ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान, 2019 में पहली बार ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा व्यक्त की थी। यह द्वीप 300 वर्षों से डेनमार्क का हिस्सा रहा है, और डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। 2024 में, अमेरिकी रक्षा विभाग ने अपनी आर्कटिक रणनीति जारी की, जिसमें इस क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर ‘‘पीपुल्स रिपब्लिक आफ चाइना की बढ़ती चुनौती’’ का हिस्सा बताया गया और ‘‘निगरानी और प्रतिक्रिया’’ का दृष्टिकोण अपनाया गया। जून 2025 में, ट्रंप ने ग्रीनलैंड की जिम्मेदारी अमेरिकी यूरोपीय कमान से उत्तरी कमान को सौंप दी और इसे आंतरिक रक्षा में एकीकृत कर दिया।
ग्रीनलैंड का भू-राजनीतिक मुद्दा बनना जलवायु परिवर्तन का सीधा परिणाम है। आर्कटिक की बर्फ की चादर लगातार पिघल रही है और अनुमान है कि अगले दशक में इसकी सारी ग्रीष्मकालीन बर्फ पिघल जाएगी, जबकि शीतकालीन बर्फ पतली होती जाएगी। इससे आर्कटिक सागरों में नौगम्यता बढ़ेगी, जिससे भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक तनाव और तीव्र होगा। ग्रीनलैंड स्वयं अपनी बर्फ की चादर के टूटने से लगभग 280 अरब टन बर्फ खो रहा है।
बर्फ के पतले होने से आर्कटिक के मध्य से होकर गुजरने वाले दूसरे ट्रांसपोलर मार्ग और कनाडा के तट से सटकर लगभग 36,000 द्वीपों के बीच से होकर गुजरने वाले तीसरे मार्ग, नार्थवेस्ट पैसेज, की संभावना खुल गई है। ये मार्ग मौजूदा मार्गों की तुलना में जहाजरानी की दूरी और समय को 50 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं। समुद्री बर्फ के वार्षिक वितरण के अनिश्चित होने के कारण नार्थवेस्ट पैसेज अभी भी भरोसेमंद नहीं है, हालांकि इसके सात वैकल्पिक मार्ग हैं, जिनमें से कुछ में जहाज के आकार पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
ट्रांसपोलर रूट अभी तक खुला नहीं है और काफी हद तक बर्फ से अवरुद्ध है; यहां तक कि जब यह खुलेगा, तब भी जहाजों को सुरक्षित रूप से ले जाने के लिए आइसब्रेकर जहाजों की आवश्यकता होगी। फिर भी, यह 50 वर्षों के भीतर वास्तविकता बन सकता है, जिससे आर्कटिक के माध्यम से सबसे छोटा मार्ग उपलब्ध हो जाएगा।
1996 में, आठ देशों- कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नार्वे, रूस, स्वीडन और संयुक्त राज्य अमेरिका- ने आर्कटिक परिषद की स्थापना की, जो नार्वे में सचिवालय के साथ एक अंतर-सरकारी मंच है, जिसका उद्देश्य आर्कटिक राज्यों के बीच सहयोग, समन्वय और अंतःक्रिया को बढ़ावा देना है। भारत, चीन और जर्मनी सहित अड़तीस गैर-आर्कटिक राज्यों को पर्यवेक्षक का दर्जा प्राप्त है। फिर भी, हाल के विवादों में, परिषद के बारे में या उसके द्वारा बहुत कम बात की गई है।
उत्तरी ध्रुव पर केंद्रित ग्लोब को देखने पर ही आपको इस क्षेत्र का रणनीतिक महत्व पूरी तरह समझ में आता है। कनाडा और रूस दो तरफ से आर्कटिक को घेरे हुए हैं, उनके बगल में नार्वे स्थित है; इनके बीच में आइसलैंड और ग्रीनलैंड स्थित हैं। मिसाइल युग और शीत युद्ध के बाद से, इसे एक-दूसरे पर निशाना साधने वाली रूसी और अमेरिकी मिसाइलों के लिए सबसे छोटा मार्ग माना जाता रहा है। इसी कारण कनाडा ने अमेरिकी क्म्ॅ प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की मेजबानी की थी। यही वजह है कि ट्रंप ग्रीनलैंड को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं।
एक काल्पनिक युद्ध की स्थिति में, रूस, चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच चलने वाली मिसाइलों के मार्ग में ग्रीनलैंड ठीक बीच में स्थित होगा। ट्रम्प का तर्क है कि ग्रीनलैंड उनकी प्रस्तावित ‘‘गोल्डन डोम’’ मिसाइल रक्षा योजना के लिए महत्वपूर्ण होगा, जिसके बारे में उनका दावा है कि यह 2029 तक चालू हो जाएगी।
ग्रीनलैंड में तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार होने का अनुमान है, हालांकि अभी तक इसका व्यावसायिक दोहन शुरू नहीं हुआ है। इसमें ग्रेफाइट, टेरबियम, नियोडिमियम, डिस्प्रोसियम, नायोबियम और टाइटेनियम के भी महत्वपूर्ण भंडार मौजूद हैं। ध्रुवीय रेशम मार्ग, चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का आर्कटिक क्षेत्र तक विस्तार है, जिसका उद्देश्य नए समुद्री मार्गों और रणनीतिक खनिजों तक पहुंच विकसित करना है। अपनी भौगोलिक स्थिति को देखते हुए, चीन आर्कटिक के माध्यम से एशिया और यूरोप के बीच छोटे मार्गों से प्रमुख रूप से लाभान्वित होगा, जो यूरेशिया में व्यवधानों से बचाव के लिए कई भूमि और समुद्री गलियारे बनाने की बीआरआई की रणनीति के अनुरूप है।
चीन की ट्रांसपोलर पहल की घोषणा 2018 में चीन के पहले आर्कटिक नीति श्वेत पत्र में की गई थी, जिसमें बीजिंग ने खुद को ‘‘निकट-आर्कटिक राज्य’’ बताया था और कहा था कि इस क्षेत्र के विकास में उसकी रुचि है। चीन का सबसे उत्तरी बिंदु आर्कटिक वृत्त से लगभग 1,400 किलोमीटर दूर स्थित है। बीजिंग ने रूस के सबेटा में यामल एलएनजी संयंत्र में निवेश किया है; 2004 में स्वालबार्ड में पीली नदी अनुसंधान केंद्र की स्थापना की है; और आर्कटिक की स्थितियों का अध्ययन करने के लिए पांच हिमभंजक पोत तैनात किए हैं।
अमेरिकी रक्षा विभाग का कहना है कि चीन आर्कटिक राज्य नहीं है और उसे ‘‘क्षेत्र में अमेरिकी हितों के लिए मुख्य चुनौती’’ मानता है। हालांकि, बीजिंग के दृष्टिकोण से, लक्ष्य आर्कटिक क्षेत्र पर संप्रभुता हासिल करना नहीं, बल्कि रणनीतिक पहुंच प्राप्त करना है। अपने प्रयासों के बावजूद, चीन अब तक ग्रीनलैंड में अपनी पकड़ स्थापित करने में विफल रहा है।
दावोस सम्मेलन में मचे बवाल के शांत होने के साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच एक गंभीर दरार पैदा हो गई है। जनवरी के मध्य में, जब ट्रम्प की धमकियां तेज हो गईं, तो फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन और डेनमार्क सहित कई यूरोपीय नाटो देशों ने द्वीप की रक्षा के लिए अपनी तत्परता प्रदर्शित करने के लिए एक संयुक्त अभ्यास हेतु सैन्यकर्मियों को भेजा। इससे ट्रम्प और भी क्रोधित हो गए और उन्होंने भाग लेने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की घोषणा की, जिसे बाद में उन्होंने वापस ले लिया।
संदेश स्पष्ट हैः यह यूरोप-अमेरिका गठबंधन के टूटने का मात्र पहला चरण हो सकता है। यूरोप को अब अपनी आत्मरक्षा क्षमता को मजबूत करने के लिए तेजी से कदम उठाने होंगे। यही उसकी दुविधा का मूल है। उसकी सबसे बड़ी कमजोरियां सैन्य एकीकरण की कमी और रूस के साथ युद्ध में यूक्रेन का समर्थन करने का वित्तीय बोझ हैं।