जब जंगी जहाज़ ओझल हो जाते हैं -महमूद दरवेश

जब जंगी जहाज ओझल हो जाते हैं, फाख्ता उड़ती हैं
उजली, उजली आसमान के गालों को पोंछते हुए
अपने आजाद डैनों से, वापस हासिल करते हुए वैभव और प्रभुसत्ता
वायु और क्रीड़ा की। ऊंचे और ऊंचे
फाख्ता उड़ती हैं, उजली, उजली। काश, कि आसमान
असली होता (एक आदमी ने गुजरते हुए दो बमों के बीच से मुझे कहा)
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एक हत्यारे से : अगर तुमने शिकार के चेहरे पर ध्यान दिया होता
और सोचा होता, तुम याद कर पाते गैस चैम्बर में अपनी मां को,
तुम खुद को आजाद कर पाते राइफल के विवेक से
और बदल देते अपना विचार : यह वह तरीका नहीं
जिससे पहचान वापस हासिल की जाती है!
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हमारे नुकसानात : दो शहीदों से आठ
हर रोज,
और दस जख्मी
और बीस घर
और पचास जैतून के दरख्त,
अलावा उस संरचनात्मक आघात के
जो होगा कविता को, नाटक और अधबनी पेंटिंग को
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एक औरत ने एक बादल से कहा : मेरे प्यारे को ढांप लो
क्योंकि मेरे कपड़े तर हैं उसके ख़ून से!
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अगर तुम एक बारिश नहीं बनोगे, मेरे प्यारे
एक पेड़ हो जाओ
उर्वरता से तर.. पेड़ हो जाओ एक
और अगर तुम पेड़ नहीं बनोगे मेरे प्यारे
एक शिला बन जाओ
नमी से तर.. शिला बन जाओ एक
और अगर तुम शिला भी नहीं बन सकते मेरे प्यारे
एक चांद बन जाओ
आशिक की नींद में.. चांद बन जाओ एक

(ये वे बातें हैं वह जो एक औरत ने कहीं
अपने बेटे को दफ्न करते हुए)
  (साभार : कविता कोश)
 

आलेख

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