अखबारों के मजदूर दुर्दशा के घड़ियाली आंसू

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व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह कितना ही शक्तिशाली हो समाज विकास की धारा को अवरुद्ध नहीं कर पाता। हो सकता है अविचल धारा में व्यवधान डालने के लिए वह धरती पर खून की धारा बहाकर शांति महसूस कर ले पर द्वन्द्व के हल होकर विकास के पक्ष में जाने से फिर धारा अविचल चल पड़ेगी। 
    
आज के युग को भी थामे रहने की चेष्टा करने वाले धन्नासेठों के भांति-भांति के कुचक्रों को समझने के लिए एक उदाहरण काफी है। बरेली में हो रही कई चालों में से एक कुटिल चाल की आहट की अक्षरों के माध्यम से आप लोगों तक अहसास, महसूस करने के लिए भेज रहा हूं। हो सकता है आप लोगों के हलके में भी इसी प्रकार की घटना घटित हो रही हो। 
    
सबेरे-सबेरे समाचार पत्र पहुंचता है। आजकल एक पन्ने में रोज कामगारों की काम के प्रतिफल और काम के दौरान असुविधाओं का ब्यौरा छपा रहता है, अलग-अलग संस्थानों के कामगारों को अलग-अलग दिन इकट्ठा करके उनसे उनके जीवन का लेखा-जोखा कुछ अखबार वाले छाप रहे हैं। 
    
अखबार वाले कभी रोडवेज के संविदा कर्मचारियों में जाते हैं, कभी पीडब्ल्यूडी में, कभी नगर निगम के संविदा कर्मचारियों में तो कभी रेलवे के सेवानिवृत कर्मचारियों में, कभी रेलवे कालोनियों में। इस तरह करीब बीस दिन से ऐसी खबरें अखबारों में चल रही हैं। 
    
इसी वाकया का एक हिस्सा है- बरेली में- ‘‘मार्केट वर्कर्स एसोसिएशन’’- बरेली शहर की दुकानों में काम करने वालों का एक संगठन, इनको भी अखबार वालों ने एक होटल में आमंत्रित कर बुलाया। इनकी तकलीफें पूछी गयीं, फोटो लेकर कुछ बयान अखबार में छापा गया। कर्मचारियों की सोच कितनी विकसित है इसे इससे समझा जा सकता है। कर्मचारी अपनी फोटो अखबार में देखकर ही खुश, मंत्रमुग्ध हो गये। यह उनकी समझ में आना चाहिए कि प्रशासन आज भयभीत है, पूंजी छटपटा रही है मजदूर को निचोड़ने के लिए। अब निचोड़ने के लिए कुछ बाकी नहीं है तो यह निचोड़े जाने वालों का गुस्सा नापने का हिस्सा है। अपनी फोटो अखबार में छपी देख खुश होने के बदले सचेत होने का वक्त है। इस चौथे खम्भे को भी हिलाने की जरूरत है जो मजदूरों के गुस्से, असंतोष को इकट्ठा कर एक तीर से कई शिकार कर रहा है- एक शिकार मजदूरों का असंतोष इकट्ठा कर शासन को आगाह करना, दूसरी उचित मजदूरों को पानी के छींटे मारकर सांत्वना देना कि तुम्हारी तकलीफें प्रशासन तक भेजी जा रही हैं। साथ ही कर्मचारियों की कार्य परिस्थितियों को, घटनाओं को माल बनाकर अखबार द्वारा बेचकर मुनाफा कमाना। इसी बहाने सरकार की अंधभक्ति में लीन अखबार अपनी गिरती साख को भी कुछ बचा ले रहे हैं। अक्सर मजदूरों के बयानों में भी वे कुछ सर्वज्ञात बातें ही ये छापते हैं। ये दुर्दशा का तो वर्णन करते हैं पर दुर्दशा के दोषी पूंजीपतियों-शासकों के बारे में छापने या दुर्दशा दूर करने का उपाय छापने से बचते हैं। 
    
दोस्तो, तुम्हारा खून तो निचोड़ा ही जा रहा है, तुम्हारी दुर्दशा को भी अखबारों के माध्यम से बेचा जा रहा है तो खुश होने के बदले सचेत होने का समय हे।         -देवसिंह, बरेली

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