कहानी - चाचा भतीजा

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किसी मनुष्य के जीवन में कोई इंसान कब जगह बना ले इसके बहुत से कारण होते हैं। वो इंसान आपकी पत्नी हो सकती है, कोई महिला मित्र हो सकती है। कोई हमउम्र दोस्त, रिश्ते का भाई, कोई मजदूर साथी। वो शख्स कोई भी हो सकता है जो एक खास जगह बना ले। जिसके साथ आपको सबसे ज्यादा अच्छा महसूस हो। जिसके साथ आप अपना हर सुख-दुख बांट सकें। यदि आपके भीतर मौजूद आपके व्यक्तिगत गुण समाज के लिए हितकारी होते हैं तब आपका निजी रिश्ता सदैव ऊर्जावान बना रहता है और यदि आपका अवगुण जिसे आप अपना गुण समझने का मुगालता पाले हुए हैं तब यह अवगुण समाज के लिए और किसी व्यक्ति विशेष के लिए श्राप बन जाता है। 
    
राधे नाथ गोस्वामी और श्याम नाथ गोस्वामी ऐसे दो व्यक्ति हैं जिन्हें चाचा-भतीजा के नाम से जाना जाता है। कुछ लोग दोनों को एक-दूसरे की मेहरारू कह कर भी संबोधित करते हैं।
    
थोड़ी सुरती खिलाना! राधे नाथ ने सुरती मांगते हुए कहा। राधे नाथ 15 साल से सुरती मांग कर खाने का आदी है लेकिन जीवन में शायद ही कभी सुरती खरीदी हो। ‘‘अबे कभी तो खरीद कर खा लिया कर!’’ शर्मा वेल्डर ने दुत्कारते हुए कहा जो दिन भर सुरती मांग कर खाने वालों से दुखी रहता है। राधे जो कि नाथ संप्रदाय से है बोला ‘‘मेरा तो धर्म ही है मांग कर खाना, शर्म किस बात की।’’ किसी और से सुरती मांगने चला जाता है।
    
श्याम नाथ सुरती बना रहे हैं, एक चुटकी में सुरती लेकर राधे नाथ को पकड़ाते हैं। दोनों ही लोगों में जब भी कोई सुरती बनाता तो दोनों के लिए ही बनाता, दोनों एक-दूसरे का ध्यान रखते। जहां पर भी काम करते एक साथ काम करते। हालांकि दोनों के रहन-सहन में जमीन-आसमान का फर्क है। राधे नाथ जहां गंदे कपड़ों में बिना नहाए, हवाई चप्पल में ड्यूटी आते हैं वहीं श्याम नाथ साफ-सुथरे अच्छे कपड़ों, जूतों में नहा धोकर ड््यूटी आते हैं। श्याम नाथ कभी-कभी देसी शराब पीते हैं वहीं राधे नाथ को रोज कच्ची थैली वाली सस्ती शराब चाहिए।
    
राधे नाथ का कंजूसपना, चपलता, शातिरपना बाकी मजदूरों के प्रति होता है। परन्तु  श्याम नाथ के प्रति एकदम विपरीत। जब भी दोनों साथ में काम करते तो काम का अधिक भार खुद उठाते हैं और श्याम नाथ पर अक्सर ही काम का बोझ कम पड़ता है। यदि कभी राधे नाथ छुट्टी पर होते और श्याम नाथ काम के बोझ में फंस जाते तो राधे नाथ कुछ जुगाड़ करके आधे दिन से भी ड्यूटी आ जाते। और श्याम नाथ के लिए यह पल ऐसा होता मानो स्वयं नारायण आ गए हों।
    
इंसान के जीवन में ऐसा बहुत कुछ होता है जो सामने खड़े दूसरे इंसान को पसंद भी आ सकता है और नापसंद भी। राधे नाथ का निजी व्यवहार जहां श्याम नाथ के लिए परस्पर सहयोग, प्रेम भरा था वहीं बाकी अन्य मजदूरों के प्रति उन्हें परेशान करने वाला था। एक जगह पर एक साथ काम करने वाले लोग अक्सर परस्पर सहयोग की उम्मीद में रहते हैं लेकिन जब कोई मजदूर किसी एक मजदूर के प्रति मित्रवत व्यवहार करे और बाकी मजदूरों के प्रति कुटिलता का परिचय दे तब ऐसे व्यक्ति के प्रति दुराग्रह का पैदा होना मानव प्रकृति का आम हिस्सा होता है।
    
किसी भी मनुष्य के सामाजिक, व्यक्तिगत व्यवहार के कुछ निश्चित कारण होते हैं। राधे नाथ के जीवन का एक पहलू यदि कड़ी मशक्कत है तो दूसरा पहलू सुपरवाइजर के प्रति चापलूसी, जी हुजूरी और थोड़ा नगद फायदा का भी है। जिसका फायदा अहम मौकों पर सुपरवाइजर उठाता है। अक्सर ही जटिल काम होने पर राधे नाथ एक सामान्य और औसत मजदूर की क्षमता से ज्यादा काम करता और इसका खामियाजा बाकी मजदूरों को उठाना पड़ता है। और सुपरवाइजर का सहयोग पाकर अक्सर राधे नाथ खाली घूमता और सुपरवाइजर उसे अनदेखा किया करता है। इसी मौकापरस्ती का लाभ राधे नाथ और श्याम नाथ को मिलता कि दोनों हमेशा साथ में रहते।
    
फैक्टरी के भीतर जब आप आधुनिक मशीनों के साथ उत्पादन की प्रकिया से जुड़े होते हैं तब मशीनें आपकी दिनचर्या निर्धारित करती हैं। लेकिन जिन जगहों पर हाथों और शरीर की मेहनत ही निर्णायक होती है वहां पर कामचोरी का अवसर और कड़ी मेहनत की मजबूरी दोनों मौजूद रहती है। और अपनी बारी में दोनों ही तत्व किसी दूसरे मजदूर के काम को प्रभावित करते हैं। दोनों ही तरीके किसी दूसरे औसत मजदूर के काम के बोझ को बढ़ा देते हैं। अक्सर ही जब किसी कामचोर मजदूर को मेहनत वाले काम में लगा दिया जाता है तब बाकी मजदूर खुश होते हैं और जब राधे नाथ जैसे मजदूर मैनेजमेंट को खुश रखने की खातिर एक सामान्य क्षमता से ज्यादा काम करते हैं तब बाकी मजदूर उसे तेलू और चमचा कहकर संबोधित करते हैं।
    
शाम होने को है। भारी पीसों का ढेर लगा हुआ है। सुपरवाइजर पर काम पूरा करवाने का दबाव है, और गाड़ी पूरी करने का दबाव मजदूरों पर डाला जाता है। ड्यूटी पूरी होने वाली है और अब एक-दो घंटों में गाड़ी लोड करने का मतलब मजदूर जानते हैं। इसीलिए दिन भर के थके मजदूर धीरे-धीरे टाइम पूरा करने की जुगत में हैं। सुपरवाइजर जानता है कि इस तरह तय समय पर गाड़ी नहीं जा पाएगी। चालाक दिमाग तुरंत राधे नाथ को 100 रुपए का लालच देकर इस काम में लगा देता है। और अपनी आदतन राधे नाथ श्याम नाथ को भी अपने साथ काम में लगा लेता है। दोनों के बीच काम से निकलने के बाद पकौड़ी और शराब की योजना तय हो जाती है।
    
धीरे-धीरे काम करने वाले मजदूरों को गरियाया जा रहा है। पुरुषार्थ पर प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं। चाचा-भतीजा जोर-शोर से भारी पीसों को तेजी से गाड़ी में डाल रहे हैं और बाकी मजदूरों को भी तेज काम करने के लिए उकसावा पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। और तभी एक जोरदार कराहने की आवाज सुनाई देती है। जल्दी काम करने की हड़बड़ी में लोहे का भारी पुर्जा ऊपर चढ़ाते समय किसी दूसरे पीस से टकराकर श्याम नाथ के पांव पर गिर पड़ा है। दर्द की कराहना श्याम की है जो अपने पैर को हाथों से दबाए कराह रहा है। भारी पुर्जे ने तीन जगह हड्डी में फ्रेक्चर कर दिया है और दर्द की गहरी वेदना में श्याम की आँखें नम हो गई हैं। थोड़ी ही देर पहले जिन लोगों के पुरुषार्थ को गरियाया जा रहा था उन्हीं हाथों में उठाकर श्याम नाथ को हास्पिटल ले जाने की तैयारी हो रही है। इसी बीच किसी अनुभवी मजदूर का स्वर राधे नाथ के कानों में पड़ता है ‘‘जो दूसरों के लिए गड्डा खोदता है, एक दिन खुद उसी में गिरता है’’। इसी बीच ड्यूटी पूरी होने का सायरन बज उठता है। -पथिक
 

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