बुलडोजर

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अंधेरा है
बहुत घना अंधेरा है
कुछ नहीं दिखाई देता
हिंदू है या मुसलमान है
मगर शायद इंसान है,
अंधेरे को चीरती हुई आ रही हैं
बच्चों की चीखें, महिलाओं की सिसकियां
वो रोते हुए बड़बड़ा रही हैं
क्या कसूर था इन मासूम बच्चों का?
क्या अपराध था मेरा?
क्यों गिरा दिया छोटा सा आशियाना मेरा।

तुम्हें औरंगजेब की कब्र खोदनी है
जरूर खोदो
तुम्हें जिसका भी मकबरा खोदना है
खोदो
मगर जीते जी बूढ़े मां-बाप को
बुलडोजर से मत रौंदो।

अपने आप को योगी, संत, सनातनी कहने वालो
बताओ किस गीता में लिखा है कि
बाप के जुर्म की सजा बच्चों को दो
किस वेद पुराण में लिखा है कि
बेटे के अपराध की सजा मां-बाप को दो
तुम कहते हो कि तुम्हारा धर्म श्रेष्ठ है
तुम्हारी संस्कृति महान है
बस्तियां उजाड़ते हुए तुम्हें दर्द नहीं होता
क्या यही वसुधैव कुटुम्बकम का ज्ञान है।

माना कि बहुत अन्याय है अंधकार है
रोशनी की किरण अभी दूर है
रात घनी अंधियारी है
सूरज भी मजबूर है
मगर जब मशालें लेकर
सड़कों पर जन सैलाब आयेगा
तब अंधियारा छंट जायेगा
और नया सवेरा आयेगा।।    -भारत सिंह

आलेख

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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