लम्बे समय से ईरान के ऊपर हमले की तैयारी में लगे जियनवादी फासीवादी, इजरायली शासकों ने सभी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को धता बताते हुए 13 जून को उस पर भीषण हमला बोल दिया था। इस हमले में, पहले धूर्त अमेरिकी साम्राज्यवादी पीठ पीछे से समर्थन कर रहे थे। बाद में वे भी हमले में खुले आम शामिल हो गये। ईरान की सम्प्रभुता का सीधा उल्लंघन करते हुए इजरायल ने षड्यंत्रकारी ढंग से ईरान की सेना के प्रमुख जनरलों और परमाणु वैज्ञानिकों का निर्मम कत्ल कर डाला। सैकड़ों की संख्या में आम नागरिक भी इजरायली सेना के हमले में मारे गये।
करीब 12 दिन चले इस इजरायली-अमेरिकी आक्रमण का ईरानी सेना ने जब माकूल जवाब देना जारी रखा तब जाकर अमेरिका व इजरायल युद्ध विराम (सीज फायर) के लिए मजबूर हुए। शुरू में भारी नुकसान उठाने के बाद ईरान ने तुरंत ही अपने को संभाल कर इजरायल को भी भारी जख्म दिये। इसमें कोई शक नहीं कि ईरान को बहुत ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा परन्तु इजरायल के मुख्य शहरों तेल अवीव, हाइफा, बियर शिवा आदि में ईरानी हमले ने गाजा सदृश बर्बादी की कुछ सूरत पैदा कर ही दी थी। यह भी सच है कि इजरायल को जितना नुकसान ईरानी हमलों ने पहुंचाया उतना नुकसान उसे पहले कभी नहीं उठाना पड़ा था।
कतर की पहलकदमी और मध्यस्थता के बीच 24 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सीजफायर की घोषणा के कुछ घण्टों बाद वास्तविक युद्ध विराम हुआ। भारत-पाकिस्तान के हालिया ‘‘चार दिनी’’ युद्ध के बाद हुए, ‘‘युद्ध विराम’’ का श्रेय डोनाल्ड ट्रम्प ने खुद को दिया था। ठीक यही काम ट्रम्प ने, ‘‘बारह दिनी’’ इजरायल-ईरान युद्ध में हुए, ‘‘युद्ध विराम’’ का श्रेय सबसे पहले खुद को देकर किया। ये दीगर बात है कि कतर ने जो कुछ भी किया होगा वह ट्रम्प के इशारे पर किया होगा। इसलिए ट्रम्प को ‘सीज फायर’ का श्रेय लेने का पूरा अधिकार है। कतर इस मामले में ठीक ही चुप रहा।
जिस तरह से ट्रम्प को युद्धों को रोकने का श्रेय लेने का अधिकार है ठीक इसी तरह से उसे ‘‘शांति’’ का नोबेल पुरूस्कार भी लेने का अधिकार है। जब बराक ओबामा जैसे लफ्फाज अमेरिकी राष्ट्रपति को शांति का पुरूस्कार मिल सकता है तो यह पुरूस्कार ट्रम्प को भी मिल सकता है। ओबामा की विरासत क्या रही है। वह भी अमेरिकी साम्राज्यवाद के आम व विशिष्ट हितों का निर्लज्ज व आक्रामक हितैषी व प्रवक्ता था। ठीक वैसे ही ट्रम्प भी है। ओबामा एक शातिर लफ्फाज डेमोक्रेट था तो ट्रम्प धूर्त, खुला व नंगा बदमाश व बकवास करने वाला रिपब्लिकन है। दोनों ही हद दर्जे के महत्वाकांक्षी और इतिहास में अपना नाम अमर करने की बीमारी के शिकार हैं। ट्रम्प नोबेल के शांति के पुरूस्कार की पैरोकारी या तो खुद या फिर पाकिस्तान के धूर्त, युद्धोन्मादी ‘‘फील्ड मार्शल’’ असीम मुनीर से करवा रहा है। जैसा नोबेल का शांति पुरूस्कार है, ठीक वैसे ही उसके हकदार व हकदारों की पैरवी करने वाले हैं। अब तो बस इतना बाकी है कि इजरायल के धूर्त, भ्रष्ट, क्रूर और युद्धोन्मादी शासक नेतन्याहू भी अपना नाम शांति के नोबेल पुरूस्कार के लिए प्रस्तावित करें। और शांति का पुरूस्कार चयन करने वाली कमेटी ट्रम्प को या तो अकेले या फिर नेतन्याहू के साथ ‘‘शांति का नोबेल पुरूस्कार’’ दे दे।
‘‘बारह दिनी’’ इस युद्ध में इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अपने देश को विजयी घोषित किया। उसने घोषित किया कि उसके देश ने ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की हैं और खुद को दुनिया की प्रमुख शक्तियों की पहली पंक्ति में रखा है, साथ ही उसने बताया कि ‘इजरायल ने ईरान से परमाणु हथियारों और बैलिस्टिक मिसाइलों के दोहरे खतरे को खत्म कर दिया।’ और अपनी तथाकथित सफलता के पहले व ईरान पर आक्रमण के समय उसने कहा था कि वह ईरान के परमाणु हथियार बनाने की क्षमता के साथ ईरान में खामनेई सरकार का तख्ता पलट चाहता है।
सच्चाई यह है कि इस हमले के बाद खामनेई सरकार का पतन होने के स्थान पर वह पहले से भी ज्यादा मजबूत हो गयी है। उसका जन समर्थन बढ़ गया है। इससे उसके पास अपने प्रतिक्रियावादी धार्मिक शासन को और मजबूत करने तथा अपने विरोधियों सहित शोषित-उत्पीड़ित जनों के दमन व उत्पीड़न करने की ताकत बढ़ गयी है। इजरायल के हमले से ईरान के परमाणु संयंत्रों व कार्यक्रम को कुछ नुकसान भले ही हुआ हो परन्तु इजरायल-अमेरिका अपनी भारी बमबारी और वैज्ञानिकों की निर्मम हत्या के बावजूद उसे खत्म नहीं कर सके हैं। ईरान ने काफी चालाकी से अपने परमाणु ऊर्जा और हथियार बनाने के कार्यक्रम को सुरक्षित (हाल-फिलहाल) कर लिया है। और उसके बैलिस्टिक मिसाइल की क्षमता को कितना नुकसान पहुंचा है यह उसके इजरायल पर ‘सीजफायर’ के पहले और बाद के हमलों से सुस्पष्ट है।
सच्चाई यही है कि इजरायल ने ईरान को भारी नुकसान पहुंचाया परन्तु जिस जीत का दावा इजरायल कर रहा है वह महज खोखला है। जिस ढंग से उसने ईरान के ऊपर हमला किया, अमेरिका ने खुला साथ दिया और साथ ही अन्य साम्राज्यवादियों खासकर धूर्त साम्राज्यवादियों के गिरोह ‘जी-7’ (अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, जापान, यूनाइटेड किंगडम, इटली व कनाडा) ने हर तरह से उसका साथ दिया, उससे यह स्पष्ट है कि अब इजरायल ने बार-बार ईरान पर हमले करने का अघोषित अधिकार हासिल कर लिया है। अब वह कभी भी ईरान के परमाणु हथियार बनाने के नाम पर उस पर हमला कर सकता है। और इसमें अमेरिकी साम्राज्यवादी और उसके गिरोह के लोग चाहे-अनचाहे साथ देंगे। और इस रूप में यह अधिकार सारे अंतर्राष्ट्रीय कानून व संधियों को धता बताकर हर एक साम्राज्यवादी देश ने अघोषित तौर पर हासिल कर लिया।
ऐसी परिस्थिति में यह ‘युद्ध विराम’ नये युद्ध की शुरूआत के पहले का अल्प विराम ही साबित होगा। और यह ईरान को अधिकाधिक और जल्दी से जल्दी परमाणु हथियार हासिल करने की ओर ले जायेगा। अब जो स्थिति है उसमें वह अपनी सम्प्रभुता की रक्षा अपने परमाणु शक्ति सम्पन्न होने की खुलेआम घोषणा से ही कर सकता है। इजरायल के आक्रमण का यह नतीजा निकलता है कि ईरान परमाणु हथियार बनाये। वह ऐसा कर सके इसमें रूसी व चीनी साम्राज्यवादियों की ‘बड़ी ना’ के बीच एक ‘छोटी हां’ शामिल होगी। क्योंकि ईरान के प्रतिक्रियावादी शासकों के सबसे बड़े निकट सहयोगी व पैरोकार रूसी व चीनी साम्राज्यवादी ही हैं।
इस युद्ध के दौरान भारत के शासकों ने रहस्यमयी चुप्पी साध ली। वैसे तो हिन्दू फासीवादियों का यह आम और नरेन्द्र मोदी का खास व्यवहार है। इस बार उन्होंने अपने ‘युद्ध नहीं बुद्ध’ या ‘यह युद्ध का नहीं शांति का समय है’ जैसे जुमले नहीं उछाले। अमेरिकी साम्राज्यवादी व इजरायली जियनवादी शासकों की तरफदारी ने जहां इनके मुंह पर ताला लगवाया वहां ईरान से तेल-गैस व अन्य हितों के चलते इन्हें इजरायल व अमेरिका की खुली तरफदारी से रोका।
इस युद्ध और ‘युद्ध विराम’ से दुनिया भर के मजदूरों-मेहनतकशों सहित इजरायल व ईरान के मजदूरों-मेहनतकशों के लिए क्या नतीजा निकला? इस युद्ध व ‘युद्ध विराम’ ने अमेरिकी साम्राज्यवादियों, इजरायली जियनवादियों व ईरानी प्रतिक्रियावादी शासकों को ही और जीवन व ताकत प्रदान की। भविष्य में अत्याचार, दमन और ज्यादा मजदूरों-मेहनतकशों पर बढ़ेगा। ऐसा न सिर्फ ईरान बल्कि इजरायल व अमेरिका में भी होगा। इन धूर्तों के हित युद्ध और फिर नये युद्ध में ही हैं। इनका जीवन मनुष्यों के रक्त के पान से ही चलता है। ये जब युद्ध नहीं लड़ रहे होते हैं तब मजदूरों-मेहनतकशों का खून चूसते हैं और जब लड़ते हैं तब तो और ज्यादा खून चूसते हैं और बेरहमी से राष्ट्र के नाम पर, शांति के नाम पर, खून-खराबा करते हैं। ईरान की तुलना अमेरिका या इजरायल से नहीं की जा सकती है पर जब तक ईरान में मजदूर क्रांति नहीं होती तब तक वह अमेरिकी साम्राज्यवाद या इजरायली जियनवाद से अपने आपको सुरक्षित नहीं कर सकता है। ईरान में मजदूर क्रांति की सफलता इसमें निहित है कि इजरायल में वह कब होती है। और अमेरिका सहित पूरी दुनिया में कब समाजवादी क्रांति की नयी लहर उठ खड़ी होगी। जब तक पूरी दुनिया में समाजवाद नहीं आयेगा तब तक युद्धों, साम्राज्यवादी हमले का खतरा नहीं मिटेगा।