यौन उत्पीड़न के बहुचर्चित मामले में प्रज्वल रेवन्ना को 1 अगस्त को विशेष अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई है। कुछ समय पहले तक ‘‘माननीय’’ रहे अब कैदी संख्या में बदल गये हैं। जैसा कि मालूम ही है कि प्रज्वल रेवन्ना पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा का पोता है और जनता दल (सेक्यूलर) का नेता है और एक बार सांसद भी बना था। 2024 में जनता दल (सेक्यूलर) और भाजपा मिलकर कनार्टक में चुनाव लड़े थे।
2024 के चुनाव के समय ही प्रज्वल रेवन्ना की असलियत सामने आयी। पैन ड्राइव जिसमें महिलाओं के यौन उत्पीड़न और बलात्कार से जुड़े 2,976 वीडियो थे, सामने आयी। प्रज्वल रेवन्ना ने अपने पद और पावर का इस्तेमाल करते हुए सैकड़ों महिलाओं को अपना शिकार बनाया था। प्रज्वल ने इस घटना को राजनीतिक साजिश कहा तो पिता एच.डी.रेवन्ना और माता पर मुख्य शिकायतकर्ता के अपहरण का मामला चल रहा है। 8 मई 2024 को इन्हें इस मामले में फिलहाल जमानत मिल गई है।
वैसे यह मामला 2024 से नहीं बल्कि 2022 से ही चर्चा में रहा है। जून 2022 में प्रज्वल रेवन्ना इस मामले में कोर्ट से गैग आर्डर ले आये थे। (गैग आर्डर- एक कानूनी आदेश जिससे मीडिया या अन्य पक्षों को किसी मामले में रिपोर्ट करने प्रचारित-प्रसारित करने से कोर्ट रोकता है। उस मामले की गोपनीयता या न्यायिक प्रक्रिया के प्रभावित होने के नाम पर)।
कहा जाता है भाजपा को तो पहले से ही इसकी जानकारी थी। प्रदेश के नेताओं ने केंद्र के नेताओं को इसकी सूचना भी दी थी। इतने गंभीर आरोपों के बावजूद भाजपा मुंह में दही जमाकर बैठी रही इस लालच में कि वह कर्नाटक में अधिक सीट पा लेगी। यह मामला प्रज्वल रेवन्ना के साथ-साथ भाजपा के भी स्त्री विरोधी चरित्र को एक फिर से उजागर करता है।
प्रज्वल रेवन्ना का मामला दिखाता है कि हमारे देश में महिलाओं को न्याय मिलना, ना मिलना राजनीतिक उठापटक, जोड़-तोड़ का मामला बन कर रह गया है। प्रज्वल कई सालों से महिलाओं का यौन शोषण कर रहा था लेकिन सभी चीजें सत्ता और ताकत के दम पर दबी रहीं। कोई अकेली महिला इतने शक्तिशाली आदमी से टकराने का साहस कैसे करती। लेकिन ऐन चुनाव से पहले आरोप लगते हैं। प्रज्वल चुनाव हार जाता है और कांग्रेस चुनाव जीत जाती है।
भाजपा ने चुनावी फायदे के लिए अपनी आंखें मूंद लीं और कांग्रेस को तो इस मामले से चुनावी लाभ मिला ही। इस घटिया राजनीति के दौर में कहा जा सकता है कि यदि सत्ता समीकरण कुछ और होते तो शायद फैसला कुछ और भी हो सकता था। केन्द्र में तो भाजपा थी ही यदि राज्य में भी भाजपा होती तो हो सकता है पीड़ित प्रताडित होते और ‘‘माननीय’’ और भी ‘‘माननीय“ हो जाते। ब्रजभूषण का उदाहरण हमारे सामने है।
एक पहलू और है जिसे भी पूरी गंभीरता से समझा जाना चाहिए। अपराधी को तो सजा मिली लेकिन पीडिता भी एक अन्य तरीके से सजा भुगत रही है। बीबीसी की पड़ताल से यह सामने आया कि रेवन्ना की पेन ड्राइव में जिन महिलाओं के वीडियो हैं, जिन महिलाओं को इस हैवान ने शिकार बनाया कि, वे महिलाएं भी तरह-तरह से प्रताड़ना झेल रही हैं। वीडियो के समाज में प्रसारित होने के कारण इन महिलाओं को गांव, समाज, परिवार में अपमान झेलना पड़ रहा है। कई महिलाओं को गांव छोडकर किसी अनजान जगह पर बसना पड़ा है।
समाज में पसरी पुरुष प्रधानता की सोच अपराधों के लिए महिलाओं पर ही दोषारोपण करती है। इस घटना में भी यही हो रहा है। ‘‘माननीय’’ के जेल जाने के बावजूद भी महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान, आजादी, बराबरी के सवाल बचे हैं। इनके लिए सामूहिक संघर्ष की आवश्यकता बनी हुई है।