सजायाफ्ता लंपट ने ईरान पर हमला कर सारी दुनिया की जनता के लिए स्पष्ट कर दिया कि देशों की संप्रभुता शासकों के लिए सुविधा की चीज है और यह कि आज शासक और मजदूर-मेहनतकश जनता अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं। 

/amerika-izrayal-ka-iran-ke-viruddha-yuddh

अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी।

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा।