लंपटों द्वारा की गई वारदात को हिंदू-मुस्लिम एंगल देने की कोशिश

फरीदाबाद/ फरीदाबाद (हरियाणा) का सेक्टर-56, फरीदाबाद के सेक्टर-55 से बड़ी सी नदी के बाद शुरू होता है। हालांकि अब यह नदी गंदे नाले में बदल चुकी है। यही नदी सेक्टर-55 और 56 को बांटती है। सेक्टर-56 पिछले लगभग 10-12 साल से बस ही रहा है जिसमें छोटी पूंजी के लोग 35-40 या 50 गज जमीन लेकर जैसे-तैसे अपना घर बना ले रहे हैं।
    
इन्हीं में सन् 2010 के आस-पास हाउसिंग बोर्ड की कालोनियां बनीं जिसमें लगभग दो-ढाई हजार टू रूम सेट बने हुए हैं। सरकार द्वारा लगभग 5 साल पहले मजदूर-मेहनतकशां की बस्तियों को उजाड़ कर कुछ लोगों को यह फ्लैट दिए गए हैं जिनकी किश्तें बांध दी गई थीं। इनमें रहने वाले परिवार सभी धर्मों और जातियों के हैं जिनको जैसे-जैसे घर मिले उसी तरह लोग बसते गये। ये फ्लैट चार-चार मंजिला इमारतों में बने हुए हैं। एक मंजिल में कई घर हैं। यह सारी बिल्डिंगें चारदीवारी से घिरी हुई हैं जिसमें कुछ पार्क और कुछ पार्किंग भी बनी हुई हैं। एक घर किसी वाल्मीकि समाज के परिवार का है तो दूसरा घर किसी मुस्लिम परिवार का, तो तीसरा घर किसी ब्राह्मण परिवार का है, इसी तरह लोग वर्षों से रहते आए हैं।
    
इस कालोनी के चारदीवारी के अंदर ही किसी एक पार्किंग में मुस्लिम समाज के लोगों ने अपनी नमाज अदा करने के लिए और बच्चों को पढ़ाने के लिए कुछ कच्चा-पक्का निर्माण किया हुआ है तो दूसरी पार्किंग में वाल्मीकि समाज का मंदिर है और इसी तरह तीसरी जगह कोई और मंदिर बना हुआ है और यहां सभी लोग इसी तरह कई वर्षों से अपनी पूजा अर्चना करते आए हैं। 25 जून, रविवार के दिन वाल्मीकि समाज के कुछ लंपट लोगों ने तांडव किया। हालांकि इन लोगों को किसी समाज का कहना गलत होगा क्योंकि इस तरह के लंपट लोग वास्तव में किसी समाज के नहीं होते बल्कि सभी समाज के लोगों के लिए घातक होते हैं। लंपट लोगों द्वारा जो दारू के नशे में धुत थे, लगभग शाम को 4ः30 बजे मुस्लिम समुदाय के छोटे-छोटे बच्चे जो पढ़ने जा रहे थे, को परेशान करना शुरू किया गया। मस्जिद के इमाम द्वारा जब उसका विरोध किया गया तो इन लंपटों द्वारा पत्थरबाजी शुरू कर दी गई। मस्जिद के इमाम को भी पीटा गया और मुस्लिम समाज की महिलाओं ने जब इसका विरोध किया तो इन लंपटों द्वारा उनको भी मारा-पीटा गया। मौके पर पुलिस बल के पहुंचने से मामला कुछ शांत हुआ, शांति बहाली के लिए पुलिस अब भी वहां मौजूद है।
    
पूरी घटना में दूसरा मोड़ तब आता है जब बिट्टू बजरंगी नाम का व्यक्ति इसमें कूदता है यह बिट्टू बजरंगी संघी मानसिकता का आदमी है जो पिछले लंबे समय से शहर में होने वाली कई घटनाओं को हिंदू-मुस्लिम का नजरिया प्रचारित कर नफरत फैलाने का काम कर रहा है। यह बिट्टू बजरंगी कभी छोटी सी मजार के सामने हनुमान चालीसा का पाठ पढ़ने की नौटंकी करता है और अब इस मामले में भी इन लंपटों का इस्तेमाल कर पूरे वाल्मीकि समाज को मुसलमानों के खिलाफ खड़ा करने का प्रयास कर रहा है।
    
आज जहां अपने देश में हिंदू फासीवादियों का बोलबाला है, पढ़े-लिखे नौजवानों के पास भी काम नहीं है, बेरोजगारी चरम पर है, गरीब घर के बच्चों के लिए शिक्षा नहीं है, महिलाओं के लिए सुरक्षा नहीं है, आदिवासियों से जमीन छीनी जा रही है, दलितों पर अत्याचार जारी है, मेहनत करने वाले सभी तबकों के जनवाद को कुचला जा रहा है, जबरदस्ती के दंगे करवाए जा रहे हैं। कई राज्य के लोगों को तो आपस में लड़वाकर दंगों में झोंका जा रहा है। ऐसे में इस तरह के लंपट लोगों को जो सभी धर्म सभी जातियों में इस पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा किए जा रहे हैं और व्यवस्था इन्हें अपने हितों के लिए इस्तेमाल कर रही है। हिंदू फासीवादियों द्वारा बिट्टू बजरंगी जैसे लोगों को पूरी शह देकर आग भड़काने के लिए खुले सांड की तरह छोड़ दिया जा रहा है। नहीं तो ऐसी कालोनियां जो जर्जर हो चुकी हैं जहां हर जगह से सीमेंट झड़ रहा है बिल्डिंगों के सरिए बाहर को दिखाई दे रहे हैं जहां चारों तरफ गंदगी है गंदे पानी निकलने की कोई निकासी नहीं है रास्ते-पार्क गंदे पानी के तालाब बने हुए हैं शासन-प्रशासन द्वारा मूलभूत सुविधाओं शिक्षा-स्वास्थ्य-रोजगार की कोई जवाबदेही नहीं है। ऐसे में ऐसी कालोनियों के मजदूर-मेहनतकश एकत्रित होकर इस बर्बर होती पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ, इन हिंदू फासीवादियों के खिलाफ जो सिर्फ देश के बड़े पूंजीपति वर्ग के मुनाफे के लिए काम करते हैं, खड़े ना हो जाएं इसलिए उनके बीच के ही हताश-परेशान नौजवानों को तरह-तरह के नशों का लती बनाकर लंपट बनाया जा रहा है और बिट्टू बजरंगी जैसे संघी मानसिकता के लोगों को उनके बीच में भेज कर आपस में ही लड़वाने का काम किया जा रहा है।
    
असल में ऐसे सभी दबे-कुचले शोषित लोगों को, मजदूर-मेहनतकशों को, वाल्मीकि समाज के लोगों को मुस्लिम समाज के लोगों को एकजुट होकर इन नफरत फैलाने वाले हिंदू फासीवादियों के खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाहिए। विशिष्ट तौर पर आज इस घटना में न्याय पसंद संगठनों को आकर मामले को हल करना चाहिए ताकि कोई बिट्टू बजरंगी हमारे ही बीच के कुछ लोगों का गलत इस्तेमाल ना कर सके। -फरीदाबाद संवाददाता

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।