सबसे बड़ा कालनेमि कौन

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पिछले दिनों से उत्तराखण्ड सरकार ने ‘आपरेशन कालनेमि’ चलाया हुआ है। इस पुलिसिया आपरेशन के तहत पुलिस वाले साधु वेष या भगवा वस्त्र पहने हुए लोगों की जांच पड़ताल कर रहे हैं। घोषित तौर पर इसका मकसद नकली साधु व साधु वेष में छिपे अपराधियों की पहचान करना है। एक वीडियो में पुलिस वाला अपनी दबंगई एक दीन-हीन साधु पर उतार रहा है और पूछ रहा है कि ‘कालनेमि का नाम सुना है?’ 
    
‘कालनेमि कौन था,’ यह प्रश्न यदि भारत के सांसद-विधायकों, अफसरों, राजनेताओं, संघ-भाजपा के भगवाधारियों आदि से भी पूछा जाए तो शायद ही कोई-कोई जवाब दे पाये। हिन्दू धर्मशास्त्रों में किसी-किसी की ही रूचि होती है अन्यथा बिना एक वेद वाक्य पढ़े सब के सब सनातन धर्म (आजकल हिन्दू धर्म को यह कहने का प्रचलन बढ़ गया है। शायद किसी ने इनके कान में फूंक दिया है कि हिन्दू शब्द तो विदेशी है और हिन्दू धर्म ग्रंथों में तो यह शब्द आदिकाल से आज तक कभी नहीं रहा) के महापण्डित है। स्वघोषित ठेकेदार हैं। 
    
कालनेमि एक पौराणिक पात्र है। जिसका जिक्र रामायण और महाभारत दोनों में ही मिलता है। रामायण (रामचरित मानस) में कालनेमि रावण का ममेरा भाई (रावण के मामा मारीच का बेटा) है। कालनेमि हनुमान को उस वक्त अपने मायाजाल में फंसाते हैं जब वे मूर्छित लक्ष्मण के लिए सुषेन वैध के कहे अनुसार, संजीवनी बूटी लेने जा रहे थे। हनुमान, कालनेमि को मार देते हैं। मायाजाल में फंसाकर किसी नेक काम में बाधा डालने के लिए कालनेमि की निंदा की जाती है। महाभारत में कालनेमि ‘दुष्ट’ कंस का दूसरा नाम है। यहां कालनेमि का वध भगवान कृष्ण करते हैं। अब कालनेमि का पुनः कलयुग अवतार हो गया है। अब ये तो भगवान ही जानते होंगे कि उत्तराखण्ड पुलिस भगवान हनुमान है या भगवान कृष्ण। वे जो भी हों पर उत्तराखण्ड की भगवा सरकार ने ‘कालनेमि खोजो’ अभियान चला रखा है। वे कालनेमि की खोज में घाट-घाट का पानी पी रहे हैं। 
    
भारतीय समाज में तीन तरह के भगवाधारी हैं। पहले भगवाधारी बहुत-बहुत बड़े-बड़े हैं। इनकी माया दूर-दूर तक फैली है। इनमें से कुछ तो परम्परागत हैं। और कुछ एकदम नये-नवेले हैं। पहले में शंकराचार्य आदि हैं तो दूसरे में आसाराम, रामदेव, राम-रहीम आदि, आदि हैं। इनके अपने-अपने विशाल मंदिर, मठ, आश्रम और उससे जुड़ी कई ‘परोपकारी’ गतिविधियां हैं। इन महंतों के अपने स्कूल, विश्वविद्यालय, अस्पताल और किस्म-किस्म के ट्रस्ट हैं। इनमें से कई तो पश्चिम परिधान व संस्कृति में अलमस्त बड़े-बड़े पूंजीपतियों को टक्कर दे रहे हैं। आलीशान कारों में ये भगवाधारी घूमते हैं। 
    
दूसरे भगवाधारी राजनीति में है। ये भगवाधारी राजनीतिक क्षेत्र में धर्म का परचम लहराते हैं। या उल्टे धर्म के नाम पर राजनीति करते हैं। इनका जीवन धर्म-कर्म या मोक्ष की चिंता के बजाय राजनीति में अपना डंका बजाने का है। इन भगवाधारियों में कई संसद और विधानसभाओं में पहुंचे हुए हैं। एक महाशय तो जो अपने को योगी कहते हैं; सर मुंडाये हुए, भगवा पहने हुए, सत्ता के इतने बड़े भोगी हैं कि किसी को भी अपनी कुर्सी के पास नहीं फटकने देना चाहते हैं। योगी हैं पर सत्ता के रोगी हैं। और एक महाशय मौसमी भगवाधारी हैं। ठीक चुनाव के समय वे त्रिपुण्ड धारण कर लेते हैं, रुद्राक्ष मालायें पहन लेते हैं। यहां-वहां मंदिरों में भटकते हैं और सत्ता हाथ से न फिसले, इसके लिए ठीक मतदान के दिन केदारनाथ की एक आलीशान गुफा में ध्यान साधना में लिप्त हो जाते हैं। इधर सत्ता मिली! उधर तप-व्र्रत टूटा! 
    
दूसरे भगवाधारी कभी हिन्दू महासभा, कभी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, कभी जन संघ, कभी भाजपा बनाकर सत्ता में काबिज होने के लिए भगवा रंग का झण्डा लहराने से लेकर लंगोट तक सब का प्रयोग कर लेते हैं। 
    
बेचारे तीसरे भगवाधारी हैं जो दर-दर भटकते हैं। भिक्षा पर गुजर-बसर करते हैं। मीलों-मील पैदल चलते हैं। अक्सर ही दुत्कारे जाते हैं। इनमें से कई ऐसे हैं जिन्हें वाकयी मुक्ति की चाह है। वे सत्य या जीवन का सार ढूंढने को बेचैन हैं। ये भारत की ऋषि या सूफी परम्परा से कुछ प्रेरणा लेते हैं। पर यह आजकल लुप्तप्राय कोटि है। इनमें से कुछ वे हैं जो सताये हुए गरीब दरिद्र किसान हैं। कुछ तो कभी किसानी, मजदूरी तो कभी भगवा पहन के अपनी और अपने परिवार की गुजर-बसर किसी तरह करते या करवाते हैं। तीसरे भगवाधारी में एक संख्या ऐसे लोगों की भी है जो लम्पट हैं, पुराने अपराधी या वक्त के मारे हैं। उजड़े किसान या बरबाद सर्वहारा समाज की तलछट में पहुंच जाते हैं। 
    
उत्तराखण्ड की भगवाधारी सरकार का ‘आपरेशन कालनेमि’ इन्हीं बेचारे तीसरे भगवाधारियों के खिलाफ है। पहले की तो वे पूजा करते हैं और दूसरी श्रेणी में या तो वे खुद हैं या उनके अपने ही दल के लोग हैं। 
    
तुलसीदास रामचरित मानस में कहते हैं, ‘साधु वेष में छलने वालों का अंत कालनेमि, रावण और राहु की तरह ही होता है।’
‘‘लखि सुबेष जंग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजि अहिं तेऊ।।
उधरहिं अंत न होई निबाहु। कालनेमि जिमि रावन राहु।।’’
    
अब देखने वाली बात यह है कि कब भारत में आधुनिक कालनेमि, रावण, राहु के भगवाधारी वेष को उघाड़ा जाता है। (पौराणिक ग्रंथों में साफ लिखा है कालनेमि, रावण, राहु का अंत अपने आप नहीं हुआ।) कब उनके पाखण्ड, प्रपंच का अंत होता है। कालनेमि, रावण, राहु का अंत करने के लिए कब भारत के मजदूर, मेहनतकश किसान उठ खड़े होते हैं। इसी दौरान तीसरे भगवाधारियों को भी समझ में आ सकता है कि असल में मुक्ति का मतलब क्या है? और मुक्ति का रास्ता क्या है? 

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