सब कुछ लुटा के होश में आये ......

पिछले साल मणिपुर उच्च न्यायालय के एक फैसले कि मैतई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एस टी) का दर्जा दिया जाये, ने मणिपुर को साम्प्रदायिक-नस्लीय आग में झोंक दिया था। 3 मई 2023 से हिंसा का ताण्डव मोदी (मणिपुर में भाजपा की सरकार है) की ठीक नाक के नीचे शुरू हुआ था। यह ताण्डव आज तक जारी है। सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं और हजारों की संख्या में लोग घायल हुए हैं। मणिपुर की इम्फाल घाटी से कुकी-नागा लोगों को और पहाड़ी इलाकों से मैतई लोगों को पूरी तरह से खदेड़ा जा चुका है। वस्तुतः मणिपुर दो हिस्सों में बंट चुका है। मणिपुर साम्प्रदायिक-नस्लीय आधार पर बुरी तरह बंटा हुआ है। मैतई जहां हिन्दू बहुल हैं वहां कुकी-नागा ईसाई बहुल हैं। 
    
महीनों-महीने मणिपुर जलता रहा है परन्तु न मणिपुर उच्च न्यायालय को और न राज्य व केन्द्र में बैठी भाजपा सरकार को होश आया। अब जाकर 22 फरवरी, 2024 को मणिपुर उच्च न्यायालय की कुम्भकर्णी नींद टूटी है और वह कह रहा है कि ‘‘कानून की गलत धारणा’’ के तहत उसने फैसला पारित किया था। यह ज्ञान प्राप्त करने में उसे लगभग एक साल लग गया कि उनकी अदालत या अन्य अदालतों को उच्चतम न्यायालय के एक फैसले के तहत यह अधिकार ही नहीं है कि वे अनुसूचित जनजाति की सूची में कोई संशोधन या परिवर्तन कर सकें। 
    
मणिपुर के उच्च न्यायालय के अज्ञान की कीमत सैकड़ों लोगों ने अपने जान-माल का नुकसान उठाकर चुकायी है। उच्च न्यायालय के एक गलत फैसले और केन्द्र व राज्य में बैठी हिन्दू फासीवादी सरकारों ने बाकी रही-सही कसर पूरी कर दी। दुनिया भर में घूमने वाले और मंदिर-मंदिर का उद्घाटन करने वाले मोदी जी को एक भी दिन मणिपुर जाने या शांति की अपील करने का वक्त नहीं मिला। असल में मणिपुर में जो कुछ हो रहा था वह मोदी जी की काली राजनीति का स्वाभाविक परिणाम था। और यह कुटिल-काली फासीवादी राजनीति आगामी लोकसभा चुनाव के दौरान और अधिक परवान चढ़ रही है। ऐसे में मणिपुर में शांति का आगाज कब होगा कौन जानता है। 
    
मणिपुर उच्च न्यायालय का दोष सिर्फ यह नहीं है कि उसकी ‘‘कानून की धारणा’’ गलत थी बल्कि यह भी है कि उसने एक बार भी यह नहीं सोचा कि उसका एक गलत फैसला सैकड़ों लोगों की जान ले सकता है। और हद तो यह है मणिपुर उच्च न्यायालय ने अपने गलत फैसले के लिए कोई अफसोस तक नहीं जताया है। 

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1980 के दशक से ही जो यह सिलसिला शुरू हुआ वह वैश्वीकरण-उदारीकरण का सीधा परिणाम था। स्वयं ये नीतियां वैश्विक पैमाने पर पूंजीवाद में ठहराव तथा गिरते मुनाफे के संकट का परिणाम थीं। इनके जरिये पूंजीपति वर्ग मजदूर-मेहनतकश जनता की आय को घटाकर तथा उनकी सम्पत्ति को छीनकर अपने गिरते मुनाफे की भरपाई कर रहा था। पूंजीपति वर्ग द्वारा अपने मुनाफे को बनाये रखने का यह ऐसा समाधान था जो वास्तव में कोई समाधान नहीं था। मुनाफे का गिरना शुरू हुआ था उत्पादन-वितरण के क्षेत्र में नये निवेश की संभावनाओं के क्रमशः कम होते जाने से।

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असल में धार्मिक साम्प्रदायिकता एक राजनीतिक परिघटना है। धार्मिक साम्प्रदायिकता का सारतत्व है धर्म का राजनीति के लिए इस्तेमाल। इसीलिए इसका इस्तेमाल करने वालों के लिए धर्म में विश्वास करना जरूरी नहीं है। बल्कि इसका ठीक उलटा हो सकता है। यानी यह कि धार्मिक साम्प्रदायिक नेता पूर्णतया अधार्मिक या नास्तिक हों। भारत में धर्म के आधार पर ‘दो राष्ट्र’ का सिद्धान्त देने वाले दोनों व्यक्ति नास्तिक थे। हिन्दू राष्ट्र की बात करने वाले सावरकर तथा मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान की बात करने वाले जिन्ना दोनों नास्तिक व्यक्ति थे। अक्सर धार्मिक लोग जिस तरह के धार्मिक सारतत्व की बात करते हैं, उसके आधार पर तो हर धार्मिक साम्प्रदायिक व्यक्ति अधार्मिक या नास्तिक होता है, खासकर साम्प्रदायिक नेता। 

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इस समय, अमरीकी साम्राज्यवादियों के लिए यूरोप और अफ्रीका में प्रभुत्व बनाये रखने की कोशिशों का सापेक्ष महत्व कम प्रतीत हो रहा है। इसके बजाय वे अपनी फौजी और राजनीतिक ताकत को पश्चिमी गोलार्द्ध के देशों, हिन्द-प्रशांत क्षेत्र और पश्चिम एशिया में ज्यादा लगाना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में यूरोपीय संघ और विशेष तौर पर नाटो में अपनी ताकत को पहले की तुलना में कम करने की ओर जा सकते हैं। ट्रम्प के लिए यह एक महत्वपूर्ण कारण है कि वे यूरोपीय संघ और नाटो को पहले की तरह महत्व नहीं दे रहे हैं।

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