हिंदू फासीवाद, बुलडोजर और बस्तियां

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आम गरीब नागरिकों के घरों और दुकानों को अलग-अलग तर्कों से बुलडोजर के जरिए रौंदने का अभियान जारी है। उत्तर प्रदेश में योगी राज से होता हुआ यह बुलडोजर अभियान अलग-अलग भाजपाई राज्यों में पहुंच चुका है। इनका बुलडोजर बड़े जोर-शोर से बस्तियों को जमींदोज कर रहा है। 
    
बुलडोजर निर्माण का नहीं बल्कि ध्वंस, आतंक, सामूहिक दंड का प्रतीक बन चुका है। सालों से बसी बस्तियों के ध्वंस के लिए अब हजारों पुलिस फोर्स और दर्जनों बुलडोजर तैनात कर दिए जाते हैं। स्थिति यह है कि घरों या झुग्गियों से निकलने से किसी के इंकार करने पर, अधिकारी उस इंसान सहित झोपड़ी या घर पर ही बुलडोजर चलाने का आदेश दे दे रहे हैं। 
    
हिटलर के दौर में 1943 के बाद से नाजियों ने बुलडोजरों को ‘‘नरसंहार प्रबंधन’’ के औजार के रूप में इस्तेमाल किया था। इजरायली शासकों ने फिलिस्तीनी प्रतिरोध को कुचलने में बुलडोजर का इस्तेमाल किया था। यही बुलडोजर भारत के भीतर हिंदू फासीवादियों का भी बेहद प्रिय औजार बन चुका है। वैसे भी हिटलर और इजरायली शासक इन्हें बेहद प्रिय हैं यही इनके प्रेरणा स्रोत हैं।
    
हिंदू फासीवादियों के आजादी के अमृतकाल में, यह बुलडोजर, बस्तियों में रहने वाले लोगों को आतंकित करते हुए उनकी भावनाओं, सपनों को रौंदकर आगे बढ़ रहा है। 
    
उ.प्र. में योगी राज में अपराधियों को सबक सिखाने की आड़ में बुलडोजर का खुलकर इस्तेमाल किया गया था। विशेषकर जहां कथित अपराधी मुसलमान हैं या फिर भाजपाई या संघी नहीं हैं उनके घरों को अवैध घोषित करके और आरोप साबित हुए बिना ध्वस्त कर दिया जाता है। उसके बाद से बस्तियों को, घरों को अवैध घोषित करके बुलडोजर से ध्वस्त कर देने का घृणित अभियान देशव्यापी हो चुका है। खुद योगी सरकार का दावा है कि इस तरह 67 हजार एकड़ जमीन उन्होंने ‘मुक्त’ कराई है।   
    
इसी साल, कुछ समय पहले, गुजरात में 8 हजार घरों को ध्वस्त करने के लिए 3000 से ज्यादा पुलिसकर्मी और 150 से ज्यादा बुलडोजर लगाए गए। इस वक्त असम की हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार तीन गांवों के 1700 परिवारों के घरों को बुलडोजर से ध्वस्त कर देने का अभियान छेड़े हुए है। इसी तरह के हाल अन्य भाजपाई राज्यों के भी हैं। जहां आजाद और ‘लोकतांत्रिक देश’ की गरीब जनता बर्बर तरीके से कुचली जा रही है। 
    
दिल्ली में बड़े पैमाने पर ध्वंस का यह अभियान पिछले 4-5 सालों से चल रहा है। इस बीच इसमें और तेजी आ गई है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी ठेंगे पर रखकर बुलडोजर से झुग्गी, झोपड़ियों, घरों, दुकानों को ध्वस्त कर दिया जा रहा है। 
    
ऐसा नहीं है कि आजाद भारत में ध्वस्तीकरण का अभियान इससे पहले ना हुआ हो। मगर इस ऊंचे घृणित स्तर पर जहां यह नफरत, सबक सिखाने, आतंक और ध्वंस का पर्याय बन जाए; ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। 1976 के आपातकाल के दौर में कांग्रेसियों ने तुर्कमान गेट से गोलियों और बुलडोजर के दम पर ही सात लाख लोगों को विशेषकर मुसलमानों को बेघर कर दिया था। इसमें 400 लोगों के मारे जाने और 1000 के घायल होने तक की बातें कुछ रिपोर्ट्स में आईं। सरकारी रिपोर्ट्स ने 5-20 तक लोगों के मरने की बात की। तब दिल्ली को खूबसूरत दिखाने के लिए यह सब किया गया था।
    
जब ‘उदार लोकतांत्रिक’ कांग्रेस ऐसा कर सकती थी, तब भाजपा और संघ तो, नाजी पार्टी से कम नहीं हैं। तब जो काम आपातकाल की आड़ में किया गया था अब वही काम संघी खुलेआम अदालती आदेश का मजाक उड़ाते हुए करते हैं।
    
संघियों ने बुलडोजर का यह इस्तेमाल शायद, अपने पसंदीदा हुक्मरान, इजरायल के जियनवादी फासीवादी शासकों से सीखा है। जिस तरह उन्होंने फिलिस्तीनी बस्तियों पर बुलडोजर चलाए थे वही काम हिंदू फासीवादी कर रहे हैं।
    
संविधान के अनुच्छेद 21 के मुताबिक, ‘‘रहने का अधिकार’’ एक मौलिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने कई केसों में कहा है कि अच्छे घर का अधिकार, जीने के अधिकार का ही हिस्सा है। कोर्ट ने यह भी साफ कहा है कि बेदखली से पहले व्यक्ति की गरिमा (इज्जत) और रोजगार (कमाई) का ध्यान रखना जरूरी है। बेदखल करने से पहले प्रभावित व्यक्ति को अपनी बात कहने का मौका देना होगा। कोई भी सरकार या अधिकारी बिना नोटिस दिए, बिना सुनवाई किए लोगों को उनके घर से नहीं निकाल सकता। यह कानूनन गलत है। नवंबर 24 में कोर्ट ने इस बुलडोजर अभियान को असंवैधानिक बताया था। मगर भाजपाइयों का ‘‘बुलडोजर न्याय’’ इस सबसे ऊपर है।
    
हिंदू फासीवादियो के लिए यह संविधान व इसकी सीमित जनवादी संवैधानिक अधिकारों की बातें कोई मायने नहीं रखतीं। और इससे संबंधित सुप्रीम कोर्ट का निर्देश भी कोई मायने नहीं रखता। ध्वस्तीकरण का अभियान बदस्तूर जारी रहता है।
    
एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 और 2023 में भारत के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में राज्य प्राधिकारियों (स्थानीय, राज्य और केंद्रीय स्तर पर) द्वारा लगभग 7.4 लाख लोगों को उनके घरों से जबरन बेदखल किया गया। इसमें ज्यादा हिस्सा दिल्ली का है। यहां संघी अवैध बस्तियों की आड़ में सी ए ए, एन आर सी विरोधी प्रदर्शनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मुसलमान इलाकों को भी ध्वस्त कर रहे हैं।
    
इसी अवधि में, देश भर में राज्य प्राधिकारियों ने 1.53 लाख से अधिक घरों को गिरा दिया। यह जानकारी वकालत समूह हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क (भ्स्त्छ) द्वारा जारी रिपोर्ट में सामने आई है।
    
रिपोर्ट के मुताबिक 2023 में प्रतिदिन कम से कम 294 घर नष्ट किए गए और प्रति घंटे 58 लोगों को बेदखल किया गया, जबकि 2022 में प्रतिदिन कम से कम 129 घर नष्ट हुए और प्रति घंटे 25 लोगों को बेदखल किया गया। 2017 से 2023 के बीच लगभग 17 लाख से अधिक लोगों को उनके घरों से बेदखल किया गया और लगभग 1 करोड़ 70 लाख लोग बेदखली और विस्थापन के खतरे के साथ जी रहे हैं।
    
यह भी देखने लायक है कि सुप्रीम कोर्ट के रेलवे किनारे बस्तियों को खाली कराने के आदेश ने संघी सरकार को अपने बुलडोजर अभियान को चलाने में भारी मदद पहुंचाई है। 2022 और 2023 में अदालती आदेशों के कारण लगभग 3 लाख लोगों को बेदखल किया गया। 2022 में, अदालती आदेशों के परिणामस्वरूप 33,360 से ज्यादा लोगों को बेदखल किया गया, जबकि 2023 में यह आंकड़ा लगभग 2.6 लाख तक पहुंच गया।
    
पिछले दो वर्षों में बेदखल किए गए 59 प्रतिशत यानी सबसे अधिक लोगों को ‘झुग्गी या भूमि सफाई’, ‘अतिक्रमण हटाने’ या ‘शहर को सुंदर बनाने’ के नाम पर विस्थापित किया गया। 2023 में इस तरह 2.9 लाख से अधिक लोगों को बेदखल किया गया, जबकि 2022 में यह संख्या 1.43 लाख से अधिक थी।
    
जबरन बेदखली के लिए बुनियादी ढांचा और कथित ‘विकास’ परियोजनाएं, जैसे ‘स्मार्ट सिटी’ प्रोजेक्ट; पर्यावरणीय परियोजनाएं, वन संरक्षण और वन्यजीव सुरक्षा; ‘आपदा प्रबंधन’ ‘बांध’ ‘खनन’ आदि के नाम पर विकास का तर्क दिया जाता है। आम तौर पर ही इन सब परियोजनाओं के शिकार भी आम नागरिक ही होते हैं। उन्हें जबरन बेदखल कर दिया जाता है। करोड़ों आदिवासी, इसके सबसे बड़े शिकार हैं। 
    
यह सब उस कथित राष्ट्र हित के नाम पर किया जाता है जिसके दम पर पूंजीवादी नेता और उद्योगपति, भू माफिया, खनन माफिया आदि मालामाल होते हैं।
    
कहीं-कहीं पर नगण्य मामलों में पुनर्वास की बातें होती हैं मगर बेहद कम लोगों के लिए ही यह व्यवस्था होती है। लेकिन यहां भी रोजगार का विकल्प कुछ नहीं होता या कोई व्यवस्था नहीं होती। इसीलिए कई लोग इस पुनर्वास की जगह पर जाना ही नहीं चाहते। 
    
यह बुलडोजर न्याय या ध्वस्तीकरण अभियान आने वाले वक्त में और बड़े जोर-शोर से चलना है। आम तौर पर शहरों में 20-30 प्रतिशत आबादी मलिन बस्तियों में रहती हैं। दिल्ली में ऐसे लोगों की संख्या 30 लाख से ज्यादा बताई जा रही है। 
    
हिंदू फासीवादी इस ध्वस्तीकरण अभियान से पहले ही इस तरह का माहौल बनाते रहे हैं जैसे इन बस्तियों में आपराधिक लोग हों और ये सभी मुसलमान हों तथा बस्तियां अवैध हों। इस तरह एक तरफ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होता है साथ ही प्रभावित लोगों के प्रति माहौल खराब हो इसलिए नैतिक संकट भी पैदा किया जाता है। ऐसा करके अपने मकसद को आगे बढ़ाने में संघी कामयाब हो जाते हैं। लेकिन जैसे-जैसे ‘बुलडोजर न्याय’ आगे बढ़ रहा है वैसे-वैसे इस अन्याय के खिलाफ माहौल भी बनता जा रहा है। इसके खिलाफ एकजुट संघर्ष की जरूरत है।  

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