क्रिसमस के दिन गिग वर्कर्स और डिलीवरी पार्टनर्स की हड़ताल
गिग एंड प्लेटफार्म सर्विस वर्कर्स यूनियन (जीआईपीएसडब्ल्यूयू) के आह्वान पर, भोजन और अन्य ऐप-आधारित ‘‘डिलीवरी पार्टनर’’ ने ‘‘सुरक्षा, संरक्षा और सम्मान’’ के अधिकार की मांग
गिग एंड प्लेटफार्म सर्विस वर्कर्स यूनियन (जीआईपीएसडब्ल्यूयू) के आह्वान पर, भोजन और अन्य ऐप-आधारित ‘‘डिलीवरी पार्टनर’’ ने ‘‘सुरक्षा, संरक्षा और सम्मान’’ के अधिकार की मांग
अंकिता भण्डारी केस में एक बार फिर से उबाल आ चुका है। भाजपा से निष्कासित पूर्व विधायक सुरेश राठौर की पत्नी उर्मिला सनावर द्वारा केस में वी आई पी के बतौर भाजपा के राष्ट्रीय
रामनगर/ वन ग्राम पूछडी में बुल्डोजर कार्रवाही के बाद भड़के ग्रामीणों के आक्रोश ने अब आंदोलन का रूप ले लिया है। संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले 21 दिसंबर
उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में हुये नये खुलासे में वीआईपी के रूप में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखंड प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम उर्फ ‘गट्टू’ क
2047 तक देश को विकसित बनाने की मोदी सरकार की नौटंकी जारी है। देश विकसित बने न बने पर देश के कानून जरूर विकसित भारत नाम के हो जायेंगे। इसी कड़ी में उच्च शिक्षा से जुड़ा एक न
यह हमेशा से होता रहा है कि जब भी शोषित-उत्पीड़ित जनता अपनी न्यायसंगत मांगों के लिए उठ खड़ी होती है और अपना संगठित आक्रोश व्यक्त करती है तो व्यवस्थापोषक लोग शांति और संयम की अपील करके उनको ठंडा करने की कोशिश करते हैं, ताकि उनका लूट का तंत्र चलता रहे। उनके लिए शांति और व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण होती है। न्याय की मांग को वे व्यवस्था के लिए खतरा मानते हैं।
वैसे तो उस समय सारी दुनिया में ही इस तरह के पूंजीवादी विकास के रास्ते की धूम थी पर गांधी के लिए स्पष्ट था कि किसी धार्मिक पांगापंथी और साम्प्रदायिक नेता के बदले आधुनिक ज्ञान-विज्ञान में यकीन करने वाले नेता के नेतृत्व में इस रास्ते पर चलना ज्यादा सुगम होगा। इस तरह ज्यादातर धार्मिक पोंगापंथी पूंजीपतियों के लिए भी नेहरू ज्यादा माकूल नेता बनते थे। इसी वजह से यह हुआ कि इन्हीं पूंजीपतियों से चंदा वसूल कर कांग्रेस पार्टी का खर्चा चलाने वाले पटेल के बदले नेहरू प्रधानमंत्री बन गये जो संगठन के रगड़-घिस्स वाले काम के बदले ‘हाई पालिटिक्स’ में ज्यादा रुचि रखते थे।
पूरी दुनिया के पैमाने पर नये साल का जश्न बहुत पुरानी बात न होकर महज बीसवीं सदी की बात है। शहरों के मुख्य चौराहों-बाजारों या ऐसे ही सार्वजनिक स्थलों पर उन्मादी भीड़ का जश्न तो बहुत ही हालिया घटना है। ‘पापुलर मास कल्चर’ (लोकप्रिय जन संस्कृति) बनवाने में पूंजीपतियों खासकर होटल-पर्यटन-मनोरंजन आदि से जुड़े कारोबारियों की अपनी खास भूमिका है। और इस जश्न में जिनकी पौ-बारह होती है वे पूंजीपति ही हैं। मध्यम वर्ग जश्न के उन्माद के बीतने के बाद हिसाब-किताब लगाता है। मजदूर वर्ग अपने थके हुए जिस्म व सतायी हुयी आत्मा को जश्न के उन्माद से राहत पहुंचाने की कोशिश करता है।
हाल ही में मोदी सरकार ने मनरेगा ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को खत्म कर विकसित भारत जी राम जी बिल संसद के दोनों सदनों से पास कराकर राष्ट्रपति से हस्ताक्षर करा लिए हैं और अ
हिटलर की आत्मा के भारत के भीतर यात्रा के 100 साल हो चुके हैं। एक ओर यह सत्ता के शीर्ष पर विराजमान है तो दूसरी तरफ अब हर शहर की गलियों में ये मौजूद है। इनके प्रभाव में नफर
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।
तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है।
वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?
अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं।
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।