वो कुछ भी करने को तैयार

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9 अक्टूबर 2025 को तालिबानी विदेश मंत्री आमीर खान मुत्ताकी पहली बार भारत दौरे पर आये हैं। ये महोदय 7 दिन तक भारत में रहेगें और अलग-अलग राज्यों में घूमेंगे। ये उसी तालिबानी सरकार का चेहरा हैं जिसने अपने देश में महिलाओं के जनवादी अधिकारों को निर्ममता से कुचला। ये वही तालिबानी हैं जिन्होंने महिलाओं को राजनीति से तो दूर रखा ही है बल्कि उनके शिक्षा, रोजगार जैसे मौलिक अधिकारों पर भी प्रतिबंध लगा रखा है। महिलाओं के प्रति इन तालिबानियों की सोच हर जगह उजागर हो जाती है। लेकिन मौजूदा भाजपा सरकार ने ऐसी मानसिकता की सरकार के लोगों का रेड कार्पेट बिछाकर स्वागत किया। 
    
तालिबानियों की महिलाओं के प्रति घटिया सोच भारत दौरे के दौरान भी दिखाई दी। 10 अक्टूबर को दिल्ली में एक प्रेस कान्फ्रेंस की गई जिसमें महिला पत्रकारों को आमंत्रित ही नहीं किया गया और जो महिला पत्रकार आई भी थीं उनको वापस भेज दिया गया। इसका भाजपा सरकार ने कोई विरोध नहीं किया बल्कि इस आयोजन को होने देने पर अपनी मौन सहमति दी और तालिबानियों को संदेश दिया कि महिलाओं के प्रति आपकी और हमारी सोच में ज्यादा अंतर नहीं है। दोनों ही महिलाओं को स्वतंत्र नागरिक के बतौर नहीं बल्कि महिलाओं को पारंपरिक भूमिका तक सीमित करना चाहते हैं। बस इतना अंतर है कि तालिबानी कठोर कानून बनाकर बंदूक से चुप कराते हैं और संघी भाजपाई परंपरा और धर्म के नाम पर चुप कराते हैं। हालांकि इनके लंपट गिरोह के सदस्य लिचिंग-मारपीट के जरिये तालिबान की बराबरी करने का पूरा प्रयास करते हैं।
    
इस घटना का सारे देश के जनवाद पसंद लोगों व महिला पत्रकारों ने विरोध किया तो 12 अक्टूबर को दोबारा प्रेस कान्फ्रेंस में सभी पत्रकारों को बुलाया गया। जिसमें तालिबानी विदेश मंत्री और भारतीय नुमाइंदों ने भी लीपा पोती करने की कोशिश की।
    
लेकिन सवाल है कि जिस भारतीय सरकार ने 2021 में तालिबानियों के सत्ता में आने के बाद अपने दूतावास के सभी अधिकारियों को काबुल से वापस बुला लिया था। तालिबानियों से दूरी बनाए हुए थी और उसे वैध मान्यता देने से भी इनकार करती रही थी तो अब ऐसा क्या परिवर्तन हो गया, ऐसी क्या जरूरत पड़ गई कि भारतीय शासकों ने तालिबानियों को भारत में बुलाया और रेड कार्पेट बिछाकर उनका स्वागत किया?
    
दरअसल अफगानिस्तान में लिथियम जैसे संसाधन का खनन का क्षेत्र मौजूद है। जिस पर कई शक्तिशाली देशों की नजरें हैं। भारत के शासक देश के पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए अफगानिस्तान से रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। यानी भारतीय शासक अब भारतीय पूंजीपतियों के आर्थिक हितों के लिए तालिबानियों के साथ राजनैतिक संबंध फिर से स्थापित करने की ओर आगे बढ़े हैं। इसी के कारण हाल ही में काबुल में ‘‘टैक्निकल मिशन’’ को भारतीय दूतावास का दर्जा दिया गया है जो भारतीय शासकों की नीति परिवर्तन का ही संकेत है। 
    
यानी भारतीय शासक वर्ग अपने पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए कुछ भी करने को तैयार है। भारत का शासक वर्ग भारत के सबसे बड़े और सबसे पुरानी लोकतांत्रिक व्यवस्था होने का ढिंढोरा पीटता है वहीं पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए ऐसे कट्टरपंथियों के साथ मित्रता बढ़ा रहा है जिन्होंने अपने देश में लोकतंत्र को लात लगा मध्ययुगीन तानाशाही वाला शासन कायम किया है।
    
दूसरी बात संघी भाजपाई जब से सत्ता में आए हैं तब से मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलते रहे हैं। कभी लव जिहाद, लैंड जिहाद, गौ हत्या आदि आदि मुद्दे उछालकर मुसलमानों को निशाना बनाते रहे हैं, उन पर हमला करते रहे है। लेकिन कुछ खास तरह (शासक, पूंजीपति) के मुसलमानों से ये खूब प्यार करते हैं। उनका आदर सत्कार करते है। उनके लिए रेड कार्पेट बिछाते हैं। चाहे सऊदी के शेख हों या फिर बांग्लादेश की शेख हसीना हो और अब ये तालिबानी विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी हो। ऐसे लोगों के लिए इनके दिल में बहुत प्रेम है। जिनके लिए ये सब कुछ करने को तैयार हैं।
    
पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ाने के लिए ये मुसलमानों के खिलाफ बढ़-चढ़ कर जहर उगल रहे होते हैं ताकि हिन्दू मुस्लिम के नाम पर आम मेहनतकश जनता आपस में लड़ती रहे और पूंजीपति उनकी मेहनत की कमाई लुटते रहें। और जब ये सऊदी के शेख, शेख हसीना से लेकर कट्टरपंथी तालिबानियों की शान में कसीदे गढ़ रहे होते हैं, उनके विदेश मंत्री के लिए रेड कार्पेट बिछा रहे होते हैं, तब भी ये अपने आकाओं का मुनाफा ही बढ़ा रहे होते हैं।

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