बुलडोजर

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अंधेरा है
बहुत घना अंधेरा है
कुछ नहीं दिखाई देता
हिंदू है या मुसलमान है
मगर शायद इंसान है,
अंधेरे को चीरती हुई आ रही हैं
बच्चों की चीखें, महिलाओं की सिसकियां
वो रोते हुए बड़बड़ा रही हैं
क्या कसूर था इन मासूम बच्चों का?
क्या अपराध था मेरा?
क्यों गिरा दिया छोटा सा आशियाना मेरा।

तुम्हें औरंगजेब की कब्र खोदनी है
जरूर खोदो
तुम्हें जिसका भी मकबरा खोदना है
खोदो
मगर जीते जी बूढ़े मां-बाप को
बुलडोजर से मत रौंदो।

अपने आप को योगी, संत, सनातनी कहने वालो
बताओ किस गीता में लिखा है कि
बाप के जुर्म की सजा बच्चों को दो
किस वेद पुराण में लिखा है कि
बेटे के अपराध की सजा मां-बाप को दो
तुम कहते हो कि तुम्हारा धर्म श्रेष्ठ है
तुम्हारी संस्कृति महान है
बस्तियां उजाड़ते हुए तुम्हें दर्द नहीं होता
क्या यही वसुधैव कुटुम्बकम का ज्ञान है।

माना कि बहुत अन्याय है अंधकार है
रोशनी की किरण अभी दूर है
रात घनी अंधियारी है
सूरज भी मजबूर है
मगर जब मशालें लेकर
सड़कों पर जन सैलाब आयेगा
तब अंधियारा छंट जायेगा
और नया सवेरा आयेगा।।    -भारत सिंह

आलेख

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

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अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।