कालचक्र

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मैं वक्त हूं, सदैव गतिमान हूं
भूत, भविष्य और वर्तमान हूं,
मैं तब भी मौजूद था
जब धरती पर तुम्हारा वजूद नहीं था
और तब भी रहूंगा जब तुम
नेस्तनाबूद हो जाओगे।

मैंने देखा है इतिहास को
बनते, बिगड़ते और बदलते हुए
सामंतों के सूरज को ढलते हुए
मैं दूर पहाड़ी के ऊपर से देख रहा था
बास्तील के किले को ध्वस्त होते हुए
जारशाही को धूल धूसरित होते हुए।

मैं चश्मदीद हूं
हिटलर के नाजीवाद का,
मुसोलिनी के फासीवाद का
मैंने सुनी हैं वो भयानक डरावनी चीखें
हिटलर के यातना शिविरों में देखा है
तड़प-तड़प कर दम तोड़ते हुए
मासूम बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं को।

मैं गवाह हूं उस खौफनाक मंजर का
जब सनकी तानाशाहों ने दुनिया को
झोंक दिया था विश्वयुद्ध की आग में
करोड़ों लोगों की नरबलि देकर
आहुति दी थी फासीवाद के यज्ञ में।

मगर इतिहास गवाह है
जनता भी तानाशाहों को माफ नहीं करती
तब तक पीछे नहीं हटती
जब तक इंसाफ नहीं करती
सुनो ऐ इक्कीसवीं सदी के फासीवादियों
तुम्हारे कर्मों का भी एक दिन जरूर हिसाब होगा
तब ही सही मायनों में जनवाद होगा।।
        -भारत सिंह, आंवला

आलेख

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