बीते दिनों देश के दो अलग-अलग हिस्सों में जातीय उत्पीड़न की दो घटनायें घटीं। पहली घटना उ.प्र. के इटावा की है यहां दो यादव जाति के कथावाचकों की जाति पता चलने पर सवर्णों के एक समूह ने उनकी पिटाई व मुंडन कर दिया साथ ही एक सवर्ण महिला ने उन पर अपना मूत्र छिड़क दिया। इस घटना का वीडियो भी वायरल कर दिया गया। दूसरी घटना में गंजम (उड़ीसा) में दो दलित जाति के लोग अपनी कन्या के विवाह में भेंट देने हेतु दो गायें व एक बछड़ा लेकर जा रहे थे कि गौरक्षकों के एक समूह ने उन पर हमला बोल दिया। दोनों दलित व्यक्तियों की पिटाई के बाद उनको घुटनों के बल चलने को मजबूर किया गया, घास खाने व नाले का पानी पीने को मजबूर किया गया।
इटावा की घटना का वीडियो वायरल होते ही एक यादवों के समूह ने सवर्णों के टोले पर हमला कर दिया और कई गाड़ियों में आग लगा दी। पुलिस को उन्हें शांत करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी।
गौरतलब है कि उ.प्र. व उड़ीसा दोनां जगहों पर भाजपा सत्ता में है और उसके शासन तले गौरक्षकों की मण्डलियां कुकुकमुत्तों की तरह उग आयी हैं। साथ ही सवर्ण जाति के वर्चस्वशाली लोग खुद को फिर से श्रेष्ठ मानने लगे हैं। शासन-प्रशासन उनके पक्ष में खड़ा रहता है। इसके चलते मुसलमानों के साथ-साथ दलितों-पिछड़ों पर भी ये जब तब हमले बोलते रहते हैं। जातीय उत्पीड़न की घटनायें लगातार बढ़ती पर हैं।
उ.प्र. के एक मंत्री ओमप्रकाश राजभर जो खुद दबी कुचली जाति से आते हैं ने इस घटना पर बयान दिया कि पूजा पाठ-कथा वाचन ब्राह्मणों का काम है और भैंस पालना, दूध दुहना यादवों का काम है। अगर यादव ब्राह्मणों का काम करने लगेंगे तो ब्राह्मण आक्रोशित होंगे ही। ओमप्रकाश राजभर का बयान दिखाता है कि वे समाज को 1000 वर्ष पूर्व मनुस्मृति के काल में ले जाना चाहते हैं।
दरअसल संघ-भाजपा सामंती ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म के अनुरूप देश को फासीवादी हिन्दू राष्ट्र में बदलना चाहती है। इस हिन्दू राष्ट्र में जाति आधारित पेशा और जातीय वर्चस्व वो फिर से स्थापित करना चाहती है। पर चुनावी गणित उन्हें मजबूर करता रहा है कि वो पिछड़ों-दलितों को भी अपने साथ लामबंद करें। इसीलिए वे हिन्दू एकता के नाम पर पिछड़ों-दलितों को भी एकजुट करने में लगी हैं पर इनकी सवर्ण ब्राह्मणवादी वर्चस्व वाली आत्मा जरा भी नहीं बदली है और समय-समय पर इनके लम्पट कारकून दलितों-पिछड़ों पर हमला बोलते रहे हैं।
उ.प्र. में पिछड़ों में यादव सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक तौर पर काफी प्रभावशाली स्थिति में पहुंच गये हैं। ऐसे में उनके साथ जातीय उत्पीड़न की किसी घटना पर उनकी ओर से तीखी प्रतिक्रिया दर्ज होती रही है। मौजूदा घटनाक्रम ने भी दिखाया कि सवर्णों की हरकत का तत्काल हिंसक प्रतिरोध हुआ। ये दीगर बात है कि प्रतिरोध करने वाले समूह का अगुआ खुद भाजपा का ही आदमी बताया जा रहा है। कई दफा तो वर्चस्वशाली पिछड़ी जाति के लोग ही दलितों का उत्पीड़न करते पाये जाते रहे हैं।
संघ-भाजपा के शासन में जातीय उत्पीड़न की बढ़ती घटनायें और उनके प्रतिरोध में उठती आवाजें आज के भारतीय समाज के यथार्थ को पेश करती हैं। आज वास्तविकता यही है कि समय के साथ हर दबी कुचली जाति अपने उत्पीड़न के प्रति सचेत होती गयी है और प्रतिरोध में आवाज उठाने लगी है। जातीय उत्पीड़न से मुक्ति की चेतना समाज में बढ़ती गयी है। ऐसे में संघ-भाजपा शासन में सवर्णों के बढ़ते हमले इतिहास की दिशा को पलटने की कोशिश हैं। संघी हिन्दू राष्ट्र की चाहत भी समाज को पीछे ले जाना चाहती है। अपनी इस कोशिश में जतीय वर्चस्व को फिर से स्थापित करने के इनके प्रयास असफल होने को अभिशप्त हैं। इतिहास की पीछे ले जाने के मामले में भी ये मुंह की ही खायेंगे। जातीय उत्पीड़न के जिस राक्षस को संघी हुक्मरान पाल पोस रहे हैं उसे मोटा ताजा बनाने का स्वप्न पाल रहे हैं, उस राक्षस को उत्पीड़ित लोगों द्वारा खाक में मिलाया जाना तय है।