आपदा में अवसर का संघी माॅडल

Published
Mon, 06/01/2026 - 15:50
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हालिया विधानसभा चुनावों में देश की बेहतरीन हालत का ढिंढोरा पीटने के कुछ दिन बाद देश के संघी प्रधानमंत्री ने विदेश की धरती से इसका ठीक उल्टा राग अलापा। उन्होंने कहा कि यह दशक आपदाओं का दशक साबित होने वाला है। पहले कोरोना फिर युद्ध और ऊर्जा संकट। उन्होंने लोगों को आगाह किया कि इस कारण भारी संख्या में वे लोग फिर भुखमरी की स्थिति में चले जायेंगे जो इससे कई दशकों में बाहर आये थे।
    
संघी प्रधानमंत्री का यह बयान काफी चालाकी भरा था। यह देश की गंभीर आर्थिक हालत को स्वीकार करता था पर इसका जिम्मा उन लोगों पर डालता था जिन पर संघी सरकार का कोई बस नहीं था। यही नहीं संघी सरकार का मुखिया चाहता है कि आने वाले समय में लोगों की हालत जो और खस्ताहाल होने वाली है, इसका दोष लोग उसे न दें।
    
संघी प्रधानमंत्री की यह चालाकी काबिले तारीफ है। यह शख्स हर सफलता का श्रेय खुद लेता है। यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत के दामों में गिरावट को वह अपनी अच्छी किस्मत से जोड़ देता है- ‘मोदी किस्मत वाला है’। पर असफलताओं को वह दूसरों के मत्थे मढ़ देता है। दूसरे पिछली सरकारें भी हो सकती हैं और प्राकृतिक आपदाएं भी। 
    
लेकिन आपदाएं तो अपना असर तभी दिखाती हैं जब हालात पहले से इतने खराब हों कि उन्हें झेल न सकें। कोरोना ने दिखाया देश की चिकित्सा व्यवस्था जितनी जर्जर थी उसकी वजह से  पचासों लाख लोग मारे गए। जिन देशों की चिकित्सा अच्छी थी और है वहां कोरोना का इतना भयानक प्रभाव नहीं पड़ा। इसी तरह कोरोना के ज्यादा शिकार वे लोग हुए जिनका स्वास्थ्य पहले से अच्छा नहीं था। ज्यादा स्वस्थ लोग कोरोना के संक्रमण को या उससे जनित बीमारी को झेल ले गए।
    
ठीक इसी तरह यदि भारत बाहरी कारणों से बुरी तरह प्रभावित होता है तो इसी कारण कि भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत पहले से जर्जर है। पिछले सात-आठ सालों से सारे गैर सरकारी अर्थशास्त्री यह बता रहे हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था खड्ड में जा रही है। पर सरकार सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर के फर्जी आंकड़े जारी कर सबको धोखा देने की कोशिश करती रही है कि देश की अर्थव्यवस्था की हालत अच्छी है, कि देश तेज गति से विकास कर रहा है। 
    
हकीकत यह है कि अर्थव्यवस्था का हर क्षेत्र अत्यंत धीमी विकास दर का शिकार है- महज दो-ढाई प्रतिशत। इस विकास का भी लगभग सारा बड़े पूंजीपतियों की जेब में चला जा रहा है। यही नहीं, छोटे पूंजीपतियों और छोटी संपत्तिवालों का धन भी उनकी जेब में चला जा रहा है। मजदूर वर्ग की हालत अधिकाधिक खस्ता हो रही है।
    
एक लंबे समय से तमाम अर्थशास्त्री यह चिन्हित कर रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की अत्यंत धीमी वृद्धि दर का कारण मांग का अभाव है यानी लोगों की आय अत्यंत कम होने के चलते वे खरीद नहीं पा रहे हैं। पर संघी सरकार लोगों की आय बढ़ाने के बदले बड़े पूंजीपतियों पर और लुटा रही है इसके चलते उनका मुनाफा सालाना तीस प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। 
    
आम जन की भयानक बदहाली और बड़े पूंजीपतियों का भयंकर मुनाफा। यह हमारे समाज की हकीकत है। यह हकीकत समाज में भांति-भांति के तनाव और विग्रह को जन्म दे रही है। इसे संघी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिए ढंकने का प्रयास करते रहे हैं। 
    
लेकिन संघी सरकार को पता है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की भी एक सीमा है। हालिया मजदूर उभार ने इसे स्पष्ट तौर पर दिखा दिया। इसीलिए एक ओर तो सरकार अपने दमन तंत्र को मजबूत कर रही है दूसरी ओर ऐसे बहाने ढूंढ रही है जिसकी आड़ में अपनी नाकामियों को छिपाया जा सके। संघी प्रधानमंत्री का आपदाओं का दशक वाला बयान इसी मंशा से दिया गया है। वह पहले से तैयारी कर चुके हैं कि आपदा को अवसर में बदलो और इसकी आड़ में अपनी बारह साल की नाकामयाबियों तथा कुकर्मों को छिपा लो।
 

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