तीन दिन क्या खूब तमाशा रहा !

तीन दिन तक लोकसभा में मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर बहस चलती रही। अविश्वास प्रस्ताव खारिज हो जायेगा, इसकी खबर हर किसी को थी। फिर भी लोकसभा में आकाश-पाताल एक कर दिया गया। ‘तू डाल-डाल मैं पात-पात’ का खेल खेला गया। विपक्ष इस बात पर अपनी कामयाबी का जश्न मना सकता है कि उन्होंने अपनी एक चाल में मोदी को मणिपुर पर संसद में बोलने के लिए मजबूर कर दिया। और मोदी व मोदी भक्त इस बात पर जश्न मना सकते हैं कि कैसे विपक्ष लोकसभा से भाग खड़ा हुआ। मोदी-शाह के इतिहास ज्ञान और दावे के बीच मणिपुर जैसा जल रहा था वैसा ही जल रहा है। खतरा यह है कि पूरा उत्तर-पूर्व ही आपसी संघर्षों के अंतहीन सिलसिले में फंसने की ओर बढ़ सकता है। 
    
जिस वक्त प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह लोकसभा में विपक्षी पार्टियों की धज्जियां उड़ा रहे थे ठीक उसी वक्त खबर आयी कि मणिपुर में इण्डियन रिजर्व बटालियन (आई आर बी) के पूरे शस्त्रागार को लूटा जा चुका है। खबरों के अनुसार लूटे गये हथियारों में सैकड़ों अत्याधुनिक राइफल्स, पिस्तौलें और यहां तक मोर्टार भी शामिल थे। ठीक इसी तरह दूसरी खबर यह थी कि मणिपुर पुलिस ने असम राइफल्स पर एफ आई आर दर्ज करवायी है। इसे भारत के इतिहास में पहली घटना बताया जा रहा है जब पुलिस ने सेना के किसी बल के खिलाफ अपराधिक मुकदमा दायर किया हो। मणिपुर के हालात सुधरने के बजाए जस के तस बने हुए हैं। भाजपा-संघ ने मणिपुर को जिस अंधी सुरंग में धकेला है वहां प्रधानमंत्री मोदी का यह दावा ‘एक दिन मणिपुर में शांति का सूरज जरूर उगेगा’ अतिश्योक्ति पूर्ण दिखायी देता है। 
    
अविश्वास प्रस्ताव के दौरान मोदी और शाह ने लम्बे-लम्बे भाषण दिये। मानो संसदीय इतिहास में सबसे लम्बे भाषण देने की कोई प्रतियोगिता चल रही हो। मोदी-शाह ने अपने ‘पापों’ को छुपाने के लिए कांग्रेस के पापों का खूब वर्णन किया। मोदी ने जहां कांग्रेस के पापों का खुलासा किया वहां अपनी बारी में कांग्रेस ने भी मोदी और उनकी पार्टी व संघ का खुलासा किया। इस तरह अनजाने ही दोनों ने एक-दूसरे की खूब पोल खोली। 
    
भारत के इतिहास में पहली दफा यह बात खुले तौर पर स्वीकार की गयी कि 5 मार्च 1966 को भारत की वायुसेना ने अपने देश के नागरिकों पर मिजोरम के आइजोल में बमबारी की थी। मिजोरम अपने आत्मनिर्णय के अधिकार के तहत भारतीय राज्य से उस वक्त सशस्त्र संघर्ष में लगा हुआ था। इंदिरा गांधी की सरकार किसी भी कीमत पर मिजोरम पर भारतीय राज्य का कब्जा बनाये रखना चाहती थी। और इसी के तहत मिजोरम के विद्रोहियों को कुचलने और वहां के नागरिकों को सबक सिखाने के लिए निर्ममतापूर्वक आइजोल पर बमबारी की गयी थी। और मिजोरम के गांवों को उजाड़कर जबरदस्ती राष्ट्रीय राजमार्ग के इर्द-गिर्द सेना की निगरानी में बसा दिया गया। 
    
क्या जो काम अपने जमाने में इंदिरा गांधी ने किया था वही काम बदले रूप में आज भी कश्मीर में जारी नहीं है। क्या यही काम हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम में भाजपा सरकारें मुस्लिम नागरिकों के घरों पर बुलडोजर चलाकर या निर्दोष नौजवानों को जेल में ठूंसकर नहीं कर रही हैं। विपक्ष मोदी को वर्तमान पर घेर रहा था और मोदी कांग्रेस को अतीत के लिए गालियां दे रहे थे। अविश्वास प्रस्ताव के दौरान इस तरह यह अजब-गजब तमाशा चल रहा था कि पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे की पोल खोल रहे थे। पोल खोलने के इस खेल में एक-दूसरे को शर्मसार करने, एक-दूसरे की खिल्ली उड़ाने का खूब सिलसिला चला। जाहिर है सत्ता पक्ष का लाभ मोदी एण्ड कम्पनी को मिला परन्तु इस जीत में उसकी हार छिपी थी। नाकामी छुपी थी। 
    
मोदी की नाकामी की एक गवाही मणिपुर दे रहा था तो दूसरी गवाही कश्मीर दे रहा था। मणिपुर आग में बदस्तूर जल रहा है तो कश्मीर में धारा-370 खत्म किये जाने के चार वर्ष बीत जाने के बाद भी शांति कायम नहीं हुयी। कश्मीर में आज तक चुनाव नहीं कराये जा सके हैं। 
    
मोदी की नाकामी की गवाही बढ़ती महंगाई दे रही है। मोदी की नाकामी की गवाही बढ़ती बेरोजगारी भी दे रही है। 
    
अपनी नाकामी पर न तो सत्ता पक्ष को और न मोदी को बोलना था। और न उन्होंने बोला। 
    
अविश्वास प्रस्ताव में मोदी का 2 घण्टे 13 मिनट का भाषण चुनावी रैली का भाषण था। और चुनावी रैली की तरह मोदी ने दावा किया कि तीसरी बार वे फिर से प्रधानमंत्री बनेंगे और 2028 में फिर विपक्ष उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाये। 
    
संसद में अविश्वास प्रस्ताव विपक्षी पार्टियों के गठबंधन इंडिया का एक सोचा-समझा दांव था परन्तु मोदी ने अपना ऐसा डंका बजाया कि उनके और उनके भक्तों के अलावा किसी को न सुहाया। भारत के मजदूरों-मेहनतकशों के लिए मोदी का शासन दिनोंदिन आतंक और तबाही में बदलता जा रहा है। इण्डिया गठबंधन चुनावी दांव तो खेल सकता है परन्तु वह देश को वह नहीं दिला सकता है जिसकी भारत के मजदूरों-मेहनतकशों को जरूरत है। शोषण-उत्पीड़न, गरीबी-बेरोजगारी आदि से मुक्ति के लिए मजदूरों-मेहनतकशों को स्वयं ही आगे आना होगा। 

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