पूंजीपतियों की ‘शांति’

/capitalist-ki-shanti

पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने एक नया विधेयक ‘शांति’ संसद से पारित कर राष्ट्रपति से हस्ताक्षरित करवा कानून बना दिया। इस कानून का शीर्षक ‘भारत के परिवर्तन के लिए परमाणु ऊर्जा का सतत दोहन और विकास’ है। अंग्रेजी में यह सस्टनेबल हारनेसिंग एंड एडवांसमेंट आफ न्यूक्लियर एनर्जी फार ट्रांसफार्मिंग इंडिया (SHANTI) है। नाम गढ़ने में माहिर मोदी सरकार का यह ‘शांति’ कानून पूंजीपतियों को परमाणु रिएक्टर लगा विद्युत उत्पादन की खुली छूट देता है। 
    
भारत में कुल पैदा होने वाली विद्युत में परमाणु ऊर्जा का हिस्सा 2 प्रतिशत से भी कम है। भारत में कुल 505 गीगावाट विद्युत उत्पादन सालाना होता है जिसमें परमाणु ऊर्जा से महज 8.18 गीगावाट पैदा किया जाता है। सर्वाधिक विद्युत उत्पादन थर्मल पावर प्लांटों से (करीब 45 प्रतिशत) किया जाता है। अब सरकार ने परमाणु ऊर्जा उत्पादन को 2047 तक 100 गीगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य ले लिया है। 
    
परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को उच्चतम स्तर की सुरक्षा की आवश्यकता होती है। इसीलिए सरकार का इन पर सख्त नियंत्रण जरूरी है। शांति अधिनियम निजी कंपनियों को परमाणु ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में प्रवेश की खुली छूट देता है। जाहिर है यह छूट काफी खतरनाक है क्योंकि मुनाफे से प्रेरित निजी कंपनियां सुरक्षा-मेंटिनेंस पर खर्च कम करने के प्रयासों के चलते गंभीर दुर्घटनाओं को आमंत्रित करेंगी। इस कानून के ढेरों प्रावधान भी दिखाते हैं कि सरकार ने पूंजीपतियों के हितों की खातिर सार्वजनिक सुरक्षा, पर्यावरण, मजदूरों के अधिकारों व प्रभावित समुदाय सबके हितों को दांव पर लगाया है। 
    
इस कानून में दुर्घटना होने पर महज 0.46 अरब डालर की दायित्व सीमा निर्धारित की गयी है। यानी परमाणु दुर्घटना होने पर कंपनी इतने रुपये देकर अपना पल्ला झाड़ सकेगी। यह राशि भोपाल गैस त्रासदी में दिये गये मुआवजे 0.47 अरब डालर से भी कम है। अमेरिका में परमाणु संयंत्रों में यह दायित्व राशि 10.5 अरब डालर है। यानी भारत में परमाणु संयंत्र लगाने वाले देशी-विदेशी पूंजीपति परमाणु दुर्घटना होने पर बेहद कम भुगतान कर बरी हो सकते हैं। 
    
कानून में परमाणु संयंत्र संचालकों को उपकरण आपूर्तिकर्ताओं से मुआवजा मांगने का अधिकार छीन लिया गया है। यानी अब दोषपूर्ण या घटिया उपकरण के चलते होने वाली दुर्घटना से उपकरण निर्माता दायित्व से बच जायेगा। जाहिर है उच्च तकनीक के ये उपकरण भारत में विदेशों से आयात होंगे और इस तरह मोदी सरकार ने यह प्रावधान हटा विदेशी पूंजीपतियों को खुश किया है। अब वे खराब उपकरण सप्लाई कर भी दुर्घटना के मुआवजे में भागीदारी से बरी होंगे। 
    
इसी तरह कानून में जहां पहले कोई दुर्घटना होने पर संपत्ति क्षति के लिए व्यक्ति 10 वर्ष व व्यक्तिगत चोट के लिए 20 वर्ष तक आवेदन कर सकता था। अब यह सीमा घटाकर महज 3 वर्ष कर दी गयी है। यानी अब प्रभावित व्यक्ति 3 वर्ष के भीतर ही दावा कर सकता है। इससे वे तमाम लोग किसी लाभ से वंचित हो जायेंगे जिन्हें परमाणु विकिरणों के चलते सालों बाद स्वास्थ्य समस्यायें पैदा होंगी। 
    
कानून का सबसे विवादास्पद प्रावधान यह है कि परमाणु दुर्घटना से जुड़ी लापरवाही पर प्रभावित समुदायों, नागरिक समाज संगठनों और यहां तक कि राज्य सरकारों को भी सीधी आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है। केवल केन्द्र सरकार या परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड ही संयंत्र संचालकों पर मुकदमा दर्ज करा सकते हैं। यानी संयंत्र संचालक कम्पनी पर आम आदमी मुकदमा तक दर्ज नहीं करा सकता। 
    
पिछले दिनों अमेरिकी सरकार ने भारत में परमाणु संयंत्र लगाने में रुचि प्रदर्शित की। इससे समझ में आता है कि इस कानून से मोदी अपने परम मित्र ट्रम्प को खुश करने की फिराक में है। 
    
परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के प्रति ऐसा कानून बनाकर मोदी सरकार देश को भयानक परमाणु दुर्घटनाओं की ओर ले जा रही है। ऐसी दुर्घटनाएं सालों तक लोगों के स्वास्थ्य पर प्रभाव डालेंगी। इनका पर्यावरण पर भी काफी गंभीर प्रभाव पड़ेगा। पूंजीपतियों व अपने मित्र को खुश करने की फिराक में देश के पर्यावरण व जनता के जीवन को चौपट करने में भी मोदी सरकार पीछे नहीं है। कानून का नाम फासीवादी सरकार ने भले ही ‘शांति’ रखा हो पर भविष्य में यह भारी अशांति पैदा करेगा।  

आलेख

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि