अफ्रीका में मुंह की खाते फ्रांसीसी साम्राज्यवादी

/africa-mein-munh-ki-khate-francisi-imperialist

जुलाई माह में एक महत्वपूर्ण राजनैतिक घटनाक्रम में सेनेगल से फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों को अपनी सेना को हटाना पड़ा। पिछले तीन वर्षों में सेनेगल सातवां देश है, जहां से फ्रांस को बढ़ते उग्र जन विरोध के चलते, अपनी सेना की वापसी करनी पड़ी है, सैन्य अड्डे छोड़ने पड़े हैं। अब अफ्रीकी महाद्वीप में सिर्फ गैबन और जिबूती ही ऐसे देश बचे हैं जहां फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों की सैन्य उपस्थिति बची है। इसमें से जिबूती एक ऐसा देश है जहां फ्रांस के अलावा सं.रा.अमेरिका, चीन आदि देशों के भी सैन्य अड्डे हैं। 
    
सेनेगल में फ्रांसीसी सेना 65 वर्षों से उसकी आजादी के बाद से आज तक जमी हुयी थी। सेनेगल को 1960 में औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति मिली थी। सेनेगल फ्रांस का उपनिवेश था। इसी तरह से जिन देशों से फ्रांस की सेना को भागना पड़ा है वे सभी देश अतीत में फ्रांस के उपनिवेश रहे हैं। वर्ष 2020 से वर्ष 2025 तक फ्रांस को सेनेगल के अलावा बुर्किना फासो, माली, नाइजर, चाड, मध्य अफ्रीकी गणराज्य और आइवरी कोस्ट से भी अपनी सेनाएं, बढ़ते जन आक्रोश के कारण वापस बुलानी पड़ी हैं। पूरे साहेल क्षेत्र में, ‘फ्रांस मस्ट गो’ के नारे लम्बे समय से गूंज रहे थे। इन देशों की स्थिति लम्बे समय से नव-उपनिवेश जैसी बनी हुयी थी। फ्रांसीसी साम्राज्यवादी इन देशों की 1960 के बाद मिली आजादी के समय से लेकर 1990 के दशक के मध्य तक प्रति वर्ष, कम से कम एक बार, सैन्य हस्तक्षेप किसी न किसी बहाने करते रहे थे। और यह सिलसिला थोड़ी कम तीव्रता के साथ इक्कीसवीं सदी में भी बना रहा। फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों के इन सैन्य हस्तक्षेप में हजारों-हजार साहेल वासी मारे गये हैं। ये सातों देश अफ्रीका महाद्वीप के साहेल क्षेत्र में स्थित हैं। 
    
फ्रांसीसी साम्राज्यवादी किसी भी कीमत पर इन देशों में पहले अपने औपनिवेशिक कब्जे को नहीं छोड़ना चाहते थे। और जब इन देशों की जनता ने जुझारू राष्ट्रीय संघर्ष के जरिये अपनी आजादी हासिल की तो फिर उसने किसी न किसी बहाने से अपनी सेनाएं यहां तैनात की हुयी थीं। फ्रांस इन देशों को अपने प्रभाव क्षेत्र के रूप में मानता था। और इन देशों की सत्ता व राजनीति में किसी न किसी रूप में हस्तक्षेप करता था। जहां तक इन देशों के नवोदित शासक वर्ग का सवाल था वह फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों का पिट्ठू ही बना हुआ था। 
    
फ्रांसीसी साम्राज्यवादी गर यह चाहते थे तो अपने देश की जनता से डरे इन देशों के शासक भी फ्रांसीसी सेना को अपने देश में किसी न किसी बहाने बनाये हुए थे। फ्रांसीसी सेना कभी फ्रांसीसी नागरिकों व हितों की रक्षा के नाम पर तो कभी संभावित तख्तापलट को रोकने तो कभी व्यवस्था कायम रखने के नाम पर बनी रहती थी। नब्बे के दशक और उसके बाद तो फ्रांसीसी सेना ‘इस्लामिक आतंकवाद’ और विशेषकर अलकायदा के खतरे से निपटने के नाम पर किसी न किसी तरह सालेह क्षेत्र में जमी रही। 
    
इन देशों के शासकों के विपरीत मेहनतकश जनता खासकर मजदूरों, किसानों व छात्र-नौजवानों का रुख फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों के दखल के खिलाफ था। वे फ्रांसीसी सेना को अपने देश की सम्प्रभुता के खिलाफ मानते थे। फ्रांसीसी सेना उनके राष्ट्र के माथे पर कलंक के समान थी और वे इस कलंक से छुटकारा चाहते थे। फ्रांसीसी सेना के खिलाफ यह आक्रोश इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक से, तीव्र से तीव्र होता गया। इसमें ‘अरब बसंत’ का अपना ही प्रभाव था। मैक्रों के पहले के फ्रांसीसी राष्ट्रपति इस इलाके में किसी भी तरह से फ्रांस की सेना को बनाये रखना चाहते थे। मैक्रों ने पहले तो वही रास्ता अपनाया परन्तु फिर उसे समझ में आ गया कि कहीं ऐसा न हो कि उसके हाथ कुछ न लगे। उसने कूटनीतिक व राजनैतिक चालें चलीं। इन देशों में चुनाव अथवा सैन्य तख्तापलट के जरिये ऐसे लोग शासन में आ गये जो लोकप्रिय मांगों के रथ पर सवार थे। बुर्किना फासो में तो एक कम उम्र फौजी अफसर इब्राहीम ट्राओरे शासक बन गया। उसने उग्र फ्रांसीसी विरोध व लोकरंजक तरीकों से, एक तरह से इस समय लोकप्रिय राष्ट्र नायक की छवि बनवा ली है। इब्राहीम ट्राओरे को लोकप्रिय बनाने में रूसी और चीनी साम्राज्यवादियों का अपना ही हाथ है। इब्राहीम ट्राओरे की मानवेत्तर छवि गढ़ी जा रही है।
    
फ्रांसीसी साम्राज्यवादी इन देशों की प्राकृतिक सम्पदा खासकर खनिज सम्पदा और उसमें भी सोने व हीरे जैसे बहुमूल्य पदार्थों का दोहन करते रहे हैं। उनकी मुद्रा ही नहीं बल्कि भाषा भी इन क्षेत्रों में छायी रही है। एक अनुमान के अनुसार 2022 में पूरी दुनिया में फ्रांसीसी भाषा बोलने वालां की कुल संख्या करीब तीस करोड़ है। इनमें से आधे लोग अफ्रीका महाद्वीप में बसे हुए हैं। साहेल क्षेत्र की प्रमुख भाषा फ्रांसीसी ही रही है। फ्रांस की संस्कृति व सभ्यता का इन पर गहरा असर रहा है। फ्रांसीसी भाषा शिक्षा-दीक्षा का भी प्रमुख माध्यम रही है। फ्रांसीसी साम्राज्यवादी अब भी इस क्षेत्र को किसी न किसी तरह से अपने प्रभाव क्षेत्र में बनाए रखना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में वे थोड़ा पीछे हटकर इस क्षेत्र को अपना आर्थिक नव उपनिवेश बनाना चाहते हैं। इसमें उनका साथ देने को इन देशों का शासक वर्ग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से सहयोग करने को तैयार है। बस इसमें यह होना है कि उन्हें आर्थिक क्षेत्र में मुख्य रूप से चीनी साम्राज्यवादियों से तथा राजनैतिक, सैनिक क्षेत्र में रूसी साम्राज्यवादियों से होड़ करनी होगी। असल में हुआ ये है कि इन देशों में फ्रांसीसी सैनिकों के पीछे हटने के साथ रूसी साम्राज्यवादियों की सैन्य उपस्थिति बढ़ गयी है। इन देशों की जनता में क्योंकि फ्रांस के प्रति आक्रोश गहराता गया है और वे फ्रांस की उपस्थिति को अपने देश की सम्प्रभुता के साथ जोड़ कर देखते हैं परन्तु रूसी या चीनियों की स्थिति ऐसी नहीं है। और ऊपर से रूस या चीन के प्रति उनके पश्चिमी साम्राज्यवाद के साथ संघर्ष के इतिहास के कारण एक किस्म का भातृत्व भाव भी मौजूद है। ये दीगर बात है कि एक समय बाद इन देशों की जनता को शीघ्र ही समझ में आ जायेगा कि रूसी या चीनी साम्राज्यवादी भी फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों की तरह धूर्त, क्रूर व मक्कार हैं। आज के रूस या चीन, लेनिन अथवा माओ के रूस-चीन नहीं हैं बल्कि वे पुतिन या शी जिनपिंग के रूस या चीन हैं। जैसे फ्रांस के आज के शासकों का फ्रांस के महान क्रांतिकारियों से कोई लेना-देना नहीं हैं ठीक इसी तरह पुतिन या जिनपिंग का लेनिन, स्तालिन या माओ से कुछ भी लेना-देना नहीं है। 
    
लेकिन जो भी हो साहेल क्षेत्र से फ्रांस के सैनिकों की रुखसती इतिहास के हिसाब से आगे बढ़ा हुआ कदम है। यह इन देशों की मेहनतकश जनता की एक बड़ी जीत है। फ्रांस के शासकों के मुंह पर एक तमाचा है। यह पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद के खिलाफ चल रहे संघर्षों को एक नई ताजगी देगा। समय ने साबित किया है कि साम्राज्यवाद को दुनिया भर के शोषित-उत्पीड़ित बार-बार मात देते रहे हैं। अंततः एक दिन दुनिया में वह दिन भी आयेगा जब साम्राज्यवाद का पूर्ण अंत व समाजवाद स्थापित हो चुका होगा। असल में तब ही ऐसा हो पायेगा कि पूरी दुनिया में मानव जाति एकजुट हो सकेगी। 

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।