हिन्दू फासीवाद, बिहार चुनाव और एन आर सी

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एक बार फिर से राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एन.आर.सी. बहस के दायरे में आ चुकी है। इस पर अपने पक्ष में माहौल कायम करने में हिन्दू फासीवादी एक हद तक सफल हुए हैं। 2019-20 में नागरिकता संशोधन कानून के जरिए और फिर देश में एन.आर.सी. कराने की घोषणा के बाद से पूरे देश में आंदोलन प्रदर्शन हुए थे। जिसका बर्बर दमन भी हुआ मगर मोदी सरकार प्रतिरोध की आवाज को कुचल देने में असफल रही थी। तब गृह मंत्री और सरकार को संसद में बोलना पड़ा कि यह नागरिकता लेने वाला कानून नहीं है बल्कि देने वाला कानून है; साथ ही यह भी कहा गया कि देश में कोई एन.आर.सी.नहीं होगी। इसके जरिए हिन्दू फासीवादी बेहद ऊंचे स्तर का ध्रुवीकरण (हिन्दूओं में मुसलमानों के खिलाफ भयानक नफरत) करने में कामयाब रहे थे। इस बीच फिर से चुपके-चुपके हिन्दू फासीवादी सरकार अपने इस एन.आर.सी. के एजेंडे की ओर अलग तरह से आगे बढ़ती रही। इसके पक्ष में बिहार, मणिपुर, बंगाल, उत्तराखंड आदि जगहों पर माहौल बनाती रही। ऐसा बाहरी बनाम भीतरी, अवैध घुसपैठिए, रोहिंग्या लैंड जिहाद, जनसांख्यिकीय परिवर्तन आदि-आदि का तर्क देकर किया गया; जाहिर है इसके लिए संघियों ने मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराकर उनके खिलाफ नफरत फैलाकर एन.आर.सी. के पक्ष में भी माहौल बनाया।  
    
अब बिहार चुनाव से पहले विशेष गहन पुनरीक्षण (एस.आई.आर.) की आड़ में एन.आर.सी. का खेल खेला गया है और खम ठोककर चुनाव आयोग कह रहा है कि यह प्रक्रिया अब पूरे देश भर में लागू होगी। बिहार के बाद चुनाव पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुदुचेरी में होने हैं। वहां भी एस.आई.आर. (विशेष गहन पुनरीक्षण) होगी यानी इसके जरिए एन.आर.सी. होगी। 
    
बिहार में चुनाव नवंबर माह में होने हैं। इस साल जून के अंत में चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण कराने का फैसला लिया। इसके तहत सभी मतदाताओं को गणना प्रपत्र (Enumaration Form) भरना है। 25 जून से 26 जुलाई के बीच इसे बूथ स्तर के अधिकारी घर-घर जाकर सम्पन्न करेंगे। सभी के लिए इसे भरना और इसके साथ ही अपनी नागरिकता को साबित करने वाला कोई दस्तावेज भी जमा करना है। अभी नहीं तो बाद में ही सही, मगर सबूत के लिए दस्तावेज देना अनिवार्य है।
    
चुनाव आयोग के इस फरमान से यह भी साफ हो गया कि आधार कार्ड और वोटर कार्ड, पेन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस जैसे सबूत, नागरिकता को साबित करने वाले दस्तावेज नहीं हैं। हिन्दू फासीवादियों का अपने एजेंडे को धार देने के लिए तर्क है कि यह सब कथित घुसपैठियों ने भी बनवा लिया है। इसलिए ये केवल पहचान के दस्तावेज ही हो सकते हैं।  फिर चुनाव आयोग और मोदी सरकार के हिसाब से नागरिक होने के सबूत क्या हैं ? वे 11 दस्तावेज, जिसमें जन्म का प्रमाण पत्र सहित 10 दस्तावेज हैं- पासपोर्ट, मैट्रिक या उच्च शिक्षा प्रमाण पत्र, सरकारी पहचान या पेंशन आदेश, स्थायी निवास प्रमाण पत्र, वन अधिकार पत्र, जाति प्रमाण पत्र (SC/ST/OBC), एनआरसी दस्तावेज (यदि लागू हो), पारिवारिक रजिस्टर (स्थानीय निकाय द्वारा जारी), भूमि या मकान आवंटन प्रमाण पत्र, 1987 से पहले जारी सरकारी या PSU पहचान पत्र। हालांकि अस्पष्टता और भ्रम बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग ने कहा कि यह लिस्ट सम्पूर्ण नहीं है। 11 दस्तावेजों में से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और परिवार रजिस्टर, जो एसआईआर प्रक्रिया के तहत स्वीकार किए जाने वाले दो अन्य दस्तावेज हैं, बिहार में मौजूद नहीं हैं।
    
जिस मतदाता पहचान पत्र (वोटर कार्ड) की, टी एन शेषन के जमाने में, फर्जी वोटिंग और बूथों की लूट को खत्म करने और पारदर्शिता लाने के नाम पर काफी संसाधन खर्च करने के बाद, देश भर में धूम-धड़ाके और नगाड़े के साथ शुरुवात की गई; उसे ही आसानी से खारिज कर दिया गया है। यही हश्र आधार कार्ड का है। इस परियोजना पर अब तक 13,000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुके हैं मगर इसे भी चुनाव आयोग अस्वीकार कर चुका है। 
    
बिहार चुनाव के लिए जारी गणना प्रपत्र भरने के लिए तीन श्रेणियां हैं। इसमें 1987 से पहले जन्मे व्यक्ति को स्वयं को साबित करने वाला दस्तावेज जन्म संबंधी और स्थान संबंधी (वर्तमान एस आई आर हेतु निर्धारित 11 दस्तावेजों में से) जमा करना होगा जबकि 1987-2004 के बीच जन्मे व्यक्ति को इसी तरह स्वयं तथा एक दस्तावेज माता या पिता में से एक का तथा 2004 के बाद जन्मे व्यक्ति को स्वयं का तथा माता-पिता दोनों का दस्तावेज जमा करना होगा। अभी भले ही गणना प्रपत्र बिना दस्तावेज के भरे जाने की बात हो रही हो मगर इसे बाद में जमा करना होगा। बूथ लेवल अधिकारी पर इसे घर-घर जाकर भरवाने की जिम्मेदारी है। अंततः यह सब काम हर विधान सभा या लोक सभा सीट के स्तर पर काम करने वाले ई.आर.ओ. (चुनाव पंजीकरण अधिकारी) की निगरानी में होगा। 
    
वैसे यह भी मजेदार है कि जिस आधार को चुनाव आयोग नागरिकता का दस्तावेज नहीं मानता उसी आधार के जरिए हासिल होने वाले स्थायी व निवास प्रमाण पत्र (डोमिसाइल) को नागरिकता का आधार मानता है। 
    
क्या होगा यदि ई.आर.ओ. (चुनाव पंजीकरण अधिकारी) की नजर में दस्तावेज में कुछ संदिग्ध लगे? यह ई.आर.ओ. के विवेक (मर्जी) पर छोड़ दिया गया है कि वह इसे मतदाता मान ले या चाहे संदिग्ध नागरिक मान ले। संदिग्ध माने जाने पर, व्यक्ति पर विदेशी न्यायाधिकरण में मामला बनेगा। इस तरह एक घुसपैठिए या शरणार्थी बनने के खतरे सामने होंगे। जो दस्तावेज जमा नहीं कर पाएंगे उनके ऊपर भी तलवार लटक जाएगी; घुसपैठिए या शरणार्थी घोषित कर दिये जाने का खतरा इनके सामने भी होगा। जाहिर है यदि इसी तरह चीज आगे बढ़ती है और जिसकी संभावना अधिक है तब इसके निशाने पर मुसलमान, गरीब, आदिवासी, सरकार की जनविरोधी और जनवाद विरोधी नीतियों का विरोध करने वाले लोग ही होंगे। 
    
विपक्ष और कुछ अन्य ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। मगर चुनाव आयोग की कार्यशैली आदि को कठघरे में खड़ा करने के बावजूद न्यायालय का रुख हिन्दू फासीवादियों के पक्ष में ही रहा। आखिर जस्टिस खन्ना, चंद्रचूड़, गोगोई का हाल देखकर कौन न्यायाधीश साहस करता। कोर्ट ने चुनाव आयोग को एस.आई.आर. को जारी रखने के पक्ष में फैसला देकर आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आई डी को भी गणना प्रपत्र हेतु में मतदाता के पहचान हेतु मान्य करने का सुझाव दिया, आदेश नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि नागरिकता की पहचान करने का काम चुनाव आयोग का नहीं बल्कि गृह मंत्रालय का है। 
    
चुनाव आयोग और संघी सरकार के मंत्रियों का दावा है कि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया पहली बार नहीं हो रही, पहले भी कई बार हो चुकी है यह सामान्य प्रक्रिया है, इस पर हंगामा क्यों! वास्तव में ये, यहां भी तथ्यों को तोड़-मरोड़कर मनमाने ढंग से प्रस्तुत कर रहे हैं। वास्तव में यह पहले के मतदाताओं का पुनरीक्षण भी है। विपक्ष का जहां तक सवाल है यह बुनियादी सवाल खड़ा करने के बजाय व्यवहारिकता पर ज्यादा प्रश्न खड़े कर रहा है। परीक्षण के लिए बेहद कम समय होना एक समस्या है मगर बुनियादी प्रश्न नहीं। 
    
पहले भी अलग-अलग वक्त पर सामान्य परीक्षण, गहन परीक्षण होते रहे हैं। हर साल समरी परीक्षण होता रहा है। मतदाता की मौत, पलायन, नई पीढ़ी से मतदाता के रूप शामिल होने आदि कारणों से मतदाता सूची में नाम जुड़ने, हटाने की प्रकिया चलती है जिससे यह संशोधन जरूरी हो जाता है। 2024 के चुनाव से पहले भी यह परीक्षण हुआ था। 
    
बिहार में इससे पहले 2003 में गहन परीक्षण हुआ था इसके साथ ही यह उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ में भी हुआ। इसके बाद 2004 में पूर्वोत्तर भारत के पांच राज्यों और जम्मू कश्मीर में यह गहन परीक्षण हुआ। आम तौर पर इनमें 6-6 माह का समय लगाया गया। इस गहन परीक्षण में भी बी.एल.ओ को घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करना होता था। ये सभी या यह सत्यापन, बिना किसी नागरिकता के दस्तावेज की मांग के ही सम्पन्न हुआ। किसी भी उपलब्ध दस्तावेज या स्वघोषणा आदि के द्वारा जांच पड़ताल करके मतदाता सूची में नाम जोड़े या घटाये गए। इस तरह मतदाता सूची बनी। वैसे भी फार्म 6 में अपनी उम्र और पते का स्व-सत्यापित दस्तावेज के आधार पर मतदाता सूची में नाम जोड़ने का प्रावधान था। अमुक व्यक्ति ही भारतीय नागरिक है या नहीं, यह साबित करने की जिम्मेदारी नागरिक के ऊपर नहीं बल्कि सरकार के ऊपर या आरोप लगाने वाले के ऊपर थी। गलत दावे पर एक साल की सजा का प्रावधान था।  
    
वैसे तथ्य यह भी है कि बिहार में चुनाव आयोग के आदेश पर ही जून 2024 से नवम्बर 2024 के बीच समरी परीक्षण की कार्यवाही चली थी। 2025 में मतदाताओं की अंतिम लिस्ट जारी कर दी गई थी। इस लिस्ट में कोई भारी उतार-चढ़ाव नहीं था। मगर इस बीच अचानक ही ‘विशेष’ गहन परीक्षण की घोषणा चुनाव आयोग ने कर दी। 
    
बिहार में वर्तमान गहन परीक्षण जिसमें विशेष शब्द जोड़ दिया गया है वास्तव में यह हिन्दू फासीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने का जरिया है। यह संघी प्रयोग भी है। व्यापक विरोध होने पर किन्तु परंतु के साथ इसे वापस ले लिया जाएगा या तौर-तरीके बदल दिए जाएंगे। यह आने वाला वक्त बतायेगा। इस परीक्षण की खासियत यह है कि बिना कहे आम नागरिकों को नागरिकता विहीन घोषित कर दिया गया है और अब हर किसी को अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए उपरोक्त 11 दस्तावेज में से कोई एक दिखाना होगा। इसके लिए दर-दर की ठोकर खानी होगी। यानी आरोप लगाने वाले को नहीं बल्कि निर्दोष को साबित करना होगा कि वह अपराधी नहीं है। इस तरह सबूत जुटाने का बोझ जनता पर लाद दिया गया है। यह विशेष परीक्षण इस तरह न्याय की बुनियादी अवधारणा पर भी हमला है। अपनी बारी में यह स्वयं सरकार की वैधता पर प्रश्न चिह्न खड़ा कर देता है। 
    
कोई कह या सोच सकता है कि दस्तावेज देने या जुटाने में कौन सी मुश्किल होनी है। यदि देश की बात ना करें, केवल बिहार की ही बात करें तब जमीनी सच्चाई सामने आ जाएगी। 
    
2011 की सामाजिक-आर्थिक जनगणना के अनुसार, बिहार के 65.58 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास कोई जमीन नहीं है, जिससे वे भूमि या निवास से जुड़े दस्तावेज पेश नहीं कर सकते। वहीं, विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2023 तक केवल 27.44 लाख पासपोर्ट ही राज्य में जारी हुए थे - यानी कुल आबादी का सिर्फ 2 प्रतिशत। बिहार जाति सर्वेक्षण 2022 बताता है कि सरकारी सेवा में कार्यरत लोग केवल 1.57 प्रतिशत (20.49 लाख) हैं, जो शायद दस्तावेजों की न्यूनतम आवश्यकता को पूरा करते हैं। बिहार की कुल जनसंख्या 13.07 करोड़ (2022) में से 84 प्रतिशत लोग OBC, EBC,  SC/ST समुदाय से आते हैं। हालांकि इन समुदायों में से कितने लोगों के पास वैध जाति या निवास प्रमाणपत्र हैं, इसका भी कोई स्पष्ट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। लगभग 10-12 प्रतिशत लोगों ने 10 वीं पास की है। 
    
चुनाव आयोग, भाजपाइयों और अन्य संघी संगठनों का तर्क या कुतर्क है कि घुसपैठियों, गैर नागरिकों को नागरिक क्यों माना जाए? क्यों इन्हें वोट देने दिया जाए? ये तो विपक्षियों के खड़े किये हुए हैं! फिर घुसपैठियों, कथित बाहरी लोगों, अवैध अप्रवासियों को चिन्हित करने का एक ही तरीका है एन आर सी। इसलिए एन आर सी जरूरी है। 
    
वास्तव में यह संघियों द्वारा ध्रुवीकरण के लिए गढ़ा गया फर्जी तथ्य है और समाधान भी गलत है। मान भी लिया जाए कि कथित अवैध अप्रवासी देश के भीतर हैं, उन्होंने आधार कार्ड आदि बनवा लिए हैं तब इसके लिए जिम्मेदार जो लोग हैं उन्हें सजा दी जाए। सीमा पर सुरक्षा बल और गृह मंत्रालय इसके लिए जिम्मेदार हैं। इसका ठीकरा करोड़ों करोड़ आम नागरिकों पर क्यों फोड़ा जाए और नागरिकताविहीन घोषित करके, उन्हीं से नागरिकता साबित करने को क्यों कहा जाए।   
    
वैसे न्याय का तकाजा यही है कि जो भी लोग जहां से भी भारत में मेहनत मजदूरी करके जीवनयापन करने आये हैं उन्हें यहां का नागरिक घोषित कर यहां सम्मान से रहने दिया जाये। अप्रवासी भारतीयों की नागरिकता अगर बनी रह सकती है तो विदेशों से आये मजदूर-मेहनतकशों को भी नागरिकता दी जा सकती है। उन्हें शरणार्थी-घुसपैठिया कहकर दुत्कारने और इसके जरिये मेहनतकशों में परस्पर झगड़ा पैदा करने का काम मजदूर-मेहनतकश विरोधी फासीवादी सरकार ही कर सकती है। सरकार एक ओर जगह-जगह मुस्लिम बंगालियों की बस्तियों पर छापा डाल उन्हें देश से खदेड़ने का अभियान चलाये हुए है दूसरी ओर चुनाव आयोग को आगे कर एन आर सी लागू कर सभी मजदूर मेहनतकशों, दलितों, आदिवासियों को नागरिकता विहीन करने पर उतारू है। असम के अनुभव से स्पष्ट है कि इस प्रक्रिया के शिकार मुसलमानों से कहीं अधिक संख्या में हिन्दू मजदूर मेहनतकश, दलित, आदिवासी ही बनेगें। 
    
वास्तव में यह शासक वर्ग के विशेषकर हिन्दू फासीवादियों के घृणित और पाखंडपूर्ण आचरण को दिखाता है। उन्हें एक तरफ बाहर से (तीन मुस्लिम देशों से) गैर मुस्लिमों को नागरिकता देने में कोई गुरेज नहीं है; और साथ ही दूसरे देशों के शासक वर्ग के लोगों और उनकी पूंजी के स्वागत में कोई परहेज नहीं है। इनके अमीर लोगों को नागरिकता (प्राकृतिककरण द्वारा) देने से भी कोई परहेज नहीं है। मगर निशाने पर गरीब प्रवासी मजदूर हैं जो नारकीय से थोड़ा बेहतर जिंदगी की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह की खाक छानते हैं। संघियों का एक तरफ यह हंगामा है तो दूसरी तरफ 2018 से 2023 के बीच लगभग साढ़े आठ लाख भारतीयों ने अपनी नागरिकता त्याग कर विकसित देशों की नागरिकता ग्रहण कर ली है। 
    
कुल मिलाकर संघ-भाजपा अपने हिंदू फासीवादी एजेंडे को बिहार से होते हुए पूरे देश में लागू करने की ओर बढ़ रहे हैं। इसमें हाल फिलहाल कितना आगे बढ़ेंगे या आगे बढ़ पाएंगे, यह आगे की स्थितियों पर निर्भर करेगा। मगर तात्कालिक तौर पर बिहार के चुनावों में जीत हासिल करने के लिए भी यह संघियों के लिए मददगार होगा। 

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