प्रवर्तन निदेशालय निदेशक के गैर कानूनी सेवा विस्तार पर रोक

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के निदेशक संजय कुमार मिश्रा के सेवा विस्तार पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी। 11 जुलाई को दिए अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने संजय मिश्रा के कार्यकाल को 31 जुलाई 2023 को समाप्त करने का आदेश दिया है।
    
संजय कुमार मिश्रा 1984 बैच के आईआरएस (भारतीय राजस्व सेवा) अधिकारी थे। जिन्हें 19 नवम्बर 2018 को दो साल के लिए ईडी का निदेशक नियुक्त किया गया था। 13 नवम्बर 2020 को केन्द्र सरकार ने एक आदेश के जरिये इनकी नियुक्ति को पूर्व प्रभाव से संशोधित किया और कार्यकाल को 2 साल से बढ़ाकर 3 साल कर दिया। इसके बाद क्रमशः 17 नवम्बर 2021 और 17 नवम्बर 2022 को इसे पुनः एक-एक साल के लिए बढ़ा दिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से संजय कुमार मिश्रा को नवम्बर के बजाय जुलाई अंत में ही सेवानिवृत्त होना होगा।
    
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को कांग्रेस ने केन्द्र सरकार के ‘मुंह पर तमाचा’ कहा है। अब कुछ पार्टियां 17 नवम्बर 2022 के बाद ईडी द्वारा की गयी सभी कार्यवाहियों की स्वतंत्र जांच की मांग कर रही हैं। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियों में खुशी है।
    
पिछले समयों में ईडी व सीबीआई ऐसी एजेंसी साबित हो चुकी थीं जो केन्द्र सरकार के इशारों पर ही कार्यवाही करने या न करने का जरिया बन गयी थीं। हालांकि औपचारिक तौर पर केन्द्र सरकार से ये संस्थायें स्वतंत्र हैं। लेकिन चुनाव से पूर्व या भाजपा के चुनाव हारने के बाद ईडी, सीबीआई विपक्षी पार्टियों पर कार्यवाही करती रहती हैं। अजित पवार से लेकर मायावती तक कई ऐसे नेता हैं, जिन्हें मोदी सरकार ईडी और सीबीआई से ‘सबक’ सिखा चुकी है। यही कारण है कि लगभग सभी विपक्षी पार्टियां ईडी और सीबीआई से ‘आतंकित’ हैं।
    
‘आतंक’ और ‘सबक’ के लिए ईडी, सीबीआई या अन्य जांच एजेंसियों का उपयोग कोई नया नहीं है। पूर्व की सरकारें भी इसे करती रही हैं। आज सत्ता में बैठे फासीवादियों ने इसे उस स्तर पर पहुंचा दिया है जहां ये संस्थायें हर खास-ओ-आम की जुबान पर हैं। बल्कि ये किस सीजन में सक्रिय होती हैं यह तक सब जानते हैं।
    
ईडी, सीबीआई जैसी जांच एजेंसियों के जरिये जहां मोदी सरकार विपक्षी पार्टियों व उनके नेताओं को भ्रष्ट साबित करती रहती हैं। विपक्षी पार्टियां तो बदनाम बनी ही रहती हैं पर विपक्षी नेता यदि भाजपा में शामिल हो जाते हैं तो वे भ्रष्टाचार के आरोपों से साफ हो जाते हैं। यह मजाक ही चल पड़ा है कि राजनीति में भाजपा ऐसी पार्टी हो गयी है जहां जाकर सबसे भ्रष्ट नेता के भी दाग साफ हो जाते हैं। वाशिंग पाउडर ‘भाजपा’।
    
यहां यह साफ समझ लेना चाहिए कि ईडी, सीबीआई के आरोपों या कार्यवाहियों में सरकार के हस्तक्षेप के बावजूद यह सच है कि भ्रष्टाचार सभी पार्टियों में व्याप्त है। इस आधार पर आज यह भी सच है कि सबसे अधिक भ्रष्टाचारी भाजपा सरकार में ही हैं। चाहे वे भाजपा की राज्य सरकारें हों या केन्द्र की मोदी सरकार। यानी यह कहा जा सकता है कि हमाम में सब नंगे हैं, बस सबसे ज्यादा भाजपा में हैं।
    
दूसरी बात ये है कि केन्द्रीय जांच एजेंसियों के प्रमुखों की नियुक्ति केन्द्र सरकार ही करती है। यदि एक संजय कुमार मिश्रा नहीं तो केन्द्र सरकार दूसरा कोई नियुक्त कर लेगी। अफसरशाही में भी भ्रष्टाचार कोई कम नहीं है। या ईमानदार लोगों के लिए व्यवस्था में जगह नहीं है। 
    
मेहनत की लूट पर टिकी इस पूंजीवादी व्यवस्था में ईमानदारी जैसे सद्गुण के लिए कोई जगह नहीं है। आज तो व्यवस्था मेहनत की लूट को फासीवादी तानाशाही के दम पर जारी रखने की ओर बढ़ रही है। ऐसे में विपक्षी पार्टियों को इस फैसले से जो खुशी हो सो हो, मेहनतकशों की खुशी इस व्यवस्था के खात्मे में ही है। 

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