वंदे मातरम की अनिवार्यता

Published
Sun, 03/01/2026 - 07:01
/vande-maataram-ki-anivaryataa

हाल ही में वंदे मातरम के गायन को लेकर मोदी सरकार ने नये दिशा-निर्देश जारी कर दिये हैं। इसके तहत वंदे मातरम को कई आधिकारिक कार्यक्रमों में गाया जाना अनिवार्य बना दिया गया है। वंदे मातरम के 2 छंदों की जगह पर अब से 6 छंद गाये जायेंगे व इसके गायन के वक्त भी लोगों को सावधान की मुद्रा में खड़ा रहना होगा। जब भी राष्ट्रगीत वंदे मातरम व राष्ट्रगान जन गण मन को एक साथ गाया-बजाया जायेगा तो पहले वंदे मातरम गाया-बजाया जायेगा। 
    
गृह मंत्रालय द्वारा 28 जनवरी को जारी 10 पन्नों के सरकारी आदेश में कहा गया है कि केवल फिल्म-वृत्तचित्र में वंदे मातरम बजने पर लोगों को सावधान की मुद्रा में खड़े रहने से छूट होगी। स्कूलों के साथ विभिन्न आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम का गायन अनिवार्य कर दिया गया है। 
    
अभी तक वंदे मातरम को लेकर कोई आधिकारिक प्रोटोकाल नहीं था। साथ ही वंदे मातरम के शुरूआती दो छंद ही राष्ट्रगीत की मान्यता प्राप्त थे। पर अब मोदी सरकार सभी 6 छंदों को जबरन लोगों को गाने को मजबूर कर रही है। 
    
हाल ही में संसद में मोदी सरकार ने इस गीत के 150 वर्ष पूरे होने पर चर्चा करायी। तभी से इस बात की आशंका प्रकट होने लगी थी कि मोदी सरकार इसे पूरे देश पर थोप सकती है। इस आशंका को सच साबित करते हुए इसे स्कूलों-सरकारी आयोजनों आदि में अनिवार्य घोषित कर दिया गया। 
    
संसद में मोदी ने कांग्रेस पर इस गीत की 2 छंदों में कांट-छांट के लिए कांग्रेस को दोषी ठहराया था। अब 6 छंदों के गायन को अनिवार्य बना सरकार कांग्रेस की गलती ठीक करने का दावा कर रही है। 
    
1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा वंदे मातरम गीत रचा गया था और 1882 में इसे आनंदमठ पुस्तक में शामिल किया गया था। मूल गीत केवल दो छंदों का था जिसमें मातृभूमि की वंदना की गयी थी। पुस्तक में शामिल करते वक्त इसमें देवी दुर्गा की स्तुति के 4 छंद जोड़ दिये गये। 1896 में रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कांग्रेस अधिवेशन में इस गीत के 2 छंद गाये। दुर्गा स्तुति के इन 4 छंदों के गायन पर जब आपत्तियां उठी तो 1937 में कांग्रेस की एक समिति ने तय किया कि सार्वजनिक समारोहों में शुरूआती 2 छंद ही गाये जायेंगे। संविधान सभा ने इसे ही राष्ट्रगीत का दर्जा तो दिया पर इसे किसी भी अवसर पर गाना अनिवार्य नहीं बनाया। 
    
आजादी से पहले वंदे मातरम नारा तमाम क्रांतिकारियों की जुबान पर था व अंग्रेजों की भक्ति में लीन संघी इससे परहेज करते थे। वहीं आजादी के बाद मुस्लिम विरोध के चलते क्रांतिकारियों ने इस नारे को छोड़ दिया व संघियों ने अपना लिया। गौरतलब है कि इस्लाम धर्म में अल्लाह के अलावा किसी और की वंदना की मनाही है।
    
अब आजादी के इतने वर्षों बाद संघी सरकार का इसके पूर्व संस्करण को अनिवार्य बनाना किसी राष्ट्रवादी रुख का नहीं बल्कि साम्प्रदायिक रुख का परिणाम है। वे इसे अनिवार्य बना मुसलमानों पर थोपना, उन्हें चिढ़ाना-उकसाना चाहते हैं। साथ ही मुसलमानों द्वारा विरोध होने पर उन्हें राष्ट्र विरोधी के बतौर घोषित कर हिन्दू आबादी को लामबंद करना चाहते हैं। अभी तक कुछ वामपंथी संगठनों-नगा छात्र संगठनों ने सरकार के इस निर्णय का विरोध किया है। नगा संगठनों ने इसे अपनी संस्कृति पर हिन्दू प्रतीकों को जबरन थोपने वाला कदम बताया है। 
    
इस गीत के दुर्गा स्तुति के 4 छंद अनिवार्य बनाना देश के धर्मनिरपेक्षता के कागजी रुख को भी पलट देता है। देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने पर उतारू संघी वैसे भी हर जगह हिन्दू प्रतीक थोपने पर उतारू हैं। 
    
वंदे मातरम थोपने व इसकी दुर्गा स्तुति को स्थापित करने के पीछे एक तात्कालिक कारण आगामी बंगाल चुनाव में लाभ लेना भी है। बंगाल चुनाव के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी ‘जय काली मां’ के नारे वाला पत्र भी जारी कर चुके हैं। 
    
स्पष्ट रहे कि 6 छंदों वाला वंदे मातरम न केवल मुसलमानों बल्कि आदिवासियों मूर्ति पूजा विरोधियों, नास्तिकों, बौद्ध-जैन-ईसाई मतावलम्बियों की भावनाओं पर भी हमला करता है। ऐसे में साम्प्रदायिक नजरिये से इसे थोपे जाने का विरोध जरूरी है। यह राष्ट्रवादी नहीं, राष्ट्रीय विभाजन-वैमनस्य बढ़ाने का कदम है।   

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।