शरणार्थियों के नाम पर अंधराष्ट्रवादी राजनीति

दुनिया भर में शासक वर्ग अमानवीय होकर अपने-अपने देश में शरणार्थियों के मुद्दे को उठाए हुए है। शासक वर्ग अपने घृणित राजनीतिक लाभ के लिए शरणार्थियों के नाम पर राजनीति करने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। ये आम जनता के बीच शरणार्थियों को अपराधी के तौर पर प्रचारित कर रहे हैं। शासक वर्ग ने शरणार्थियों के खिलाफ इतनी नफ़रत पैदा कर दी है कि दक्षिणपंथी मानसिकता रखने वाले लोग इन पर हमले तक बोल रहे हैं। शासक वर्ग शरणार्थियों को अवैध और अपराधी कहकर दमन-उत्पीड़न कर रहे हैं।
    
भारत का शासक वर्ग भी रोहिंग्या मुसलमान और पक्षिम बंगाल के मुसलमानों को बांग्लादेशी कहकर धरपकड़ कर परेशान कर रहा है। जबकि रोहिंग्याओं पर कोई अपराधिक मामले दर्ज नहीं हैं। फिर भी समाज में इन शरणार्थियों को अपराधी व अवैध कहकर रोज ब रोज मानसिक और आर्थिक रूप से परेशान किया जा रहा है। किसी भी देश के लोग पड़ोसी मुल्कों में शरण लेने मजबूरी में ही जाते हैं। जब उस देश की सरकार, धर्म, नस्ल विशेष के लोगों पर आर्थिक, राजनीतिक सामाजिक, धार्मिक हमले करती है तो उस स्थिति में ये उत्पीड़ित लोग अपने आपको बचाने के लिए दूसरे मुल्कों में शरण लेने को मजबूर होते हैं।
    
अब सताए हुए लोगों की मदद करने की जगह ज्यादातर मुल्कों ने अपनी सोच और नीति बदलनी शुरू कर दी है। अब इन्होंने अपने-अपने देशों की सीमाओं पर कड़े पहरे व प्रतिबंध लगा दिए हैं। अब इन देशों के शासक वर्गों ने अपने आप को साम्प्रदायिक, अंधराष्ट्रवादी, नस्लीय लबादे में लपेट लिया है। और उसी के अनुरूप शरणार्थियों/प्रवासी मजदूरों के साथ व्यवहार कर रहे हैं। शरणार्थियों के साथ दोनों प्रकार के देशों ने, शरण देने वालों ने भी और अपने देश से उत्पीड़न करके निकालने वालों ने भी बहुत ही अमानवीय व्यवहार किया है। और यह सिलसिला अभी जारी है।        
    
जबकि दुनिया की अर्थव्यवस्था में इन शरणार्थियों/प्रवासी मजदूरों का एक बड़ा योगदान है। कई देशों की सरकारें अपने देश के लोगों के सामने राष्ट्रवादी होने का दिखावा करती हैं। लेकिन इन शरणार्थियों/प्रवासी मजदूरों को देश से निकालना  भी नहीं चाहतीं। क्योंकि ये सरकारें जानती हैं कि प्रवासी मजदूर सस्ता और मजबूर होता है। ये मजदूर पूंजीवादी व्यवस्था में जो काम सबसे ज्यादा निकृष्ट समझा जाता है, इसको भी करने को मजबूर होते हैं। भारत में ही रोहिंग्या या ऐसे ही मजदूर साफ-सफाई और कूड़ा बीनने का काम करते दिखाई दे जाते हैं। बड़ी इमारतों को बनाने में भी इनके श्रम की भूमिका बनी हुई है। सरकारें सिर्फ ऐसे मजदूरों के खिलाफ अपने देश की जनता के दिलों में नफरत व खौफ पैदा करना चाहती है। इनको ऐसा करने से अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने का मौका भी मिल जाता है। हिन्दू फासीवादी भाजपा सरकार ने अपने 12 वर्षों के कार्यकाल से शरणार्थियों के मुद्दे को खासकर रोहिंग्या मुसलमानों को अपनी राजनीति का निशाना बनाया हुआ है। भाजपा को रोहिंग्या मुसलमानों का मुद्दा भी राजनीतिक लाभ पहुंचाता रहा है। ऐसे में ये संघी सरकार किसी भी कीमत पर इस मुद्दे को नहीं छोड़ेगी। और दुनिया के दूसरे देशों के बारे में भी यही सही है। ऐसे में आम मेहनतकश जनता को शासक वर्ग के ऐसे घृणित और अमानवीय तरीकों व नीतियों का विरोध करना चाहिए।

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