चीफ जस्टिस का ‘‘दैवीय फैसला’’

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देश के भीतर फकीर मोदी ने इस साल चुनाव से पहले ही खुद को अजैवीय महसूस किया था। अपनी इस अलौकिकता का एहसास जब प्रधान सेवक मोदी को हुआ तो उन्होंने भूलोक के समस्त वासियों को बताना अपना फर्ज समझा और फिर चमचमाते टी वी एंकरों को भांति-भांति के पोज तथा वक्तव्य देकर अपना कर्तव्य पूरा किया था।
    
इसी ढंग का एहसास भिन्न ढंग से चीफ जस्टिस को भी हुआ है। चीफ जस्टिस इतने तार्किक तो थे कि वे खुद के अजैवीय या अपने भीतर ईश्वर के होने की बात नहीं कह सकते थे, भली-भांति जानते भी थे कि मोदी जी के अलौकिक मानव होने के दावे को लौकिक दुनिया के वासियों ने चुनाव में बौने मानव में बदल दिया था। इसलिए उन्होंने ज्यादा धूर्तता से काम लिया। उनके हिसाब से बाबरी  मस्जिद जमीन विवाद का देवता के पक्ष में फैसला खुद देवता ने करवाया।
    
चीफ जस्टिस ने महाराष्ट्र में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में बोलते हुए, सुप्रीम कोर्ट में अपने द्वारा किए गए सबसे विवादास्पद निर्णयों में से एक के बारे में कहा, ‘‘अक्सर हमारे पास मामले होते हैं (निर्णय के लिए) लेकिन हम समाधान तक नहीं पहुंच पाते।’’ उन्होंने आगे कहा, ‘‘ऐसा ही कुछ अयोध्या (राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद) विवाद के दौरान हुआ, जो तीन महीने तक मेरे सामने था। मैंने देवता के सामने बैठकर उनसे कहा कि उन्हें एक समाधान खोजना होगा।’’
    
चीफ जस्टिस की इस बात का क्या मतलब है सिवाय इसके कि वो तो बस निमित्त मात्र थे, निर्णय के मामले में वो संकट में फंसे थे, समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें या क्या न करें, बस फिर क्या समाधान के लिए उन्होंने देवता की गुहार लगाई, देवता ने आकर कहा कि जमीन मेरी है और जमीन मुझे दो। फिर क्या होना था देवता की जमीन देवता को मिल गई।
    
यह आम जन की पिछड़ी मूल्य-मान्यताओं और आस्थाओं को इस्तेमाल करने और उसे बनाए रखने के अलावा और क्या हो सकता है? कुछ भी नहीं। 
    
कोई सवाल तो कर ही सकता है कि चीफ जस्टिस जब संकट में फंसे थे तब उन्होंने अल्लाह से गुहार क्यों नहीं लगाई? यदि अल्लाह से गुहार लगाई होती तो तब क्या होता? फिर कोई जज, जो मुसलमान हो वो भी किसी मामले में अल्लाह का वास्ता देकर अपने फैसले को जायज ठहराते तो क्या मोदी, शाह, भाजपाई और संघ तथा मीडिया जमीन आसमान एक नहीं कर देते? 
    
चीफ जस्टिस ने जाते-जाते अपनी यात्रा और इसकी मंजिल का उद्घाटन कर दिया। कुछ समय पहले जब प्रधानमंत्री एक धार्मिक कार्यक्रम में चीफ जस्टिस के घर पहुंचे और इस संबंध में एक फोटो भाजपा द्वारा ही सार्वजनिक की गई तभी यह भी साफ हो चुका था कि उनकी मंजिल क्या है। 
    
जिस चीफ जस्टिस से कई उदारवादी लोग जनवादी और तार्किक होने की उम्मीद लगाए हुए थे और सोचते थे कि मोदी-शाह और इनकी सरकार की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट कुछ अंकुश लगा देगा। मगर यहां तो जिस चीफ जस्टिस को उदारवादी और तार्किक समझा जा रहा था वह फासीवादियों का अनुयाई निकला। उनको समाज में और ज्यादा वैधता दिलाने का काम किया।
    
चीफ जस्टिस ने इस तरह से न्यायाधीशों के लिए एक उदाहरण या मिसाल पेश कर दी है। उन्हें रास्ता दिखा दिया है कि अब संकट में फंसे होने पर वो देवता का आह्वान करें और देवता फैसला कर देंगे। हां, यह अलग बात है यह सहूलियत केवल सवर्ण ब्राह्मणवादी विचार से ग्रस्त न्यायाधीशों और उनके देवता को ही होगी। मुसलमान, ईसाई आदि को ये सहूलियत नहीं होगी। इसी तरह ये सहूलियत दलितों, आदिवासियों को भी नहीं होगी। यदि कभी, इनसे जुड़े कोई न्यायाधीश भी इसी तरह का तर्क दे तो उसे ‘देवता’ विरोधी घोषित कर दिया जाएगा।
    
कोई कह सकता है और कहना भी चाहिए। दरअसल यह देवता सिवाय शाह और मोदी के कोई और हो ही नहीं सकता। अब यह अलग बात है कि शाह और मोदी अपने देवताओं के घोर सेवक हैं जिस ताल पर वह नचा रहा है उस पर ये खुद नाच रहे हैं और बाकियों को नचा रहे हैं।  
    
इतने महत्वपूर्ण मामले पर, जिसके दम पर हिंदू फासीवादियों ने उत्तर भारत में बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण किया, इनकी मर्जी के खिलाफ जाने का क्या हश्र होगा, यह रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद मामले को देख रहे जजों की बेंच समझती थी। जस्टिस लोया का उदाहरण यह समझने के लिए पर्याप्त था। आखिरकार देवता के रुष्ट होने का एक मतलब था इस दुनिया से छू मंतर हो जाना। जबकि देवता को मनमाफिक खुश करने या उसके निर्देश का पालन करने का मतलब था इस दुनिया में, जिसमें करोड़ों-करोड़ लोग कंगाली में धकेले जा रहे हैं, वहां और ज्यादा सफलता की सीढियां चढ़ते जाना।
    
रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद मामले पर फैसला देने वाले न्यायाधीशों के आगे के जीवन को देखें तो साफ तौर पर ही समझ में आ जाएगा कि देवता फैसले से प्रसन्न हुए और फिर देवताओं की कृपा इन पर बरस पड़ी। रंजन गोगोई को रिटायर होने के बाद राज्य सभा में सांसद बनाकर भेज दिया गया। एक जज को राज्यपाल बना दिया जबकि एक अन्य को नेशनल ला अपीलेट ट्रिब्यूनल का प्रमुख बनाया गया।
    
चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ जो कि अब भूतपूर्व होने वाले हैं कुछ वक्त पहले ही उनके देवता उनके घर पर अवतरित होकर शायद कोई वरदान भी देकर गए हैं। जल्दी ही यह वरदान क्या था सबको दिखेगा। 
    
वैसे भी चंद्रचूड़ महोदय ने अपने देवता की खूब सेवा की है। एक-दो मौके ही ऐसे रहे जब देवता क्रोधित हुए। मगर ये बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे भी नहीं थे। बस फर्क यह रहा कि पहले कभी भी भूतपूर्व चीफ जस्टिस को देवता से गुहार नहीं लगानी पड़ी होगी या फिर हो सकता है देवता से गुहार तो लगाई हो मगर किसी को बताने की जरूरत नहीं समझी। ज्ञानवापी जैसे मामले पर जिस पर आसानी से 1991 के पूजा स्थल कानून का हवाला देकर मुसलमानों के धर्म स्थलों पर संघियों के कब्जा कर लेने तथा इसके जरिए होने वाले नफरती अभियान पर रोक लगाई जा सकती थी, उस पर भी चीफ जस्टिस ने देवताओं के ही पक्ष में फैसला कर दिया।
    
इस तरह पूंजीवादी न्याय व्यवस्था पर देवता हावी हो गए एक प्रकार से यहां इनका कब्जा हो गया। यहां तर्क, कानून, साक्ष्य नहीं बल्कि हिंदू सवर्ण ब्राह्मणवादी आस्था और इनके देवता ही प्रधान हो गए हैं। 

 

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