कालचक्र

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मैं वक्त हूं, सदैव गतिमान हूं
भूत, भविष्य और वर्तमान हूं,
मैं तब भी मौजूद था
जब धरती पर तुम्हारा वजूद नहीं था
और तब भी रहूंगा जब तुम
नेस्तनाबूद हो जाओगे।

मैंने देखा है इतिहास को
बनते, बिगड़ते और बदलते हुए
सामंतों के सूरज को ढलते हुए
मैं दूर पहाड़ी के ऊपर से देख रहा था
बास्तील के किले को ध्वस्त होते हुए
जारशाही को धूल धूसरित होते हुए।

मैं चश्मदीद हूं
हिटलर के नाजीवाद का,
मुसोलिनी के फासीवाद का
मैंने सुनी हैं वो भयानक डरावनी चीखें
हिटलर के यातना शिविरों में देखा है
तड़प-तड़प कर दम तोड़ते हुए
मासूम बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं को।

मैं गवाह हूं उस खौफनाक मंजर का
जब सनकी तानाशाहों ने दुनिया को
झोंक दिया था विश्वयुद्ध की आग में
करोड़ों लोगों की नरबलि देकर
आहुति दी थी फासीवाद के यज्ञ में।

मगर इतिहास गवाह है
जनता भी तानाशाहों को माफ नहीं करती
तब तक पीछे नहीं हटती
जब तक इंसाफ नहीं करती
सुनो ऐ इक्कीसवीं सदी के फासीवादियों
तुम्हारे कर्मों का भी एक दिन जरूर हिसाब होगा
तब ही सही मायनों में जनवाद होगा।।
        -भारत सिंह, आंवला

आलेख

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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