चीन में राष्ट्रपति पद संभालने के समय से ही शी जिनपिंग गाहे-बगाहे थ्यूसीडाइड्स फांस की बात करते रहे हैं। अभी डोनाल्ड ट्रंप की हालिया चीनी यात्रा के दौरान भी शी जिनपिंग ने इसका जिक्र किया। उन्होंने कहा कि चीन और अमेरिका तथाकथित थ्यूसीडाइड्स फांस से बच सकते हैं। यह अनिवार्य नहीं है।
पिछले कुछ सालों में चीन और अमेरिका के संबंधों की गति के बारे में थ्यूसीडाइड्स फांस की चर्चा बढ़ती गई है। नयी और पुरानी वैश्विक ताकतों के संदर्भ में इस मुहावरे का इस्तेमाल 2011 में लारेन्स ग्राहम ने किया था। उन्होंने अपने एक अध्ययन में यह पाया कि पन्द्रहवीं सदी से लेकर बीसवीं सदी तक सोलह में से बारह बार ऐसा हुआ कि पहले से स्थापित वैश्विक ताकत और नई उभरती ताकत के बीच युद्ध हुआ। केवल चार बार ऐसा नहीं हुआ। निष्कर्ष स्पष्ट थाः इस बात की ज्यादा सभावना है कि पुरानी स्थापित ताकत और नयी उभरती ताकत के बीच युद्ध हो।
थ्यूसीडाइड्स फांस का नाम ऐसा क्यों पड़ा। इसका एक ज्यादा पुराना ऐतिहासिक संदर्भ है। पांचवीं सदी ईसा पूर्व में यूनान में स्पार्टा शहर एक पुरानी स्थापित ताकत था। लेकिन फिर एथेंस का उभार हुआ। और अंत में दोनों में वर्चस्व के लिए एक लम्बा युद्ध चला जिसे पेलोपोनेशियन युद्ध कहा जाता है। इस युद्ध का एक इतिहास तब के इतिहासकार ने लिखा जिसका नाम थ्यूसीडाइड्स था। उसी थ्यूसीडाइड्स के नाम से थ्यूसीडाइड्स फांस चलन में आया।
इस फांस या ट्रैप का मतलब यह है कि कोई भी स्थापित बड़ी ताकत अपने पराभव को स्वीकार नहीं कर पाती। ऐसे में जब कोई नयी ताकत उभरती है तो पुरानी ताकत उसे रास्ता नहीं देती है। इसके उलट वह रास्ता रोकती है। अब नयी ताकत आगे बढ़ना चाहती है जबकि पुरानी ताकत उसका रास्ता रोकती है। इसका परिणाम अंत में दोनों के बीच युद्ध में होता है। युद्ध से मामले का निपटारा हो जाता है। अक्सर ही नयी ताकत युद्ध जीतकर आगे बढ़ जाती है जबकि युद्ध में पराजित होकर पुरानी ताकत का और तेजी से पराभव हो जाता है।
इसी अमूर्त ऐतिहासिक सूत्रीकरण से ये कयास लगाये जा रहे हैं कि अमेरिका और चीन में युद्ध होगा कि नहीं? आखिर सं.रा. अमेरिका पिछले 80 साल से दुनिया की स्थापित सबसे बड़ी ताकत है। 1990 के दशक से तीन दशकों तक तो वह एक तरह से चुनौतीविहीन ही रहा। अब चीन एक बड़ी वैश्विक ताकत बन कर उभरा है और वह आगे बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे में क्या अमेरिका चीन को रास्ता देगा? क्या अमेरिका दुनिया भर में फैले अपने आर्थिक-राजनीतिक-सामरिक जाल को समेटेगा और चीन को भी पांव पसारने का मौका देगा? या अमेरिका जरा भी पीछे नहीं हटेगा और चीन को अपनी जगह बनाने के लिए अमेरिका से टकराना पड़ेगा? क्या दोनों में युद्ध होगा? और क्या यह युद्ध फैलकर वैश्विक युद्ध का रूप धारण कर लेगा? परमाणु हथियारों के इस जमाने में इस युद्ध का क्या स्वरूप होगा और इसका क्या परिणाम निकलेगा?
अमूर्त तौर पर कयास या अटकलबाजी के तौर पर इन सवालों के कई उत्तर दिये जा रहे हैं। पर ज्यादातर उत्तरों की खासियत यह है कि वे बुनियादी बात को नजरअंदाज कर देते हैं। इसी वजह से इन जवाबों का कोई खास मतलब नहीं बनता।
वह बुनियादी बात है आज के पूंजीवाद का एकाधिकारी चरित्र। यह एकाधिकारी चरित्र इस पूंजीवाद को साम्राज्यवाद- में रूपांतरित कर देता है। इस साम्राज्यवाद का बुनियादी चरित्र चैतरफा प्रभुत्व का होता है यानी साम्राज्यवादी ताकत अपना चैतरफा प्रभुत्व चाहती है। इसलिए साम्राज्यवादी ताकतों के बीच टकराव अनिवार्य हो जाता है। सं.रा. अमेरिका एक साम्राज्यवादी ताकत है। चीन एक नयी उभरती साम्राज्यवादी ताकत है। यानी यहां टकराव एक पुरानी और किसी हद तक नीचे जाती साम्राज्यवादी ताकत तथा एक नयी उभरती साम्राज्यवादी ताकत के बीच टकराव है। यह बुनियादी बात इस टकराव की गति और नियति को तय कर देती है।
जो लोग इस साम्राज्यवादी चरित्र को नहीं देखते या नहीं स्वीकार करते उनके लिए यह टकराव वैकल्पिक हो सकता है। यानी नयी और पुरानी ताकतें आपस में लड़ भी सकती हैं और नहीं भी लड़ सकती हैं। वे बीसवीं सदी के मध्य का उदाहरण देते हैं जब अमेरिका ने बिना लडे़ ही इंग्लैण्ड को वैश्विक ताकत के पद से विस्थापित कर दिया था। अमेरिकी तो अपने वैश्विक साम्राज्य को स्वीकार ही नहीं करते। वे तो बस लोक कल्याण के लिए सारी दुनिया में छाये हुए हैं।
शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।
इस तरह की सारी बातें साम्राज्यवादी ताकतों की छलावा भरी बातें हैं। यदि उन्हें जरा भी इन पर भरोसा होता तो साम्राज्यवादी इस कदर अपनी सामरिक ताकत बढ़ाने की होड़ में नहीं लगे होते। कोई शी जिनपिंग से पूछ सकता है कि यदि उन्हें शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में इतना ही भरोसा है तो चीन सामरिक तौर पर अमेरिका से आगे निकलने की कोशिश क्यों कर रहा है? और अमेरिका सारे देशों के सम्मिलित सैनिक खर्च से भी ज्यादा क्यों खर्च कर रहा है? अमेरिका क्यूबा से लड़ने के लिए और चीन ताइवान से लड़ने के लिए तो यह नहीं कर रहा होगा।
यह सही है कि अमेरिका ने इंग्लैण्ड को युद्ध के जरिये नहीं पछाड़ा। पर यह बात केवल इसी सीमित अर्थ में ही सही है कि अमेरिका व इंग्लैण्ड के बीच सीधी जंग नहीं हुई। सच्चाई यह है कि अमेरिका का वैश्विक वर्चस्व की स्थिति में आना दो-दो विश्व युद्धों के जरिये ही संभव हुआ। इतिहास की विडंबना यह है कि इन दोनों महा विनाशकारी विश्व युद्धों में अमेरिका व इंग्लैण्ड एक ही पाले में थे।
नयी-पुरानी साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच दुनिया के पुनर्बंटवारे की जो लड़ाई 1914 में शुरू हुई वह 1918 में नतीजे तक नहीं पहुंची और फिर 1939-45 के बीच दूसरा विश्व युद्ध हुआ। इन लड़ाईयों में सं.रा. अमेरिका को छोड़कर नयी-पुरानी सारी साम्राज्यवादी शक्तियां तबाह हो गईं। केवल अमेरिका ही इनसे बिना तबाही के निकला। इतना ही नहीं, वह इस दौरान बाकी मित्र देशों को युद्ध आपूर्ति कर और ताकतवर हो गया। वह दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक व सामारिक ताकत बन गया। अब अपने वैश्विक वर्चस्व को सुदृढ करने के लिए उसे किसी साम्राज्यवादी ताकत से जंग नहीं लड़नी थी। बाकी साम्राज्यवादी शक्तियां तो वैसे ही लहू-लुहान पड़ी थीं। उसे बस वर्तमान स्थिति को खास तरीके से संजोना था जो उसने 1944-50 में कर डाला।
इस तरह यदि अमेरिका ने 1900 की दुनिया की सबसे बड़ी ताकत इंग्लैण्ड को 1945 में विस्थापित कर दिया तो यह बिना युद्ध के नहीं हुआ। बस इस युद्ध ने एक खास रूप धारण किया था। अमरीकी वर्चस्व का संक्रमण तो 1945 तक सम्पन्न हो गया था। बस उसे प्रकट होना था और औपचारिक रूप धारण करना था। दुनिया भर में अमरीकी सैनिक अड्डों, डालर की सर्वोच्चता तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष व विश्व बैंक इत्यादि में वीटो के साथ यह अस्तित्व में आ गया।
इस रक्त-रंजित इतिहास के बावजूद यह कहा जा सकता है कि अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने 1945 के बाद दुनिया भर में न केवल ब्रिटिश बल्कि फ्रांसीसी व अन्य साम्राज्यवादियों को भी जो क्रमशः हर जगह से स्थानापन्न किया वह शांतिपूर्ण था। उन्होंने उस तरह से उपनिवेश भी नहीं बनाये जैसे पहले के साम्राज्यवादियों ने बनाये थे। इसीलिए अमेरिकी साम्राज्यवादी हमेशा इस बात को नकारते थे कि वे साम्राज्यवादी हैं।
इस बात को याद रखना होगा कि दोनों विश्व युद्धों में अमेरिका की भागीदारी सीमित ही थी। वह मित्र देशों को कर्ज देने वाला और हथियारों की आपूर्ति करने वाला ज्यादा था।
आज चीनी साम्राज्यवादी बीसवीं सदी में अमरीकी साम्राज्यवादियों के उभार के इस इतिहास से सबक लेकर आगे बढ़ते लगते हैं। उन्होंने पहले यह घोषित नीति अपना रखी थी कि सिर नीचा किये हुए अपनी ताकत बढ़ाओ। अब शी जिनपिंग के समय वे थोड़ा मुखर हुए हैं पर वे किसी भी सामारिक जंग में सीधा उलझने से बच रहे हैं। इसके बदले वे सारी दुनिया में अपने आर्थिक तंतु जाल को फैलाने में लगे हैं। बेल्ट व रोड परियोजना उनका इस दिशा में सबसे बड़ा प्रयास है। साथ ही वे दो चीजें और कर रहे हैं। वे अपनी आंतरिक आर्थिक व सामारिक ताकत बढ़ा रहे हैं तथा सारी दुनिया को यह जता रहे हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवादियों के विध्वंसकारी स्वरूप के बदले वे दुनिया भर में व्यवस्था व स्थिरता के हामी हैं।
चीनी साम्राज्यवादियों की रणनीति स्पष्ट है। वे आंतरिक तौर पर विज्ञान-तकनीक व उत्पादन में विकास कर अमेरिका को पीछे छोड़ देना चाहते हैं। इसी के साथ वे अपनी सामारिक ताकत बढ़ाकर वहां पहुंचा देना चाहते हैं जहां उनसे टकराने से पहले अमरीकी साम्राज्यवादी दस बार सोचें। यानी वे सुन जू के उस सूत्र को फलित करना चाहते हैं कि अपनी ताकत इतनी बढ़ाओ कि बिना लड़े ही युद्ध जीत लो। वे दुनिया भर में अपने आर्थिक तंतुजाल को ऐसा फैला देना चाहते हैं कि अमेरिका क्रमशः विस्थापित हो जाये। अभी ही वे दुनिया के 120 से ज्यादा देशों के सबसे बड़े व्यापारिक साझीदार हैं। ऐसा करते हुए वे इंतजार कर सकते हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवादी दुनिया भर में युद्धों में उलझते हुए अपनी ताकत को जाया करें और ज्यादा से ज्यादा देशों को अपने से दूर या खिलाफ खड़ा कर दें। तब चीनी साम्राज्यवादी स्वतः ही दुनिया भर में आर्थिक व सामारिक वर्चस्व की स्थिति में आ जायेंगे। असल में 2049 तक यही स्थिति हासिल कर लेने का लक्ष्य चीनी साम्राज्यवादियों ने रखा है।
जब चीनी साम्राज्यवादी आर्थिक विकास, साझेदारी, इत्यादि की चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं तो वह सब इसी रणनीति के तहत होता है। इस समय वे इसे एकदम बेवकूफी की बात मानते हैं कि अपने वर्चस्व के लिए स्थानीय या वैश्विक युद्ध में उलझा जाये। यहां तक कि वे ताइवान को चीन में मिलाने के लिए भी सैनिक कार्रवाई नहीं करना चाहते। वे इंतजार कर रहे हैं कि उनकी बढ़ती ताकत के मद्देनजर एक दिन ताइवानी स्वयं ही चीन के साथ आ मिलेंगे।
अमेरिकी साम्राज्यवादी चीनी साम्राज्यवादियों से ठीक उल्टा व्यवहार कर रहे हैं। वे चीन के उभार से बदहवास हैं। उन्हें अपना सापेक्षिक पराभव स्पष्ट दिख रहा है। वे किसी भी हालत में इस पराभव को रोकना चाहते हैं। इसकी बदहवासी में वे शत्रु-मित्र सब पर हमला कर रहे हैं। व्यापार युद्ध से लेकर दूसरे देशों पर हमला तक वे सब कर रहे हैं। ऐसा करते हुए वे पहले के सारे मुखौटों को खुद ही उतार कर फेंक रहे हैं। जिस साम्राज्यवादी चरित्र को उन्होंने इतने जतन से ढंक-मूंद रखा था वह पराभव की घड़ी में उनकी उद्धत कार्रवाईयों से अधिकाधिक स्पष्ट हो रहा है। चीनी साम्राज्यवादी उनकी इन बदहवास हरकतों से खुश हो रहे हैं। वे खुश हो रहे हैं कि उनका दुश्मन खुद ही अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार रहा है।
इन सारी बातों के मद्देनजर अब थ्यूसीडाइड्स फांस पर आया जा सकता है? क्या पराभव के शिकार अमेरिका और उभरती ताकत चीन के बीच युद्ध होगा? इसका जवाब यही होगा कि साम्राज्यवादी दुनिया में साम्राज्यवादी ताकतों के बीच होड़ एक सीमा तक ही शांतिपूर्ण रह सकती है। एक सीमा के बाद उसका युद्ध की ओर जाना तय है। इससे केवल दो ही सूरतों में बचा जा सकता है। पहला यह कि पुरानी ताकत स्वयं अपनी पराभव की स्थिति स्वीकार कर ले और चुपचाप नयी ताकत के वर्चस्व को रास्ता दे दे। पर साम्राज्यवादियों के चरित्र को देखते हुए यह संभव नहीं लगता। दूसरी सूरत यह है कि नयी उभरती ताकत ठहराव की शिकार हो जाये और पुरानी ताकत के सामने अपनी दोयम दर्जे की स्थिति को स्वीकार कर ले। इस सूरत में युद्ध केवल इसलिए नहीं होगा कि नयी ताकत पुरानी ताकत को चुनौती देने की स्थिति में पहुंची ही नहीं। यदि ये दोनों स्थितियां नहीं होतीं तथा नयी ताकत पुरानी ताकत से आर्थिक व सामारिक तौर पर आगे निकल जाती है तो किसी न किसी किस्म का सैनिक टकराव होगा ही। तब थ्यूसीडाइड्स फांस से नहीं बचा जा सकेगा। चीनी साम्राज्यवादी इस फांस से बच निकलने की बात करते हुए भी असल में इस फांस के अनुरूप ही अपनी सामारिक तैयारी कर रहे हैं।
नयी व पुरानी साम्राज्यवादी ताकत के बीच सामारिक टकराव का चरित्र बहुत सारे कारकों पर निर्भर करेगा। अन्य साम्राज्यवादी ताकतों की स्थिति, उनके संबंध तथा नयी-पुरानी ताकतों से उनके समीकरण इनमें प्रमुख होंगे। इन्हीं के साथ दुनिया की मध्यवर्ती पूंजीवादी ताकतों की स्थिति तथा भू-राजनीतिक समीकरण भी महत्वपूर्ण होंगे। ऐसा हो सकता है कि नयी-पुरानी ताकतों के बीच सीधी टकराहट के बदले प्राक्सी युद्धों की एक लम्बी श्रृंखला के जरिये इसका निपटारा हो जाये। परमाणु युद्ध के खतरे को देखते हुए प्राक्सी युद्ध ज्यादा सहूलियत भरे लग सकते हैं। आखिर सोवियत साम्राज्यवादी व अमरीकी साम्राज्यवादी दो दशक तक प्राक्सी युद्ध ही लड़ते रहे। सोवियत संघ के विघटन में इन प्राक्सी युद्धों की एक महत्वपूर्ण भूमिका थी।
आज यूक्रेन पर रूसी साम्राज्यवादियों के हमले तथा ईरान पर अमेरिकी साम्राज्यवादियों के हमले के रूप में दो प्राक्सी युद्ध पहले ही चल रहे हैं। यूक्रेन के पीछे पश्चिमी साम्राज्यवादी हैं तो ईरान के पीछे रूसी व चीनी साम्राज्यवादी। जहां पहले वाले प्रत्यक्ष हैं तो दूसरे वाले अप्रत्यक्ष। इन दोनों युद्धों के पीछे साम्राज्यवादियों की सारी गतिकी है।
लेकिन आने वाले समय में दुनिया किधर जायेगी यह केवल साम्राज्यवादियों की आपसी होड़ पर निर्भर नहीं करता। इसकी गति इससे भी तय होगी कि दुनिया का मजदूर वर्ग एवं अन्य मेहनतकश जनता क्या करती है जिनकी जिन्दगी इन्हीं साम्राज्यवादियों की वजह से दिनों-दिन रसातल में जा रही है। पहले कभी कहा जाता था कि या तो क्रांतियां विश्व युद्ध को रोक देंगी या विश्व युद्ध क्रांतियों को जन्म देगा। बदले हुए रूप में आज भी यही बात सच है। और तब अमरीकी साम्राज्यवादियों का इक्कीसवीं सदी को अमेरिकी सदी बनाने का सपना व चीनी साम्राज्यवादियों का 2049 व उसके बाद का सपना धरा रह जायेगा। लगे हाथों हमारे देश के हिन्दू फासीवादियों का 2047 का सपना भी धरा रह जायेगा।