पिछले दिनों महाराष्ट्र सरकार के शिक्षा विभाग ने स्कूलों में कक्षा एक से पाठ्यक्रम में तीसरी भाषा के रूप में हिंदी लागू करने का फैसला लिया। अभी तक राज्य में मराठी और अंग्रेजी ही पहली कक्षा से पढ़ाई जाती है। जैसे ही यह फैसला सामने आया, महाराष्ट्र में भाषा के मुद्दे पर बहस शुरू हो गई। राजनीतिक उठा-पटक शुरू हो गई। यह सब महाराष्ट्र में गैर मराठी भाषी लोगों पर हिंसक हमलों तक जा पहुंचा। मणिपुर के बाद महाराष्ट्र शासकों की लगायी आग में सुलगने लगा।
भारत के कई राज्यों में जिनमें दक्षिण के राज्य भी शामिल हैं, हिंदी भाषा थोपने को लेकर हमेशा विरोध होता रहा है। ऐसे ही जब महाराष्ट्र में हिंदी भाषा को पाठ्यक्रमों में थोपने की कोशिश की गई तो इसका विरोध होना भी स्वाभाविक था। पर सरकार के इस कदम ने मराठी अस्मिता की राजनीति करने वाली शिवसेना व महाराष्ट्र नव निर्माण सेना को गैर मराठी भाषी लोगों पर हमला बोलने व इस तरह भाषा के नाम पर साम्प्रदायिक विभाजन पैदा करने का मौका दे दिया।
केंद्र सरकार जो नई शिक्षा नीति लेकर आई है उसमें ‘त्रिभाषा सूत्र’ यानी पहली कक्षा से ही तीन भाषाएं पढ़ाने का प्रावधान है जिसका शिक्षा के कई विशेषज्ञों ने विरोध किया है। उनके अनुसार पहली कक्षा के बच्चों को जबरन तीन भाषा पढ़ाना उचित नहीं है। विपक्षी दल शिवसेना या महाराष्ट्र नव निर्माण सेना जैसी क्षेत्रीय पार्टियां हमेशा से इसका विरोध करती रही हैं। उनका आरोप रहा है कि हिंदी की आड़ में स्थानीय लोगों के खिलाफ राजनीति हो रही है। देखते ही देखते इस मुद्दे ने महाराष्ट्र में एक आंदोलन का रूप ले लिया और यह गैर मराठी मजदूर-मेहनतकशों पर हमलों तक जा पहुंचा।
इसके बाद राज्य सरकार ने एक कदम पीछे खींचते हुए कहा कि हिंदी विषय का अनिवार्य होना रद्द कर दिया गया है। अगर कुछ छात्र तीसरी भाषा चुनना चाहते हैं, तो चुन सकते हैं। लेकिन ये बात दीगर है कि काश कक्षा एक का छात्र अपने विषय चुन सकता? खैर! इससे भी विरोध पर कोई असर नहीं पड़ा और सरकार को यह फैसला वापस लेना पड़ा और इसके लिए कमेटी बनाने का ऐलान किया।
मगर मामला शांत नहीं हुआ। लंबे समय से महाराष्ट्र में चलने वाली भाषा की राजनीति का असर पाठ्यक्रमों और कालेज कैंपसों से निकलकर सड़कों पर भी आ गया। अब महाराष्ट्र में मराठी के अलावा दूसरी भाषा बोलने वालों पर हमले होने लगे। इस तरह हिंदी थोपने के खिलाफ पैदा हुआ सही आक्रोश मराठी अस्मिता की गलत राजनीति का शिकार हो गया और यह बंबई व अन्य शहरों में उत्तर भारतीयों व गैर मराठी-मेहनतकशों पर हमलों तक पहुंच गया।
इस पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने मामले को शांत करने के बजाय और हवा देने का काम किया। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में मराठी भाषा का अभिमान रखना कोई गलत बात नहीं है। लेकिन भाषा के चलते अगर कोई गुंडागर्दी करेगा तो उसे सहा नहीं जाएगा। पुलिस ने कार्रवाई की है और अगर आगे भी ऐसा हुआ तो आगे भी कार्रवाई होगी। उन्हें भी मराठी का अभिमान है मगर देश की किसी भी अन्य भाषा के साथ अन्याय नहीं किया जा सकता।
इस तरह महाराष्ट्र सरकार ने पाठ्यक्रमों में छात्रों पर हिंदी थोपने के विरोध के मुद्दे को मराठी बनाम अन्य भाषा बना दिया। हिन्दी भाषा जबरन थोपने के विरोध का मुद्दा, ऐसी घटनाओं से गैर-जरूरी राजनीति में बदल गया।
असल में एक देश, एक भाषा की वकालत करने वाले संघी-भाजपाई इतिहास से सबक लेना भूल जाते है। वे पूरे देश में हिन्दी थोपने के लिए अपनी शिक्षा नीति में इस फार्मूले को फिर से लेकर आ गये। दक्षिण भारत के राज्य पहले से इसका विरोध करते रहे हैं। तमिलनाडु राज्य त्रिभाषा फार्मूले का पहले से ही विरोध कर रहा है।
भाजपा सरकार पूरे देश में विभाजनकारी नीति पर चल रही है। उत्तर भारत में वह हिन्दू-मुस्लिम विभाजन को बढ़ावा दे रही है और दक्षिण भारत में जबरन हिन्दी थोप भाषा के आधार पर साम्प्रदायिक विभाजन पैदा कर रही है। हिन्दू फासीवादियों को पता है कि दक्षिण भारत के लोग हिन्दी थोपे जाने को बर्दाश्त नहीं करेंगे पर हिंदी भाषा थोपने के जरिये वे अपने ‘एक देश, एक भाषा, एक संस्कृति’ के नारे को जबरन परवान चढ़ाना चाहते हैं।
देश की भाषाई विविधता का ख्याल किये बिना थोपे गये इस निर्णय से मराठी अस्मिता की राजनीति करने वाले प्रतिक्रियावादी संगठनों को मनचाही मुराद मिल गयी है। और वे महाराष्ट्र को हिंसक आग में झोंकने पर उतारू हो गये। महाराष्ट्र में गैर मराठी लोगों पर पहले भी ऐसे हमले होते रहे हैं। मराठी अस्मिता की राजनीति करने वाले संगठन बंबई में उत्तर भारतीयों व अन्य गैर मराठी भाषी लोगों की बढ़ती संख्या को स्थानीय लोगों की दुर्दशा का कारण बता कर आम जनता को बांटने का व लड़ाने का काम करते रहे हैं। ऐसे में मोदी सरकार के त्रिभाषा फार्मूले ने एक बार फिर महाराष्ट्र को भाषा के आधार पर सांप्रदायिक आग तक पहुंचा दिया है।
भारत कहने को ही संघात्मक राज्य है। भाजपा सरकार पूरे देश पर हिन्दी थोपने पर उतारू है। त्रिभाषा फार्मूला भी पूरे देश को शिक्षा के मामले में एक नीति से हांकने का प्रयास है जिसका दक्षिण भारत के राज्य विरोध कर रहे हैं। शिक्षा के मसले पर जबरन राज्यों पर हिन्दी थोपना कहीं से भी उचित नहीं है। यह संघी सरकार के फासीवादी इरादों को ही दिखलाता है। संघी सरकार के नापाक इरादों के साथ-साथ मराठी अस्मिता की राजनीति करने वाले और गैर मराठी मेहनतकशों पर बोले जा रहे हमलों का विरोध जारी है।