बीते दिनों संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 61वें सत्र में संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत फ्रांसेस्का अल्बानीज ने गाजा नरसंहार में भारत की भूमिका बताने वाली रिपोर्ट पेश की। ‘यातना और नरसंहार’ नामक इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत सहित कई देश हथियारों व अन्य प्रकार की सहायता देकर इजरायल की यातना व्यवस्था को बढ़ावा दे रहे हैं। कि गाजा में चल रहे युद्ध के दौरान भी भारतीय कंपनियों ने इजरायल को ड्रोन व अन्य सैन्य उपकरणों का निर्यात जारी रखा हुआ था। रिपोर्ट में कहा गया है कि इजरायल पर युद्ध अपराधों व अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानूनों के उल्लंघन के गंभीर आरोपों की पृष्ठभूमि में भारत का उससे सैन्य व रणनीतिक जुड़ाव निश्चित रूप से अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत कानूनी व नैतिक जिम्मेदारी का उल्लंघन करता है।
संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट पर भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की चुप्पी दिखाती है कि भारत की संघी सरकार जानबूझकर नरसंहार के दोषी इजरायल के साथ न केवल मित्रता निभाती रही है बल्कि उसके कुकर्मों में मदद भी करती रही है। इसी के साथ भारत की टाटा-अडाणी सरीखी कम्पनियां इजरायल को सैन्य सामग्री व अन्य चीजों का निर्यात करती रही हैं।
इन गंभीर आरोपों की पुष्टि भारत के प्रधानमंत्री मोदी की नेतन्याहू से मित्रता की खबरें भी करती हैं। अभी ईरान युद्ध से दो दिन पूर्व मोदी इजरायल के दौरे पर भी थे। इजरायल की तर्ज पर भारत में मुसलमानों का दमन भी दोनों देशों के शासकों की सांठ-गांठ को दिखाता है।
इन आरोपों का अर्थ है कि गाजा के नरसंहार में मारे गये बच्चों-महिलाओं, निर्दोष नागरिकों की हत्याओं में भारतीय शासकों-भारतीय पूंजीपतियों की भी भूमिका है। लाखों फिलिस्तीनियों के खून के धब्बे मोदी-शाह से लेकर टाटा-अडाणी के चेहरों पर भी लगे हुए हैं। इजरायल-अमेरिका की तरह भारतीय शासक भी निर्दोष फिलिस्तीनी जनता के खून के, दमन के दोषी हैं।
रिपोर्ट के ये खुलासे नये नहीं हैं। पहले भी भारतीय शासकों की इजरायल से बढ़ती मित्रता पर सवाल उठते रहे हैं। पर पहली बार अंतर्राष्ट्रीय मंच से भारत को अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करने वाला बताया गया। मोदी-शाह के शासन ने भारत के माथे पर वह बदनुमा दाग लगा दिया है जो लम्बे वक्त तक कायम रहेगा।
इस बदनुमा दाग के साथ ही भारत ने फिलिस्तीनी मुक्ति के समर्थक होने की अपनी अतीत की अवस्थिति को पूरी तरह त्याग दिया है। वैसे 90 के दशक से ही भारतीय शासक इस अवस्थिति से दूर होते गये थे पर घोर अमेरिकापरस्त संघ-भाजपा के सत्ता में आने के बाद सारी शर्मो-हया ताक पर रख दी गयी। मोदी-शाह ने तो न केवल फिलिस्तीनी जनता के कत्लेआम में मददगार भूमिका अपना ली बल्कि इजरायल से सीख भारत में मुसलमानों के कत्लेआम का वे मंसूबा पालने लगे।
भारतीय शासकों की इस कारगुजारी में भारत की एकाधिकारी पूंजी भी पूरी तरह इजरायल के साथ खड़ी है। दरअसल हथियार-ड्रोन आदि तो भारतीय कम्पनियां ही सप्लाई कर रही हैं। ऐसे में मासूम फिलिस्तीनी बच्चों के खून से भारतीय पूंजीपतियों के हाथ भी रंगे हैं।
यूरोप के बहादुर मजदूरों ने जगह-जगह अपने बंदरगाहों को जाम कर, जहाजों को रोक इजरायल को हथियार सप्लाई रोकने का काम किया था। ऐसे में भारत की जनता को भी इनसे सीखने की जरूरत है।
भारत की मजदूर-मेहनतकश जनता को यह ऐलान करने की जरूरत है कि भारत के हत्यारे शासकों की इन कारगुजारियों में भारतीय जनता शामिल नहीं है। कि भारतीय जनता फिलिस्तीनी अवाम के साथ खड़ी है और फिलिस्तीनी नरसंहार का बदला अपने फासीवादी शासकों से जरूर लेगी।