सम्पादकीय

राहुल गांधी की राजनीति
परेशान हाल अंधभक्त और उनके आका
अंततः इस्तीफा, हेकड़ी का निकलना और ताजी हवा का बहना
कैसा राष्ट्रवाद? किसका राष्ट्रवाद?
युवा और युवा सपनों की कत्लगाह बनता भारत
मोदी के बारह साल: न उत्तम, न मध्यम, केवल अधम
गहराता सामाजिक आर्थिक संकट और ‘काकरोच जनता पार्टी’
हालिया विधानसभा चुनाव: कुछ निष्कर्ष
ये तो होना ही था
अमेरिकी साम्राज्यवाद के हमले व आतंक के साये में ‘मई दिवस’
यह समय : राक्षसी बूढ़ों का समय
आठ मार्च का दिन इंकलाब व मुक्ति के नाम
भारत को लज्जित करते भारत के शासक
मुक्त व्यापार समझौते : भारत को घेरते साम्राज्यवादी
एक राष्ट्र का सरेआम बलात्कार
नया साल
भारत का संकट
नई श्रम संहिताएं : मजदूर वर्ग पर बोला गया तीखा व क्रूर हमला
दलित उत्पीड़न का अंतहीन सिलसिला
आज की दुनिया में नई दुनिया का ख्वाब
बूढ़ा, बीमार डगमग-डगमग कर चलता पूंजीवाद
भारतीय राजसत्ता की खुराक : गर्म, ताजा रक्त
गद्दारी, षड्यंत्र, झूठ और हिंसा के सौ साल
कोई भी बात उठाओ, बात इंकलाब तक जायेगी
मोदी जी का भविष्य
सत्ता पक्ष और विपक्ष : खोटे सिक्के के दो पहलू
यह ‘युद्ध विराम’ नहीं, नये युद्धों की तैयारी है
लोकलुभावनवाद : मुंह में राम बगल में छुरी
अजब-गजब राष्ट्रवाद
यह टकराव किसके हित में और किसके खिलाफ है
पहलगाम आतंकी हमले से निकलने वाले सबक
चट्टान में भी फूल खिल सकते हैं; शर्त खूने जिगर से सींचने की है
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वास्तविक दुनिया
तुम्हारे झूठे ख्वाबों की कीमत हम क्यों चुकायें
कलह के बाद अब सांठगांठ
फिलिस्तीन जिन्दाबाद !
युद्ध विराम समझौता
एक देश-एक चुनाव : भारतीय गणराज्य का नया शोकगीत
लो, एक साल और बीता
‘‘अरबन नक्सल’’
उन्नीस सौ पच्चीस
एक बदमाश की वापसी
ये डर है तो किस बात का डर है
चुनाव में अपचयित होता लोकतंत्र
मजदूरों-मेहनतकशों सावधान !
राजनीति से बेरुखी ठीक नहीं
यौन हिंसा और उसके खिलाफ फूटा आक्रोश
बांग्लादेश : जनाक्रोश से हसीना भागी पर भगोड़ा सत्ता में
15 अगस्त : आजादी के मायने तलाशने की जरूरत
मजदूरों-मेहनतकशों की बस्ती में ठगों का डेरा
नयी सरकार : अमीरों द्वारा, अमीरों की, अमीरों के लिए सरकार
चुनाव परिणाम : ‘‘कोउ नृप होउ हमहिं का हानि’’..?
आम चुनाव में मजदूर वर्ग कहां है
मजदूर पूंजीपतियों की गुलामी क्यों करें? कब तक करें?
इलेक्टोरल बाण्ड एक गोरखधंधा
‘‘विश्व गुरू’’ के मंसूबे के आगे खड़ी फौलादी दीवार
भारत का इतिहास सवाल दर सवाल
‘समान नागरिक संहिता’ : कहीं पे निगाह कहीं पे निशाना
उन्माद के बाद
‘‘आप तो आंधी और तूफान थे’’
किसी भी कीमत पर चुनावी जीत हासिल करने की साजिश
नया साल : चुनावी साल
हमारा भविष्य उज्जवल है
विकास का रथ : खून से लथपथ
वामपंथ क्यों गाली खाता है
शांति का रास्ता क्रांति से होकर जाता है
जातीय जनगणना
महिला आरक्षण क्या महज एक झुनझुना
भगतसिंह होने का मतलब
वैज्ञानिक उपलब्धि; श्रेय का चक्कर
‘‘एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य’’
गुलामी की स्याही हर माथे पर, गुमान पर आजाद होने का
किम रहस्यम् मोदी मौनम्
मोदी की अमेरिकी यात्रा के निहितार्थ
आगामी आम चुनाव : बनते-बिगड़ते राजनैतिक समीकरण
नया संसद भवन : रंग में भंग
‘सामाजिक न्याय’ के झण्डे में छेद ही छेद
मई दिवस का महत्व
देश का दुश्मन
जी-20 और विश्व गुरू
‘‘इंकलाब जिन्दाबाद !’’
व्यक्तिगत सफलता और सामाजिक मुक्ति
बीते साल का लेखा-जोखा

आलेख

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?