‘‘मजदूर वर्ग या तो क्रांतिकारी है या कुछ भी नहीं’’

Published
Thu, 04/16/2026 - 15:50
/labour-varg-ya-to-revolutionary-hai-ya-kucha-bhi-nahin-0

1 मई : अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के अवसर पर

इस वर्ष का मजदूर दिवस भारत के मजदूर आंदोलन की नई लहर के साये में मनाया जायेगा। पानीपत रिफाइनरी के मजदूरों से शुरू हुई यह लहर अप्रैल के पहले पखवाड़े में गुड़गांव-नोएडा-फरीदाबाद-भिवाड़़ी में एक के बाद एक कम्पनियों में फैल गयी। यह लहर युद्ध के साये में बढ़ती महंगाई से त्रस्त मजदूरों द्वारा वेतन वृद्धि, बोनस, डबल ओवरटाइम सरीखी मांगों पर सामने आयी। चंद दिनों में मजदूरों के सैलाब ने पहले हरियाणा सरकार और फिर उ.प्र. की योगी सरकार को मजदूरों का वेतन बढ़ाने को मजबूर कर दिया। वेतन वृद्धि यद्यपि मजदूरों की मांग से काफी कम थी पर संघर्ष कर मजदूर हठी से हठी सरकार को भी झुका सकते हैं, यह सबक मजदूर वर्ग सीख चुका था। 
    
इस संघर्ष को शासन-प्रशासन-मालिकों ने सुनियोजित साजिश के तहत तोड़-फोड़-हिंसा की ओर धकेला। पहले से मौजूद ट्रेड यूनियन नेताओं की गिरफ्तारी-नोटिस-घर में कैद करने, फैक्टरी मालिकों के वेतन न बढ़ाने के उकसावे पूर्ण दावों व अराजक तत्वों को प्रश्रय व पुलिस के लाठीचार्ज ने गुड़गांव व नोएडा में दमन का इंतजाम कर दिया। गुड़गांव-नोएडा में करीब 350 मजदूरों, दसियों मजदूर नेताओं को 9 मुकदमों में फंसा शासन-प्रशासन मजदूरों की नई लहर को डर-भय के साये में डुबोने में जुट गया। 
    
यह कोई पहली बार नहीं था कि मजदूरों के उभार को दमन व जेल से दबाने की कोशिश की जा रही है। मजदूर संघर्षों का इतिहास बताता है कि मजदूरों के संघर्षों के हर नये उभार से शासक वर्ग जहां एक कदम पीछे हटता है वहीं संघर्ष को कुचलने के लिए हर नीच षड्यंत्र, कुत्सा प्रचार-दमन पर उतारू हो जाता है। खुद मई दिवस के शिकागो के मजदूरों के 8 घण्टे कार्यदिवस की मांग के साथ भी तब अमेरिकी शासक वर्ग हे मार्केट के षड्यंत्र के जरिये ही पेश आया था। उसने तब संघर्ष के 8 प्रमुख नेताओं पर झूठे मुकदमे कायम कर 4 नेताओं को फांसी पर चढ़़ा दिया था। पर इस सारे दमन चक्र के बावजूद अमेरिकी शासक मजदूरों के उभार को कुचलने में नाकाम रहे थे। 8 घण्टे का कार्य दिवस धीरे-धीरे ही सही आने वाले वर्षों में शासक वर्ग को स्वीकारना पड़ा था। 
    
मजदूर वर्ग के महान नेता कार्ल मार्क्स ने कहा था ‘‘मजदूर वर्ग या तो क्रांतिकारी है या कुछ नहीं’’। मार्क्स की इस बात का क्या मतलब है? दिन-रात फैक्टरी-संस्थानों में काम करता हरेक मजदूर अपने अनुभव से जानता है कि मालिकों के उत्पीड़न-शोषण-अत्याचार के आगे वह अकेले-अकेले एकदम बेबस है। अगर वह प्रतिरोध करता है तो एक झटके में उसे काम से निकाल बाहर कर दिया जाता है। हां जब वह हालिया संघर्ष की तरह समूह में सड़कों पर उतरता है तो कुछ मामलों में मालिकों को, शासक वर्ग को झुका सकता है। यानी एकजुट होकर ही मजदूर वर्ग एक लड़ाकू ताकत बन सकता है। इन अर्थों में गुड़गांव-नोएडा के मजदूर ‘कुछ नहीं’ से ‘कुछ’ के सफर को इन संघर्षों में एक हद तक तय कर चुके हैं। वे संगठित ताकत का महत्व देख चुके हैं। पर अभी उनका संगठित होना चूंकि स्वतः स्फूर्त था इसीलिए वह अस्थायी था। इसीलिए मालिक उन्हें फिर से बिखेरने में कामयाब हो सकता है। अपने को स्थायी रूप से संगठित करने के लिए जरूरी है कि मजदूर खुद को यूनियनों में हर फैक्टरी-संस्थान व इलाके के आधार पर संगठित करें। तभी वे ‘कुछ नहीं’ से ‘कुछ’ की स्थिति अपेक्षाकृत स्थायी तौर पर हासिल कर सकते हैं। 
    
पर इतना हो जाने पर भी उनके द्वारा हासिल ‘कुछ’ की स्थिति अभी ‘कुछ नहीं’ के ही अधिक करीब है। वे अभी समाज के सबसे बड़े वर्ग के रूप में राजनीतिक पटल पर अपनी भूमिका निभाने से कोसों दूर हैं। पूंजी की संगठित ताकत के सामने अभी भी वे कुछ खास हैसियत नहीं रखते हैं। ऐसे में ‘कुछ नहीं’ से ‘क्रांतिकारी ताकत’ तक का सफर तय करके ही मजदूर वर्ग अपनी वास्तविक ताकत हासिल कर सकता है। 
    
‘कुछ नहीं’ से एक ‘क्रांतिकारी ताकत’ में बदलने के लिए जरूरी है कि मजदूर वर्ग अपनी गुलामी-बदहाली के वास्तविक कारणों को पहचाने। वह पूंजी के शोषण के जुए को खत्म करने की राह को पहचाने। वह इतिहास के सबसे क्रांतिकारी वर्ग के बतौर अपने भीतर छुपी ताकत को पहचाने। वह अपने विश्व ऐतिहासिक मिशन को पहचाने। 
    
मजदूर वर्ग का विश्व ऐतिहासिक मिशन यही है कि वह सभी उत्पीड़ित-शोषित लोगों का नेतृत्व करते हुए पूंजीवाद-साम्राज्यवाद को ध्वस्त करते हुए दुनिया को पहले समाजवाद व फिर वर्गविहीन शोषणविहीन समाज की ओर ले जायेगा। इतिहास का सबसे क्रांतिकारी वर्ग होने के नाते मजदूर वर्ग में ही समाज को इस दिशा में ले जाने की क्षमता है। 
    
पिछली सदी में रूस-चीन से लेकर तमाम देशों के क्रांतिकारी मजदूर वर्ग ने समाजवादी समाज कायम कर इस ऐतिहासिक मिशन की ओर यात्रा शुरू की थी। तब मजदूर वर्ग ने दुनिया को अपनी क्षमता व ताकत का एक नमूना दिखा दिया था कि कारखानों में खटते मजदूर वक्त आने पर मजदूर राज की सत्ता भी संभाल सकते हैं और पूंजीवादी लूट-अत्याचार का खात्मा कर सकते हैं। पर पूंजीपति वर्ग ने पलटवार करते हुए मजदूर सत्ताओं को पलट दिया और पूंजीवाद की पुनर्स्थापना कर दी। मजदूरों को फिर से गुलामों की हालत में धकेल दिया। 
    
पिछली सदी की इस वक्ती पराजय से मजदूर आंदोलन और कम्युनिस्ट आंदोलन पीछे हटा व टूट-फूट बिखराव का शिकार हो गया। ऐसे में मजदूर वर्ग क्रमशः अपनी ताकत अपने विश्व ऐतिहासिक मिशन व वर्ग के बतौर अपनी एकजुटता से दूर होता गया। इतिहास के सबसे क्रांतिकारी वर्ग की बात भुला सी दी गयी। 
    
भारत के मजदूर आंदोलन की इस नई लहर के मौके पर जरूरी है कि इस नई लहर से हासिल पहलकदमी को बरकरार रखा जाए। मजदूर वर्ग को उसके ऐतिहासिक मिशन पर खड़़ा किया जाये। उसे एक वर्ग के बतौर गोलबंद किया जाये और इतिहास के सबसे क्रांतिकारी वर्ग की भूमिका निभाने के लिए तैयार हुआ जाये। मजदूर वर्ग को एक क्रांतिकारी ताकत में बदल दिया जाये। 
    
गुड़गांव-नोएडा के मजदूर संघर्षों ने व्यवहार में मजदूर वर्ग की ताकत का एक उदाहरण सबके सामने पेश कर दिया है। यही ताकत अगर क्रांतिकारी विचारों से लैस होकर अपनी क्रांतिकारी पार्टी में संगठित हो जाये तो यह समूचे भारत की एक ऐसी ताकत बन सकती है जो देश की समूची राजनीति के केन्द्र में खुद को ला सकती है। जो वक्त आने पर पूंजीवादी व्यवस्था को ध्वस्त कर समाजवादी क्रांति कर सकती है। 
    
इस वर्ष का मजदूर दिवस इसी दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प लेने का दिन है। यह मजदूरों के खून से पैदा हुए लाल झण्डे को एक बार फिर पूरे उत्साह से आसमान में लहराने का दिन है।

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।