कोटा में अपनी जान लेते छात्र

राजस्थान का कोटा शहर एक बार फिर आत्महत्याओं के कारण सुर्खियों में है। इस वर्ष अभी तक 18 छात्र मौत को गले लगा चुके हैं। बताया तो यह भी जा रहा है कि आत्महत्याओं की संख्या वर्ष के अंत तक और बढ़ सकती है। यानी यह डरावनी तस्वीर और भी ज्यादा डरावनी हो सकती है। देश के अलग-अलग राज्यों से अपने बेहतर भविष्य की तलाश में आने वाले छात्र अपना वर्तमान भी नहीं बचा पा रहे हैं। जीवन का किसी भी प्रकार का आकर्षण इन छात्रों को आकर्षित नहीं कर पा रहा है। इससे समझा जा सकता है कि ये छात्र किस मानसिक अवस्था में अभी तक जी रहे थे।
    
कोटा मेडिकल और इंजीनियरिंग के लिए तैयारी कराने वाले हब के रूप में जाना जाता है। यहां पर कई छोटे और बड़े संस्थान मौजूद हैं जो प्रतियोगिता की तैयारी कराते हैं। इसी तरह कई पीजी और हॉस्टल यहां हैं जहां पर छात्र रहते हैं। हर साल कोटा से छात्रों की खुदकुशी करने की खबरें आती हैं लेकिन समय गुजरने के साथ यह सामान्य बनता जा रहा है। 
    
छात्रों को आत्मघाती कदम उठाने से रोकने के जो भी उपाय किए गए वो कोई असर पैदा करने में असफल रहे हैं। कोटा पुलिस द्वारा नियमित जांच करने और अवसाद झेल रहे छात्रों की काउंसलिंग करने, एंटी सुसाइड राड (पंखे की ऐसी स्प्रिंग वाली राड जो पंखे का वजन तो सह सकती है लेकिन उससे ज्यादा वजन पड़ने पर स्प्रिंग सीधी होकर नीचे आ जाती है), पीजी व हॉस्टल के वार्डन को छात्रों का खयाल रखने को कहना आदि उपाय आत्महत्या रोकने के लिए किए गए। लेकिन ये उपाय नाकाफी ही साबित होने थे और हो रहे हैं। 
    
पूंजीवादी समाज में प्रतियोगिता आम बात है। हर कोई हर किसी से प्रतियोगिता में लिप्त है। और आज के छुट्टे पूंजीवाद के दौर में यह प्रतियोगिता और भी भीषण हो गई है। निजीकरण-उदारीकरण की सरपट दौड़ती नीतियों ने अवसरों को और सीमित कर दिया है। इससे यह प्रतियोगिता और तेज हो गई है। सरकारी शिक्षण संस्थानों की सीमित संख्या, सीमित सीटों की संख्या ने छात्रों के बीच इसे पाने की प्रतियोगिता को तेज कर दिया है। नौकरियों के अवसरों के कम से कमतर होते जाने ने इस प्रतियोगिता को और भी खतरनाक स्तर पर पहुंचा दिया है। 
    
घर परिवार वालों की आशाओं पर खरा उतरने का दबाव, परीक्षा पास करने का दबाव तो होता ही है लेकिन एकदम नए परिवेश में अपने घर से दूर रहने ने भी इस समस्या को और कठिन बना दिया है। इन मध्यमवर्गीय छात्रों को किशोर उम्र में ही यहां भेजकर प्रतियोगिता में लगा दिया जाता हैं। ये उम्र नए परिवेश और एकदम अलगाव में जीवन जीने और ऊपर से भीषण प्रतियोगिता में लगा दिए जाने की तो नहीं है। इन पर दवाब इतना ज्यादा होता है कि घोर निराशा में वे आत्मघाती कदम उठा लेते हैं।
    
प्रतियोगिता में लगे इन छात्रों का कोई भी दोस्त नहीं होता। हर कोई एक प्रतियोगी होता है। कमरे में साथ रहने वाला, साथ कोचिंग लेने वाला, साथ खाना खाने वाला भी दोस्त नहीं बस एक प्रतियोगी होता है। इनका ऐसा कोई भी नहीं जिससे दिल की बात कह सकें या जिससे दिमाग के तनाव बयान कर सकें। पूंजीवादी व्यवस्था और समाज ने हर किसी को न सिर्फ प्रतियोगी बना दिया है बल्कि एक-दूसरे से अलगाव में भी डाल दिया है। 
    
कोचिंग संस्थान भी आपस में प्रतियोगितारत हैं। मुनाफे व और अधिक मुनाफे को लालायित ये संस्थान कुछ छात्रों को ‘सफल’ बना और उसका प्रचार कर अपनी मार्किट वैल्यू बढ़ाते हैं। इसके लिए ये पढ़ाई में अच्छे छात्रों को ‘स्टार क्लासेज’ देते हैं। इस स्टार क्लासेज के लिए टेस्ट लिया जाता है। इस तरह ये कोचिंग संस्थान प्रतियोगिता को अपने संस्थान तक ले आते हैं। जो छात्र प्रवेश परीक्षा के दौरान या प्रवेश परीक्षा के परिणाम के बाद दबाव में आता था वह अब शुरुआती महीनों में ही तनाव में आ जाता है। टेस्ट में असफल होने या कम अंक आने पर निराश और पस्त हिम्मत होकर अपनी जान ले लेने की तरफ छात्र बढ़ जाते हैं। प्रतियोगिता हर तरफ है लेकिन इसकी कीमत मासूम छात्र अपनी जान देकर चुका रहे हैं। 
    
यह सवाल पूंजीवादी व्यवस्था और शासकों पर है कि वे समाज को किस ओर ले जा रहे हैं। वे समाज में निरंतर ऐसी परिस्थितियां तैयार कर रहे हैं जो मनुष्यों के खिलाफ हैं। जो उन्हें मौत की ओर धकेल रही हैं। वो व्यवस्था जिसमें किशोर, युवा आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हो रहे हों उस व्यवस्था को जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए।

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