उत्तराखण्ड के 25 साल : पूंजीपति मालामाल - मेहनतकश जनता कंगाल

उत्तराखण्ड को बने 25 साल हो गये। मोदी और धामी ने इस मौके को ऐसे रूप में पेश करने की कोशिश की मानो गंगा फिर से धरती पर अवतरित हो गयी हो। उत्तराखण्ड को बने 25 साल हो गये तो क्या हो गया। किसी राज्य को बने 65 साल (गुजरात 1960) तो किसी को 69 साल (कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश) तो किसी-किसी को तो उससे भी ज्यादा (उ.प्र., पं.बंगाल, बिहार) साल हो गये हैं। अगर उम्र से ही किसी राज्य के नागरिकों की खुशहाली तय होती तो इन राज्यों में आम जनता खुशहाल हो जानी चाहिए थी। असल में मामला कुछ और है। 
    
यह जश्न उत्तराखण्ड की मेहनतकश जनता खासकर मजदूरों-किसानों की आंखों में धूल झोंकने की कवायद है। यह दिखलाने की कोशिश मोदी-धामी की सरकार कर रही है कि मानो उत्तराखण्ड में दूध की नदियां बह रही हों। मानो बेरोजगारी खत्म हो गयी हो। मानो मजदूर, किसान खुशी के गीत गा रहे हों। हकीकत इसके उलट है। 
    
9 नवम्बर को प्रदेश की राजधानी से लेकर जिला मुख्यालयों में सरकारी आयोजनों के अलावा शायद ही कहीं कोई जश्न का माहौल रहा हो। मोदी, धामी और उनके लगुए-भगुए भले ही जश्न मना रहे थे परन्तु इनके उलट मेहनतकश जनता अपने आप से सवाल पूछ रही थी कि अलग उत्तराखण्ड राज्य बनने से उन्हें क्या हासिल हुआ। न तो हर युवा को रोजगार मिला; न हर महिला को सुरक्षा मिली; न हर गांव को सड़क मिली। युवा बेरोजगार तो आये दिन सड़कों पर उतर रहे हैं। 
    
सरकारी दावे बहुत ऊंचे हैं। सरकार के दावे के अनुसार इन पच्चीस सालों में राज्य की अर्थव्यवस्था 24 गुना बढ़ी; प्रति व्यक्ति आय 17 गुना बढ़ी आदि आदि। सरकार का दावा जो कुछ भी हो। क्या उत्तराखण्ड में कोई मजदूर या किसान यह दावा कर सकता है कि पिछले 25 सालों में उसकी आय 17 गुना बढ़ी है। सालों-साल से मजदूरी जस की तस ही है। जो कुछ बढ़ी है अगर उसकी तुलना बढ़ती महंगाई से की जाए तो हकीकत सामने आ जायेगी। हकीकत यह है कि मजदूरी बढ़ने के बजाय घट गयी है। यही बात मेहनतकश किसानों की आय के मामले में सामने आ जायेगी। कुछ बड़े-बड़े भूस्वामियों या अति धनी किसानों को छोड़ दिया जाये तो किसानी बहुत बड़े घाटे का सौदा हो गयी है। बस किसी तरह से छोटे-मझौले किसान गुजर-बसर कर पा रहे हैं। वह भी हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद। 
    
जिनकी आय और सम्पत्ति बढ़ी है उनमें चंद उद्योगपति, व्यापारी, होटल कारोबारी हैं। इनके अलावा उत्तराखण्ड के विधायक, नेताओं अधिकारियों की दौलत खूब बढ़ी है। भ्रष्टाचार उत्तराखण्ड के हर विभाग की रग-रग में समाया हुआ है। भाजपा-संघ के जो नेता कभी पैदल या स्कूटर-मोटर साइकिल में घूमते थे वे अब अकूत सम्पत्ति के मालिक बन गये हैं। देहरादून, हरिद्वार, रुड़की, हल्द्वानी, रुद्रपुर में किसी भाजपा-संघ के नेता का व्यक्तिगत इतिहास उठा कर देख लिया जाये तो यही बात सामने आयेगी कि इनमें से अधिकांश करोड़पति-अरबपति हैं। कई संघ के पूर्व होल टाइमर आज करोड़ों की सम्पत्ति के मालिक हैं। उद्योगपति-नौकरशाह-भाजपा-संघ के नेताओं का एक ऐसा गठजोड़ कायम हो गया है जो येन-केन-प्रकारेण अपनी दौलत बढ़ाये जा रहा है। और किसी भी कीमत में सत्ता में रहना चाहता है। 
    
बीसवीं सदी के मध्य से ही अलग राज्य की मांग उठ रही थी। नब्बे के दशक में जाकर इसने लोकप्रिय मांग का रूप धारण कर व्यापक जनांदोलन की नींव रखी। इस आंदोलन के दौरान दर्जनों लोग मारे गये और हजारों गिरफ्तार हुए। 
    
अलग उत्तराखण्ड राज्य की मांग एक जायज मांग थी। एक जनवादी मांग थी। उत्तराखण्ड की मेहनतकश जनता इस मांग की पूर्ति के जरिये अपने जीवन में बेहतरी और बदलाव की आशा पाल रही थी। समय ने साबित किया कि अलग राज्य बन जाने से उन आर्थिक-सामाजिक मांगों का समाधान न तो होना था और न हुआ। न तो मजदूरों की आशा पूरी हुयी और न किसानों की। न औरतों को सामाजिक सुरक्षा मिली और न दलितों को सम्मान और बराबरी मिली। मुसलमान, ईसाई या भाषायी अल्पसंख्यक आये दिन उत्तराखण्ड में भाजपा-संघ के नेताओं या इनके गुण्डों के निशाने पर आते रहते हैं। महिलाओं के साथ हिंसा, बलात्कार, अपहरण, नाबालिग बच्चियों का गुम हो जाना पहले के मुकाबले बढ़ता ही गया है। पलायन की समस्या पूरे भारत की तरह पहाड़ों में विकराल रूप धारण करती गयी है। उत्तराखण्ड के विकास के नाम पर पहाड़ों में जो बांध, विद्युत जल परियोजनाएं, ‘ऑल वेदर रोड’ का अवैज्ञानिक व लालच से भरा निर्माण किया जा रहा है वह नई-नई प्राकृतिक आपदाओं की पृष्ठभूमि तैयार कर रहा है। 
    
क्योंकि जो उत्तराखण्ड की आम समस्यायें थीं वही भारत की आम समस्यायें हैं। शोषण, उत्पीड़न, दमन, हिंसा, बेरोजगारी, पलायन, अपराध, पर्यावरण विनाश भारत में कायम पूंजीवादी व्यवस्था का अनिवार्य तत्व व परिणाम है। अलग राज्य बन जाने से उत्तराखण्ड में कोई नयी व्यवस्था न तो कायम होनी थी और न हुयी। परिणामतः उत्तराखण्ड शेष भारत की तरह देशी-विदेशी पूंजीपतियों की चरागाह और ऐशगाह बन गया। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद व प्रति व्यक्ति आय में जो बढ़ोत्तरी है वह असल में उत्तराखण्ड में काम करने वाले पूंजीपतियों, व्यापारियों, कारोबारियों, नौकरशाहों राजनेताओं की आय में वृद्धि है। वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में उत्तराखण्ड में वही होना है जो पूंजीवादी भारत या विश्व में होता है। पूंजीपतियों की दौलत में दिन दूनी रात चौगुनी की वृद्धि होना और शेष आबादी का तेजी से कंगाल होते जाना। यही उत्तराखण्ड में हो रहा है। 
    
मजदूरों-किसानों का जो रास्ता, शेष भारत व विश्व में होगा वही उत्तराखण्ड में भी होगा। यानी पूंजीवाद का खात्मा और समाजवाद का निर्माण। पूंजीपतियों के स्थान पर मजदूर-किसानों का राज ही उनके जीवन में बुनियादी परिवर्तन व बेहतरी ला सकता है। 

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