फिलिस्तीन जिन्दाबाद !

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के शपथ ग्रहण समारोह में जब दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलन मस्क ने नाजी अभिवादन किया था तब ही यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि अब ये नये नाजी पगले दुनिया में कोहराम मचायेंगे। पागलपन का हर वह काम करेंगे जो नाजी हिटलर ने किये थे। नरसंहार के नये कीर्तिमान स्थापित करेंगे। 
    
डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस विदेशी नेता से सबसे पहले मुलाकात की, उस पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में फिलिस्तीनियों के नरसंहार का ही मुकदमा चल रहा है। और उससे मुलाकात करने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प ने नरसंहार की नयी योजना पेश कर दी। उसने एलान किया कि गाजा पट्टी से 23 लाख फिलिस्तीनियों को हटाकर मिश्र, जार्डन या अफ्रीका महाद्वीप के किसी देश में बसा दिया जायेगा। और गाजा पट्टी को दुनिया भर के अमीरों की मौज मस्ती के लिए ‘‘रिविएरा’’ (ऐसी खूबसूरत आनन्ददायक, आरामगाह जहां छुट्टियां बितायी जाये, मौज की जाये) में बदल दिया जायेगा।
    
गाजा पट्टी को ‘‘रिविएरा’’ में बदलने का क्या मतलब होगा। इसका मतलब होगा एक और भयानक नरसंहार। और यह नरसंहार वैसा ही नरसंहार होगा जैसा हिटलर ने जर्मनी, पोलैण्ड आदि में यहूदियों का किया था। लाखों लोगों की निर्मम ढंग से हत्या करके ही अमेरिका-इजरायल गाजा पट्टी को खाली करा सकते हैं। और यह आज की दुनिया में बिल्कुल भी संभव नहीं है। अमेरिकी साम्राज्यवादियों के मंसूबे कभी पूरे नहीं हो सकते हैं। इसमें सबसे बड़ी बाधा स्वयं फिलिस्तीनी ही हैं। और साथ ही जिस तरह से पूरी दुनिया के इंसाफपसंद आम लोगों और खासकर छात्र-युवाओं ने फिलिस्तीन के साथ अपनी एकजुटता हाल में दिखायी वह दूसरी बड़ी बाधा है। तीसरी बाधा अमेरिकी साम्राज्यवादी शासकों और दुनिया के अन्य साम्राज्यवादी शासकों और अन्य शासकों के बीच के अंतरविरोध हैं। और चौथी बाधा स्वयं अमेरिकी शासकों के आपसी अंतरविरोध और अमेरिका की जनता के एक बड़े हिस्से का ट्रम्प विरोधी होना है। गाजा पट्टी से फिलिस्तीनियों को हटाने के लिए जितने बड़े पैमाने पर युद्ध और युद्ध पर धन खर्च होगा, वह अमेरिकी समाज में कई-कई सवालों को जन्म दे देगा। और ये सवाल उन सवालों से बहुत बड़े होंगे जो इस समय भी खड़े हैं। 
    
फिलिस्तीन की जनता को अपनी मुक्ति की लड़ाई को लड़ते हुए, कई-कई दशक हो गये हैं। पहले-पहल उसकी मुक्ति के लिए कई अरब देशों के शासकों ने अपनी ही वजहों से इजरायल के साथ युद्ध किये। परन्तु हर बार इजरायल (यानी अमेरिका-ब्रिटेन-फ्रांस) के हाथों उन्हें युद्ध में मात मिली। और फिर धीरे-धीरे करके अधिकांश अरब देशों ने ‘‘मुक्तिदाता’’ बनने के शौक से तौबा कर ली। मिश्र और जार्डन जो कि फिलिस्तीन के पड़ोसी हैं, उन्होंने गाजा नरसंहार के दौरान एक रहस्यमयी चुप्पी ओढ़ ली। अधिकांश अरब देशों के शासकों की किनाराकशी के पहले भी फिलिस्तीन की जनता अपनी मुक्ति की लड़ाई लड़ रही थी और वह आज भी अपनी मुक्ति की लड़ाई लड़ रही है। और उसने भारी कुर्बानी देकर अपनी मुक्ति के ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए भारी जद्दोजहद कायम रखी हुयी है। 
    
डोनाल्ड ट्रम्प ने गाजा पट्टी पर अमेरिकी कब्जे के जिस मंसूबे को पेश किया उसके पीछे एक नहीं कई-कई लालच हैं। अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में अपना एकछत्र राज चाहते हैं। वे चाहते हैं कि पश्चिम एशिया में ऐसा कोई देश न हो जो उसके प्रभाव में न हो। ठीक ऐसा ही वे अफ्रीका महाद्वीप में खासकर भू-मध्य सागर और हिन्द महासागर के अंतर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापार वाले मार्ग में पड़ने वाले देशों के संदर्भ में भी चाहते हैं। इस मामले में वे अन्य साम्राज्यवादी देशों से कहीं आगे हैं परन्तु उन्हें  अन्य साम्राज्यवादी देशों खासकर चीन और रूस से चुनौती मिलती रही है। प. एशिया व उत्तरी अफ्रीका में ईरान और उसके कुछ सहयोगियों को छोड़कर अन्य देशों को अमेरिका ने कम या ज्यादा साधा हुआ है। मिश्र, जार्डन, कतर, साऊदी अरब आदि-आदि देश इसमें शामिल हैं। इनमें से कई-कई देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं। गाजा पट्टी पर अमेरिकी कब्जे का सीधा मतलब होगा कि प.एशिया व उत्तरी अफ्रीका सहित पूरे भूमध्य सागर व हिन्द महासागर के समुद्री व्यापारिक रास्ते पर भी अपना वर्चस्व कायम करना। 
    
ट्रम्प गाजा पट्टी को ‘रिविएरा’ ही नहीं बनाना चाहता है बल्कि वह गाजा पट्टी में तेल व गैस के विशाल भण्डारों पर भी कब्जा चाहता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार वहां 3 अरब बैरल से भी अधिक के तेल के भण्डार हैं। ऐसे ही कई-कई खरब क्यूबिक फीट नेचुरल गैस है। और यही बात वेस्ट बैंक के बारे में भी है कि वहां तेल व गैस के भण्डार हैं। जाहिर सी बात है कि तेल व गैस के भण्डार पर कब्जे के लिए धूर्त व्यापारी ट्रम्प ने ‘रिविएरा’ का ही सपना नहीं बेचा है बल्कि वह फिलिस्तीनियों को भी यह सब्जबाग दिखा रहा है कि किसी अन्य मुल्क में जाकर वे आराम से अच्छी जिन्दगी जी सकते हैं। और वह आराम से गाजा पट्टी के तेल-गैस भण्डार को हड़प सके। 
    
धूर्त ट्रम्प न केवल गाजा पट्टी बल्कि वह कनाडा, ग्रीन लैण्ड, मैक्सिको की खाड़ी, पनामा नहर आदि-आदि पर अपना कब्जा चाहता है। ‘अमेरिका को फिर से महान बनाओ’ के अपने नकली राष्ट्रवादी नारे के जरिये वह अमेरिकी साम्राज्यवादियों के अधूरे मंसूबों को पूरा करना चाहता है। 
    
अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने गाजा पट्टी पर अपने कब्जे को उस इजरायल के मार्फत पूरा करने की योजना पेश की है जो इजरायल अपने भयावह सैन्य अभियान के बावजूद अपने लोगों को हमास के कब्जे से नहीं छुड़ा पाया था। अंततः उसे समझौते के लिए बाध्य होना पड़ा था। यह कोई छुपी हुयी बात नहीं है कि इजरायल द्वारा गाजा पट्टी, वेस्ट बैंक, लेबनान, यमन, सीरिया पर किये हमलों में आये खर्च के अधिकांश भाग को अमेरिका ने ही उठाया था। और आज भी यह किस्म-किस्म से नये तरीकों से उसे धन ही नहीं बल्कि हथियार भी दे रहा है। गाजा पट्टी पर अमेरिका-इजरायल के जो मंसूबे जो बाइडेन के राष्ट्रपति कार्यकाल में पूरे नहीं हो सके उन्हें ट्रम्प अपने कार्यकाल में पूरा करना चाहता है। हवाई बमबारी में भले ही गाजा पट्टी को अमेरिका के सहयोग से इजरायल ने पूरा बरबाद कर दिया हो परन्तु जमीनी हमले में उसे मुंह की खानी पड़ी। इजरायल पहले अपने हताहतों की संख्या बहुत कम करके बता रहा था अब नये बने इजरायली सेना अध्यक्ष के मुताबिक करीब 6000 सैनिक मारे गये हैं और घायल सैनिकों की संख्या 15,000 के करीब है। भारी पैमाने पर इजरायली सैनिक मानसिक रोगों के भी शिकार हुए हैं। आत्महत्या करने वाले सैनिकों की संख्या भी कम नहीं है। धूर्त ट्रम्प अब फिर उसी इजरायल के द्वारा अपनी धूर्त योजना को पूरा करने के मंसूबे पाल रहा है जो अभी-अभी युद्ध विराम के लिए मजबूर हुआ है। और खुद उसके अधिकांश नागरिक न केवल युद्ध विराम को आगे बढ़ाना चाहते हैं बल्कि स्थायी शांति भी चाहते हैं। 
    
ट्रम्प गाजा पट्टी पर अमेरिकी कब्जा तो चाहता है परन्तु उसे वह सीधे नहीं बल्कि इजरायल के मार्फत चाहता है। जब हर ओर से ट्रम्प के बयानों का विरोध हुआ तो यह धूर्त कुछ पीछे हटा और कहने लगा कि उसे कोई जल्दी नहीं है। चीन, रूस, यूरोप के कई देशों (जिनमें ब्रिटेन भी शामिल है), अरब देशों के साथ-साथ दुनिया के कई देशों ने ट्रम्प के बयानों का खुलकर विरोध किया। दुनिया भर से विरोध होने के बाद ट्रम्प के स्वर बदलने लगे। 
    
असल में, एकजुट फिलिस्तीनी राष्ट्र न केवल फिलिस्तीन की बहादुर जनता बल्कि पूरी दुनिया के मुक्तिकामी लोगों की भी चाहत का हिस्सा है। फिलिस्तीन मुक्ति का प्रतीक है। फिलिस्तीन प्रतिरोध का प्रतीक है। फिलिस्तीन संघर्ष का प्रतीक है। फिलिस्तीन जज्बे, जुनून और हिम्मत का भी प्रतीक है।  
    
फिलिस्तीन साम्राज्यवादियों के षड्यंत्र का भी प्रतीक है तो वह धूर्त अरब शासकों की गद्दारी का भी प्रतीक है। फिलिस्तीन जियनवादी-फासीवादी इजरायली शासकों के जुल्म का प्रतीक है तो इस बात का भी प्रतीक है कि कैसे जुल्म का मुकाबला किया जाता है और हर हाल में अपनी मुक्ति के सपने को देखा जाता है। 
    
फिलिस्तीन सिर्फ फिलिस्तीन नहीं है वह पूरी मानव जाति के मुक्ति अभियान का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। जिस दिन फिलिस्तीनी राष्ट्र हकीकत बनेगा उस दिन राष्ट्रीय मुक्ति का एक अहम कार्यभार पूरा होगा। यह संभव है कि आज फिलिस्तीनी राष्ट्र एक दूर की कौड़ी लगता हो परन्तु जिस दिन पूरी दुनिया में समाजवादी क्रांतियों का एक नया सिलसिला शुरू होगा उस दिन यह बहुत जल्दी संभव हो जायेगा। मजदूर वर्ग के नेतृत्व में समाजवादी क्रांतियों का यह सिलसिला उन लोगों की भी एक राष्ट्र की आकांक्षा को पूरा करेगा जो दशकों से अपनी मुक्ति की लड़ाई लड़ रहे हैं।

 

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